Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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छठ्ठी ढाळ ][ १७७
प्रकारना तपना शुभ विकल्प होय छे ते व्यवहार तप छे.
वीतरागभावरूप उत्तमक्षमादि परिणाम ते धर्म छे. भावलिंगी
मुनिने उपर कह्यां तेवां तप अने धर्मनुं आचरण होय छे.
तेओ मुनिओना संघ साथे अथवा एकला विहार करे छे. कोई
पण समये संसारना सुखने इच्छता नथी. आ रीते सकल
चारित्रनुं स्वरूप कह्युं.
(२) अज्ञानी जीव अनशन आदि तपथी निर्जरा माने
छे, पण केवळ बाह्य तप ज करवाथी तो निर्जरा थाय नहि.
शुद्धोपयोग निर्जरानुं कारण छे तेथी उपचारथी तपने पण
निर्जरानुं कारण कह्युं छे. जो बाह्य दुःख सहन करवुं ए ज
निर्जरानुं कारण होय तो पशु वगेरे पण भूख-तृषादि सहन
करे छे.
प्रश्नए तो पराधीनपणे सहे छे, पण स्वाधीनपणे
धर्मबुद्धिथी उपवास आदि तप करे तेने तो निर्जरा थाय छे?
उत्तरधर्मबुद्धिथी बाह्य उपवासादिक करे त्यां उपयोग
तो अशुभ, शुभ वा शुद्धरूपजीव जेम परिणमे तेम
परिणमो, उपवासना प्रमाणमां जो निर्जरा थाय तो निर्जरानुं
मुख्य कारण उपवासादिक ज ठरे, पण एम तो बने नहि,
कारण के
परिणाम दुष्ट थतां उपवास आदि करतां पण
निर्जरा थवी केम संभवे? अहीं जो एम कहेशो के अशुभ-
शुभ-शुद्धरूप उपयोग परिणमे ते अनुसार बंध-निर्जरा छे, तो
उपवास आदि तप निर्जरानुं मुख्य कारण क्यां रह्युं? त्यां तो