Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 10 (Dhal 6).

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छठ्ठी ढाळ ][ १८३
नथी, त्यां (आत्मध्यानमां) तो आत्मा ज कर्म*, आत्मा ज
कर्ता* अने आत्मानो भाव ते क्रिया* होय छे अर्थात् कर्ता-
कर्म अने क्रिया ए त्रणे तद्दन अखंडअभिन्न थई जाय
छे. शुद्धोपयोगनी अटळ दशा प्रगट थाय छे अने सम्यग्दर्शन-
सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र पण एकसाथे एकरूप थईने
प्रकाशमान थाय छे. ९.
स्वरुपाचरणचारित्रनुं लक्षण अने निर्विकल्प धयान
परमाण-नय-निक्षेपकौ, न उद्योत अनुभवमें दिखै,
द्रग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखैं;
मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं,
चित
्-पिंड चंड अखंड सुगुणकरंड च्युत पुनि कलनितैं. १०.
*
नोंधकर्म=कर्ता द्वारा थयेलुं कार्य; कर्ता=स्वतंत्रपणे करे ते
कर्ता; क्रिया=कर्ता द्वारा थती प्रवृत्ति.