दुःखदायी अने अगाध समुद्रथी पार थयेल छे; तथा ते ज जीव
निर्विकारी, अशरीरी, अमूर्तिक शुद्ध चैतन्यरूप अने अविनाशी
थईने सिद्धदशाने पाम्या छे. १२.
रहि हैं अनंतानंत काल, यथा तथा शिव परिणये;
धनि धन्य हैं जे जीव, नरभव पाय यह कारज किया,
तिनही अनादि भ्रमण पंचप्रकार तजि, वर सुख लिया. १३.
पर्याय (प्रतिबिम्बित थये) झळकवा लागे छे अर्थात
तेम (अनंतानंत) अनंतकाळ सुधी (रहिहैं) रहेशे.