Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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पांचमी ढाळ ][ १५९
पुण्यदया, दान, पूजा, भक्ति, व्रतादिना शुभभाव-मंद
कषाय ते जीवना चारित्रगुणनी अशुद्ध अवस्था छे;
पुण्य-पाप बेय आस्रव छे. बंधनना कारणो छे.
बोधसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी एकता.
मुनि (साधु परमेष्ठी)समस्त व्यापारथी विमुक्त, चार
प्रकारनी आराधनामां सदा लीन, निर्ग्रंथ अने निर्मोह
एवा सर्व साधु होय छे, बधा भावलिंगी मुनिने नग्न
दिगम्बर दशा तथा साधुना २८ मूळगुण होय छे.
योगमन, वचन, कायाना निमित्तथी आत्माना प्रदेशोनुं कंपन
थवुं तेने द्रव्ययोग कहेवाय छे; कर्म अने नोकर्मने ग्रहण
करवामां निमित्तरूप जीवनी शक्तिने भावयोग कहेवाय
छे.
शुभ उपयोगदेवपूजा, स्वाध्याय, दया, दान वगेरे
शुभभावरूप आचरण.
सकलव्रत५-महाव्रत, ५-समिति, ६-आवश्यक, ५-इन्द्रियजय,
७-केशलोच, अस्नान, भूमिशयन, अदंतधोवन,
ऊभाऊभा भोजन, दिनमां एक वखत आहारपाणी
तथा नग्नता वगेरेनुं पालन ते व्यवहारथी सकलव्रत
छे; अने रत्नत्रयनी एकतारूप आत्मस्वभावमां स्थिर
थवुं ते निश्चयथी सकलव्रत छे.
सकलव्रती(सकलव्रतना धारक) रत्नत्रयनी एकतारूप