१४२ ][ छ ढाळा
अन्वयार्थः — (जीव) जीव (चहुंगति) चार गतिमां (दुख)
दुख (भरै हैं) भोगवे छे. अने (पंच परिवर्तन) पांच
परावर्तन — पांच प्रकारे परिभ्रमण (करे हैं) करे छे. (संसार)
संसार (सबविधि) सर्व प्रकारे (असारा) सार वगरनो छे
(यामें) तेमां (सुख) सुख (लगारा) लेशमात्र पण (नाहिं) नथी.
भावार्थः — जीवनो अशुद्ध पर्याय ते संसार छे. अज्ञानना
कारणे जीव चार गतिमां दुःख भोगवे छे अने पांचे (द्रव्य,
क्षेत्र, काळ, भव अने भाव) परावर्तन कर्या करे छे, परंतु
क्यारेय शांति पामतो नथी; तेथी करीने खरेखर संसारभाव
बधी रीते सार रहित छे, तेमां जरापण सुख नथी, कारण के
जे रीते सुखनी कल्पना करवामां आवे छे तेवुं सुखनुं स्वरूप
नथी अने जेमां सुख माने छे ते खरी रीते सुख नथी – पण ते
परद्रव्यना आलंबनरूप मलिन भाव होवाथी आकुळता उत्पन्न
करनारो भाव छे. निज आत्मा ज सुखमय छे, तेना ध्रुव
स्वभावमां संसार छे ज नहि — एम स्वसन्मुखतापूर्वक चिंतवन
करी सम्यग्द्रष्टि जीव वीतरागता वधारे छे. ५.