Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Adhyatma Shabdano Arth.

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मुखरूप उपाधिना वशे अनेक दर्पणोनां पुद्गलो ज अनेक मुखना आकाररूपे परिणम्यां
छे, एक देवदत्तनुं मुख अनेकरूपे परिणम्युं नथी. जो देवदत्तनुं मुख ज अनेक मुखरूपे
परिणमतुं होय तो तो दर्पणमां रहेल देवदत्तना मुखनां प्रतिबिंब पण चेतन बनी जाय;
पण एम तो बनतुं नथी. वळी, जो एक ज जीव होय तो एक जीवने सुख
- दुःख, जीवन
- मरण आदि प्राप्त थतां ते ज क्षणे बधा जीवोने जीवन - मरण आदि प्राप्त थवां जोईए;
पण तेम देखातुं नथी. अथवा जे एम कहे छे के, ‘एक ज समुद्र छे ते क्यांक खारा
पाणीवाळो छे अने क्यांक मीठा पाणीवाळो छे. तेम एक ज जीव बधां शरीरोमां विद्यमान
छे.’ तेमनुं ए कहेवुं पण घटतुं नथी. केम नथी घटतुं? समुद्रमां जळराशिनी अपेक्षाए
एकता छे, जळना कणोनी अपेक्षाए एकता नथी. जो जळकणोनी अपेक्षाए एकता होय
तो समुद्रमांथी थोडुं जळ ग्रहण करतां बाकीनुं बधुं जळ तेनी साथे ज केम नथी आवतुं?
ते कारणे ए सिद्ध थयुं के, सोळवला सोनाना राशिनी जेम अनंत ज्ञानादि लक्षणनी
अपेक्षाए जीवराशिमां एकता छे पण एक जीवनी अपेक्षाए (समस्त जीवराशिमां एक
ज जीव होवानी अपेक्षाए) जीवराशिमां एकता नथी.
हवे, ‘अध्यात्म’ शब्दनो अर्थ कहेवामां आवे छेः मिथ्यात्व, राग आदि समस्त
विकल्पजाळना त्यागथी स्वशुद्धात्मामां जे अनुष्ठान तेने ‘अध्यात्म’ कहे छे.
एवी रीते, ध्याननी सामग्रीना व्याख्यानना उपसंहाररूपे आ गाथा पूरी थई. ५७.
नानादर्पणस्थपुद्गला एव नानामुखाकारेण परिणता, न चैकं देवदत्तमुखं नानारूपेण
परिणतम्
परिणमतीति चेत्तर्हि दर्पणस्थप्रतिबिम्बं चैतन्यं प्राप्नोतीति, न च तथा किन्तु
यद्येक एव जीवो भवति, तदैकजीवस्य सुखदुःखजीवितमरणादिके प्राप्ते तस्मिन्नेव क्षणे सर्वेषां
जीवितमरणादिकं प्राप्नोति, न च तथा दृश्यते
अथवा ये वदन्ति यथैकोपि समुद्रः क्वापि
क्षारजलः क्वापि मिष्टजलस्तथैकोऽपि जीवः सर्वदेहेषु तिष्ठतीति तदपि न घटते कथमिति
चेत्जलराश्यपेक्षया तत्रैकत्वं, न च जलपुद्गलापेक्षया तत्रैकत्वम् यदि जलपुद्गलापेक्षया
भवत्येकत्वं तर्हि स्तोकजले गृहीते शेषजलं सहैव किन्नायाति ततः स्थितं
षोडशवर्णिकासुवर्णराशिवदनन्तज्ञानादिलक्षणं प्रत्येकं जीवराशिं प्रति, न चैकजीवापेक्षयैति
अध्यात्मशब्दस्यार्थः कथ्यते मिथ्यात्वरागादिसमस्तविकल्पजालरूपपरिहारेण
स्वशुद्धात्मन्यधि यदनुष्ठानं तदध्यात्ममिति एवं ध्यानसामग्रीव्याख्यानोपसंहाररूपेण गाथा
गता ।।५७।।
मोक्षमार्ग अधिकार [ २६१