पांचमी ढाळ ][ १४७
७ – आuाव भावना
जो योगनकी चपलाई, तातैं ह्वै आस्रव भाई;
आस्रव दुखकार घनेरे; बुधिवंत तिन्है निरवेरे. ९.
अन्वयार्थः — (भाई) हे भव्य जीव! (योगनकी) योगनी
(जो) जे (चपलाई) चंचळता छे (तातैं) तेनाथी (आस्रव) आस्रव
(ह्वै) थाय छे, अने (आस्रव) ते आस्रव (घनेरे) घणुं (दुखकार)
दुःख करनार छे; माटे (बुधिवंत) समजदार (तिन्है) तेने
(निरवेरे) दूर करे!
भावार्थः — विकारी शुभाशुभ भावरूप जे अरूपी अवस्था
जीवमां थाय छे ते भावआस्रव छे, अने ते समये नवीन
कर्मयोग्य रजकणोनुं स्वयं-स्वतः आववुं (आत्मानी साथे
एकक्षेत्रमां आगमन थवुं) ते द्रव्यास्रव छे. [अने तेमां जीवना
अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र छे.]
पुण्य – पाप बेय आस्रव अने बंधना भेद छे.
पुण्यः — दया, दान, भक्ति, पूजा, व्रत वगेरे शुभभाव