जाणवी. आ रहस्यने (अज्ञानी) जाणतो नथी तेथी तेने
निर्जरानुं
करवानो अभिप्राय तो गयो नथी. जेम कोई राजादिकना
भयथी वा मोटाई-आबरू-प्रतिष्ठाना लोभथी परस्त्री सेवतो
नथी तो तेने त्यागी कही शकाय नहि; ते ज प्रमाणे आ पण
क्रोधादिनो त्यागी नथी. तो केवी रीते त्यागी होय?
तत्त्वज्ञानना अभ्यासथी कोई इष्ट-अनिष्ट न भासे त्यारे स्वयं
क्रोधादिक ऊपजतां नथी अने त्यारे ज साचा क्षमादि थाय छे.
(मोक्षमार्ग प्र
अनंतदर्शन-अनंतसुख अने अनंतवीर्य वगेरे शक्तिओनो पूर्ण
विकास प्रगट थाय छे अने परपदार्थ तरफनी बधां प्रकारनी
प्रवृत्ति दूर थाय छे-ते स्वरूपाचरणचारित्र छे. ७.