१७८ ][ छ ढाळा
अशुभ-शुभ परिणाम बंधना कारण ठर्या, तथा शुद्ध परिणाम
निर्जरानुं कारण ठर्या.
प्रश्नः — जो एम छे तो अनशन आदिने तप संज्ञा केवी
रीते कही?
उत्तरः — तेने बाह्य तप कह्या छे, बाह्यनो अर्थ ए छे के
बहार बीजाओने देखाय के आ तपस्वी छे, पण पोते तो जेवो
अंतरंग परिणाम थशे तेवुं फळ पामशे.
(३) वळी अंतरंग तपोमां पण प्रायश्चित्त, विनय,
वैयावृत्य, स्वाध्याय, त्याग अने ध्यानरूप क्रियामां बाह्य प्रवर्तन
छे ते तो बाह्य तप जेवुं ज जाणवुं — जेवी अनशनादि बाह्य क्रिया
छे तेवी ए पण बाह्य क्रिया छे, तेथी प्रायश्चित्त आदि बाह्य
साधन पण अंतरंग तप नथी.
परंतु एवुं बाह्य प्रवर्तन थतां जे अंतरंग परिणामोनी
शुद्धता थाय तेनुं नाम अंतरंग तप जाणवुं, – अने त्यां तो निर्जरा
ज छे, बंध थतो नथी. वळी ए शुद्धतानो अल्प अंश पण रहे
तो जेटली शुद्धता थई तेनाथी तो निर्जरा छे तथा जेटलो
शुभभाव छे तेनाथी तो बंध छे. ए प्रमाणे अनशन आदि
क्रियाने तपसंज्ञा उपचारथी छे एम जाणवुं, अने तेथी ज तेने
व्यवहार-तप कह्यो छे. व्यवहार अने उपचारनो एक अर्थ छे.
घणुं शुं कहीए? एटलुं ज समजी लेवुं के — निश्चयधर्म तो
वीतरागभाव छे तथा अन्य अनेक प्रकारना भेदो निमित्तनी