Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८२ ][ छ ढाळा
अन्वयार्थ(जहँ) जे स्वरूपाचरण चारित्रमां (ध्यान)
ध्यान (ध्याता) ध्याता अने (ध्येयको) ध्येयए त्रणना (विकल्प)
भेद (न) होतां नथी अने (जहां) ज्यां (वच) वचननो (भेद
न) विकल्प होतो नथी, (तहां) त्यां तो (चिद्भाव) आत्मानो
स्वभाव ज (कर्म) कर्म, (चिदेश) आत्मा ज (करता) कर्ता,
(चेतना) चैतन्यस्वरूप आत्मा ज (किरिया) क्रिया होय छे-
अर्थात
् कर्ता, कर्म अने क्रिया ए त्रणे (अभिन्न) भेदरहित-
एक, (अखिन्न) अखंड [बाधारहित] थई जाय छे, एम (शुध
उपयोगकी) शुद्ध उपयोगनो (निश्चल) निश्चळ (दशा) पर्याय
(प्रगटी) प्रगट थाय छे; (जहां) जेमां (द्रग-ज्ञान-व्रत)
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र (ये तीनधा) ए त्रणे
(एकै) एकरूपथी-अभेदरूपथी (लसा) शोभायमान होय छे.
भावार्थवीतरागी मुनिराज स्वरूपाचरण वखते
ज्यारे आत्मध्यानमां मग्न थई जाय छे त्यारे ध्यान, ध्याता
अने ध्येय एवा भेद रहेता नथी, वचननो विकल्प होतो