१८० ][ छ ढाळा
स्वरुपाचरणचारित्र(शुद्धोपयोग)नुं वर्णन
जिन परम पैनी सुबुधि छैनी, डारि अंतर भेदिया,
वरणादि अरु रागादितैं, निज भावको न्यारा किया;
निजमांहिं निजके हेतु निजकर, आपको आपै गह्यो,
गुण-गुणी ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, मँझार कछु भेद न रह्यो. ८.
*जेवी रीते छीणी लोढाने कापे छे अने बे कटका करी नाखे छे, तेवी
रीते शुद्धोपयोग कर्मोने कापे छे अने आत्माथी ते कर्मोने जुदा करी
नाखे छे.
अन्वयार्थः — (जिन) जे वीतरागी मुनिराज (परम)
अत्यंत (पैनी) तीक्ष्ण (सुबुधि) सम्यग्ज्ञान अर्थात् भेद-
विज्ञानरूपी (छैनी) छीणी* (डारि) नाखीने (अंतर) अंतरंगमां
(भेदिया) भेद करीने (निज भावको) आत्माना वास्तविक
स्वरूपने (वरणादि) वर्ण, रस, गंध तथा स्पर्शरूपी द्रव्यकर्मथी
(अरु) अने (रागादितैं) राग – द्वेषादिरूप भावकर्मथी (न्यारा