Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८४ ][ छ ढाळा
अन्वयार्थ[ते स्वरूपाचरण चारित्र वखते मुनिओना]
(अनुभवमें) आत्म-अनुभवमां (परमाण) प्रमाण, (नय) नय
अने (निक्षेपको) निक्षेपनो विकल्प (उद्योत) प्रगट (न दिखै)
देखातो नथी. [परंतु एवो विचार होय छे के] हुं (सदा) सदाय
(द्रग-ज्ञान-सुख-बलमय) अनंतदर्शन-अनंतज्ञान-अनंतसुख अने
अनंतवीर्यमय छुं. (मों विखैं) मारा स्वरूपमां (आन) अन्य
राग-द्वेषादिक (भाव) भाव (नहि) नथी, (मैं) हुं (साध्य) साध्य
(साधक) साधक तथा (कर्म) कर्म (अरु) अने (तसु) तेना
(फलनितैं) फळोना (अबाधक) विकल्परहित (चित्पिंड) ज्ञान-
दर्शन-चेतनास्वरूप (चंड) निर्मळ तेम ज ऐश्वर्यवान (अखंड)
अखंड (सुगुण करंड) सुगुणोनो भंडार (पुनि) अने (कलनितैं)
अशुद्धताथी (च्युत) रहित छुं.
भावार्थआ स्वरूपाचरण चारित्र वखते मुनिओना
आत्मअनुभवमां प्रमाण-नय अने निक्षेपनो विकल्प तो ऊठतो
नथी पण गुणगुणीनो भेद पण होतो नथी
एवुं ध्यान होय
छे. प्रथम एवुं ध्यान होय छे के हुं अनंतदर्शन-अनंतज्ञान-
अनंतसुख अने अनंतवीर्यरूप छुं, मारामां कोई रागादिक
भावो नथी. हुं ज साध्य, हुं ज साधक छुं तथा कर्म अने
कर्मना फळथी जुदो छुं. ज्ञानदर्शन-चेतनास्वरूप निर्मळ ऐश्वर्य-
वान, तेम ज अखंड सहज शुद्ध गुणोनो भंडार अने पुण्य-
पापथी रहित छुं.
आशय ए छे के सर्व प्रकारना विकल्पोथी रहित