Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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छठ्ठी ढाळ ][ १७५
प्रहार करनार ए बधामां समभाव (राग-द्वेषनो अभाव) राखे
छे अर्थात
् कोईना उपर राग-द्वेष करता नथी.
प्रश्नसाचो परिषहजय कोने कहे छे?
उत्तरक्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, डांस-मच्छर, चर्या,
शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श, मल, नग्नता, अरति, स्त्री, निषद्या,
आक्रोश, याचना, सत्कार-पुरस्कार, अलाभ, अदर्शन, प्रज्ञा अने
अज्ञान
ए बावीस प्रकारना परिषहो छे. भावलिंगी मुनिने
दरेक समये त्रण कषायनो (अनंतानुबंधी वगेरेनो) अभाव
होवाथी स्वरूपमां सावधानीना कारणे जेटला अंशे राग-द्वेषनी
उत्पत्ति थती नथी, तेटला अंशे तेमने निरन्तर परिषहजय होय
छे. वळी क्षुधादिक लागतां तेना नाशनो उपाय न करवो तेने ते
(अज्ञानी जीव) परिषहसहनता कहे छे. हवे उपाय तो न कर्यो
अने अंतरंगमां क्षुधादि अनिष्ट सामग्री मळतां दुःखी थयो तथा
रति आदिनुं कारण मळतां सुखी थयो, पण ए तो दुःख-सुखरूप
परिणाम छे, अने ए ज आर्त्त-रौद्रध्यान छे, एवा भावोथी संवर
केवी रीते थाय?
प्रश्नत्यारे केवी रीते परिषहजय थाय?
उत्तरतत्त्वज्ञानना अभ्यासथी कोई पदार्थ इष्ट-अनिष्ट
न भासे, दुःखना कारणो मळतां दुःखी न थाय तथा सुखना
कारणो मळतां सुखी न थाय पण ज्ञेयरूपथी तेनो जाणवावाळो
ज रहे; ए ज साचो परिषहजय छे. ६.
(मोक्षमार्ग प्र० पृ. २३२)