Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 11 (Dhal 6).

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छठ्ठी ढाळ ][ १८५
निर्विकल्प आत्मस्थिरताने स्वरूपाचरण चारित्र कहे छे. १०.
स्वरुपाचरणचारित्र अने अरिहंत अवस्था
यों चिन्त्य निजमें थिर भये, तिन अकथ जो आनंद लह्यो,
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्रके नाहीं कह्यो;
तब ही शुकल ध्यानाग्नि करि, चउघाति विधि-कानन दह्यो,
सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोकको शिवमग कह्यो. ११.
अन्वयार्थ[स्वरूपाचरण चारित्रमां] (यों) आ प्रमाणे
(चिन्त्य) विचार करीने (निजमें) आत्मस्वरूपमां (थिर भये)
लीन थतां (तिन) ते मुनिओने (जो) जे (अकथ) कही न
शकाय एवो
वचनथी पार (आनंद) आनंद (लह्यो) थाय छे
(सो) ते आनंद (इन्द्र) इन्द्रने, (नाग) नागेन्द्रने, (नरेन्द्र)
चक्रवर्तीने (वा अहमिन्द्र कैं) के अहमिन्द्रने (नाहीं कह्यो)
कहेवामां आव्यो नथी-थतो नथी. (तबही) ते स्वरूपाचरण
चारित्र प्रगट थया पछी ज्यारे (शुकल ध्यानाग्नि करि)
शुक्लध्यानरूपी अग्नि वडे (चउघाति विधि-कानन) चार