सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्रके नाहीं कह्यो;
तब ही शुकल ध्यानाग्नि करि, चउघाति विधि-कानन दह्यो,
सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोकको शिवमग कह्यो. ११.
लीन थतां (तिन) ते मुनिओने (जो) जे (अकथ) कही न
शकाय एवो
चक्रवर्तीने (वा अहमिन्द्र कैं) के अहमिन्द्रने (नाहीं कह्यो)
कहेवामां आव्यो नथी-थतो नथी. (तबही) ते स्वरूपाचरण
चारित्र प्रगट थया पछी ज्यारे (शुकल ध्यानाग्नि करि)
शुक्लध्यानरूपी अग्नि वडे (चउघाति विधि-कानन) चार