Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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चोथी ढाळ ][ १२७
सम्यग्ज्ञानने प्राप्त करीने* सम्यक्चारित्रमां प्रगट करवुं
जोईए; त्यां सम्यक्चारित्रनी भूमिकामां जे कंई राग रहे छे ते
श्रावकने अणुव्रत अने मुनिने महाव्रतना प्रकारनो होय छे, तेने
सम्यग्द्रष्टि पुण्य माने छे, धर्म मानता नथी.
जे श्रावक निरतिचार समाधिमरणने धारण करे छे ते
समतापूर्वक आयुष्य पूरुं थवाथी योग्यता प्रमाणे सोळमां स्वर्ग
सुधी उत्पन्न थाय छे, अने त्यांथी आयुष्य पूर्ण थतां मनुष्य
पर्याय पामे छे; पछी मुनिपद प्रगट करी मोक्ष पामे छे. माटे
सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक चारित्रनुं पालन करवुं ते दरेक आत्म-
हितैषी जीवनुं कर्तव्य छे.
निश्चयसम्यक्चारित्र ते ज खरुं चारित्र छेएम श्रद्धा
करवी अने ते भूमिकामां जे श्रावक अने मुनिना व्रतना
विकल्प ऊठे छे ते खरुं चारित्र नथी पण चारित्रमां थतो दोष
छे, पण ते भूमिकामां तेवो राग आव्या विना रहेतो नथी
अने ते सम्यक्चारित्रमां एवा प्रकारनो राग निमित्त होय तेने
सहचर गणीने तेने व्यवहारसम्यक्चारित्र कहेवामां आवे छे.
व्यवहार सम्यक्चारित्रने खरुं सम्यक्चारित्र मानवानी श्रद्धा
छोडवी जोईए.
न हि सम्यग्व्यपदेशं चारित्रमज्ञानपूर्वकं लभते
ज्ञानान्तरमुक्तं, चारित्राराधनं तस्मात् ।।३८।।
नोंधःअज्ञानपूर्वक चारित्र सम्यक् कहेवातुं नथी. तेथी चारित्रनुं आराधन
ज्ञान थया पछी कहेल छे. [पुरुषार्थसिद्ध्युपाय गा. ३८]