भावपुण्य छे. अने ते समये नवीन कर्मयोग्य रजकणोनुं स्वयं-
स्वतः आववुं (आत्मानी साथे एकक्षेत्रमां आगमन थवुं) ते
द्रव्यपुण्य छे. [तेमां जीवना अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र छे.]
थवुं ते द्रव्यपाप छे. [तेमां जीवना अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र
छे.]
अवस्था छे. द्रव्यपुण्य-पाप तो पर वस्तु छे ते कांई आत्मानुं
हित-अहित करी शकता नथी. आम बराबर निर्णय दरेक ज्ञानी
जीवने होय छे, अने आ प्रमाणे विचार करी सम्यग्द्रष्टि जीव
स्वद्रव्यना आलंबनना बळथी जेटला अंशे आस्रवभावने दूर
करे छे तेटला अंशे तेने वीतरागतानी वृद्धि थाय छे, तेने
आस्रव भावना कहेवामां आवे छे. ९.
तिनही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके. १०.