छठ्ठी ढाळ ][ १८७
एकाग्रताथी-शुक्लध्यानरूप अग्निवडे चार *घातिकर्मनो नाश
थाय छे अने अर्हंत अवस्थानी प्राप्ति थाय छे तथा केवळ-
ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे — जेमां त्रण लोक अने त्रण काळनी सर्वे
वातो स्पष्ट जाणे छे अने भव्य जीवोने मोक्षमार्गनो उपदेश
आपे छे. ११.
सिद्ध अवस्था (सिद्ध परमात्मा)नुं वर्णन
पुनि घाति शेष अघाति विधि, छिनमाहिं अष्टम भू वसैं,
वसु कर्म विनसैं सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं;
संसार खार अपार पारावार तरि तिरहिं गये,
अविकार अकल अरूप शुचि, चिद्रूप अविनाशी भये. १२.
*घातिकर्म बे प्रकारना छे — द्रव्यघातिकर्म अने भावघातिकर्म. तेमां
शुक्ल ध्यानवडे शुद्ध अवस्था प्रगट थतां भावघातिकर्मरूप अशुद्ध
पर्याय उत्पन्न थता नथी ते भावघातिकर्मनो नाश छे अने ते ज
समये द्रव्यघातिकर्मनो स्वयं अभाव थाय छे ते द्रव्यघातिकर्मनो
नाश छे.