कर्युं, ते जीव (धनि धन्य हैं) घणा धन्यवादने पात्र छे; अने
(तिनही) तेवा ज जीवोए (अनादि) अनादिकाळथी चाल्युं
आवतुं (पंच प्रकार) पांच प्रकारना परिवर्तनरूप (भ्रमण)
संसारमां रखडवानुं (तजी) छोडी दईने (वर) उत्तम (सुख) सुख
(लिया) प्राप्त कर्युं छे.
त्रणे काळना पर्यायो सहित एक साथे, स्वच्छ अरीसाना
द्रष्टांते
मोक्षदशाने पाम्या छे तथा ते दशा त्यां रहेलां अन्य सिद्ध-
मुक्त जीवोनी माफक अनंत अनंतकाळ
वगेरेमां जरापण बाधा आवती नथी. आ पुरुषपर्याय पामीने
जे जीवोए आ शुद्ध चैतन्यनी प्राप्तिरूप कार्य कर्युं छे ते जीवो
संसारना कारणोनो सर्वथा नाश कर्यो ते फरी अवतार-जन्म धारण
करे नहि. अथवा जेम माखणमांथी घी थया पछी फरीने घीनुं
माखण थाय नहि तेम आत्मानी संपूर्ण पवित्रतारूप अशरीर
मोक्षदशा (परमात्मपद) प्रगट कर्या पछी तेमां कदी अशुद्धता
आवती नथी-संसारमां फरी आववुं पडतुं नथी.