Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 10 (Dhal 5).

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१४८ ][ छ ढाळा
सरागी जीवने होय छे, ते अरूपी अशुद्ध भाव छे; अने ते
भावपुण्य छे. अने ते समये नवीन कर्मयोग्य रजकणोनुं स्वयं-
स्वतः आववुं (आत्मानी साथे एकक्षेत्रमां आगमन थवुं) ते
द्रव्यपुण्य छे. [तेमां जीवना अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र छे.]
पापहिंसा, असत्य, चोरी, इत्यादि जे अशुभ भाव
छे ते भावपाप छे अने ते समये कर्मयोग्य पुद्गलोनुं आगमन
थवुं ते द्रव्यपाप छे. [तेमां जीवना अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र
छे.]
परमार्थथी (खरेखर-वास्तवमां) पुण्य-पाप (शुभाशुभ
भाव) आत्माने अहितकर छे, तथा आत्मानी क्षणिक अशुद्ध
अवस्था छे. द्रव्यपुण्य-पाप तो पर वस्तु छे ते कांई आत्मानुं
हित-अहित करी शकता नथी. आम बराबर निर्णय दरेक ज्ञानी
जीवने होय छे, अने आ प्रमाणे विचार करी सम्यग्द्रष्टि जीव
स्वद्रव्यना आलंबनना बळथी जेटला अंशे आस्रवभावने दूर
करे छे तेटला अंशे तेने वीतरागतानी वृद्धि थाय छे, तेने
आस्रव भावना कहेवामां आवे छे. ९.
संवर भावना
जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम-अनुभव चित दीना;
तिनही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके. १०.
अन्वयार्थ(जिन) जेओए (पुण्य) शुभ भाव अने
(पाप) अशुभ भाव (नहिं कीना) कर्या नथी, अने मात्र (आतम)