मुनि साथमें वा एक विचरैं, चहैं नहिं भवसुख कदा;
यों है सकलसंयम-चरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब,
जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै परकी प्रवृति सब. ७.
धर्मने (धरैं) धारण करे छे, अने (रतनत्रय) सम्यग्दर्शन-
सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्रनुं (सदा) हमेशां (सेवैं) सेवन
करे छे, (मुनि साथमें) मुनिओना संघमां (वा) अथवा (एक)
एकला (विचरैं) विचरे छे, अने (कदा) कोई पण वखत
(भवसुख) संसारना सुखोने (नहिं चहैं) चाहता नथी. (यों)
आ प्रकारे (सकलसंयम-चरित) सकल संयम चारित्र (है) छे;
(अब) हवे (स्वरूपाचरन) स्वरूपाचरण चारित्र (सुनिये)
सांभळो. (जिस) जे स्वरूपाचरण चारित्र [स्वरूपमां रमणतारूप
चारित्र] (होत) प्रगट थतां (आपनी) पोताना आत्मानी
(निधि) ज्ञानादिक संपत्ति (प्रगटै) प्रगट थाय छे, तथा (परकी)
पर वस्तुओ तरफनी (सब) बधां प्रकारनी (प्रवृति) प्रवृत्ति
(मिटै) मटी जाय छे.