छे अर्थात
आक्रोश, याचना, सत्कार-पुरस्कार, अलाभ, अदर्शन, प्रज्ञा अने
अज्ञान
होवाथी स्वरूपमां सावधानीना कारणे जेटला अंशे राग-द्वेषनी
उत्पत्ति थती नथी, तेटला अंशे तेमने निरन्तर परिषहजय होय
छे. वळी क्षुधादिक लागतां तेना नाशनो उपाय न करवो तेने ते
(अज्ञानी जीव) परिषहसहनता कहे छे. हवे उपाय तो न कर्यो
अने अंतरंगमां क्षुधादि अनिष्ट सामग्री मळतां दुःखी थयो तथा
रति आदिनुं कारण मळतां सुखी थयो, पण ए तो दुःख-सुखरूप
परिणाम छे, अने ए ज आर्त्त-रौद्रध्यान छे, एवा भावोथी संवर
केवी रीते थाय?
कारणो मळतां सुखी न थाय पण ज्ञेयरूपथी तेनो जाणवावाळो
ज रहे; ए ज साचो परिषहजय छे. ६.