हेतु) पोता माटे (निजकर) आत्मा वडे (आपको) आत्माने
(आपै) स्वयं पोताथी (गह्यो) ग्रहण करे छे त्यारे (गुण) गुण
(गुणी) गुणी (ज्ञाता) ज्ञाता (ज्ञेय) ज्ञाननो विषय अने
(ज्ञानमँझार) ज्ञानमें-आत्मामां (कछु भेद न रह्यो) जरापण भेद
[विकल्प] रहेतो नथी.
वगेरेना बे भाग करी जुदा पाडी नाखे छे तेम, पोताना
अंतरंगमां भेदविज्ञानरूपी छीणी वडे पोताना आत्माना
स्वरूपने द्रव्यकर्मथी तथा शरीरादिक नोकर्मथी अने राग-
द्वेषादिरूप भावकर्मोथी भिन्न करीने पोताना आत्मामां, आत्मा
माटे, आत्मा वडे, आत्माने स्वयं जाणे छे त्यारे तेने
स्वानुभवमां गुण, गुणी तथा ज्ञाता, ज्ञान अने ज्ञेय एवा
कोईपण भेदो रहेता नथी. ८.
चिद्भाव कर्म, चिदेश करता, चेतना किरिया तहाँ;
तीनों अभिन्न अखिन्न शुध-उपयोगकी निश्चल दशा,
प्रगटी जहाँ द्रग-ज्ञान-व्रत ये, तीनधा एकै लसा. ९.