न) विकल्प होतो नथी, (तहां) त्यां तो (चिद्भाव) आत्मानो
स्वभाव ज (कर्म) कर्म, (चिदेश) आत्मा ज (करता) कर्ता,
(चेतना) चैतन्यस्वरूप आत्मा ज (किरिया) क्रिया होय छे-
अर्थात
उपयोगकी) शुद्ध उपयोगनो (निश्चल) निश्चळ (दशा) पर्याय
(प्रगटी) प्रगट थाय छे; (जहां) जेमां (द्रग-ज्ञान-व्रत)
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र (ये तीनधा) ए त्रणे
(एकै) एकरूपथी-अभेदरूपथी (लसा) शोभायमान होय छे.
अने ध्येय एवा भेद रहेता नथी, वचननो विकल्प होतो