श्रावकने अणुव्रत अने मुनिने महाव्रतना प्रकारनो होय छे, तेने
सम्यग्द्रष्टि पुण्य माने छे, धर्म मानता नथी.
सुधी उत्पन्न थाय छे, अने त्यांथी आयुष्य पूर्ण थतां मनुष्य
पर्याय पामे छे; पछी मुनिपद प्रगट करी मोक्ष पामे छे. माटे
सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक चारित्रनुं पालन करवुं ते दरेक आत्म-
हितैषी जीवनुं कर्तव्य छे.
विकल्प ऊठे छे ते खरुं चारित्र नथी पण चारित्रमां थतो दोष
छे, पण ते भूमिकामां तेवो राग आव्या विना रहेतो नथी
अने ते सम्यक्चारित्रमां एवा प्रकारनो राग निमित्त होय तेने
सहचर गणीने तेने व्यवहारसम्यक्चारित्र कहेवामां आवे छे.
व्यवहार सम्यक्चारित्रने खरुं सम्यक्चारित्र मानवानी श्रद्धा
छोडवी जोईए.