Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 14 (Dhal 6).

< Previous Page   Next Page >


Page 191 of 205
PDF/HTML Page 213 of 227

 

background image
छठ्ठी ढाळ ][ १९१
अत्यंत धन्यवादने (प्रशंसाने) पात्र छे; अने तेओए
अनादिकाळथी चाल्या आवता पांच परावर्तनरूप संसारना
परिभ्रमणनो त्याग करी उत्तम सुख
मोक्षसुखप्राप्त कर्युं
छे. १३.
रत्नत्रयनुं फळ अने आत्महितमां प्रवृत्तिनो उपदेश
मुख्योपचार दु भेद यों बडभागि रत्नत्रय धरैं,
अरु धरेंगे ते शिव लहैं, तिन सुयश-जल जग-मल हरैं;
इमि जानि, आलस हानि, साहस ठानि, यह सिख आदरौ,
जबलौं न रोग जरा गहै, तबलौं झटिति निज हित करौ. १४.
अन्वयार्थ(बडभागि) जे महापुरुषार्थी जीव (यों) आ
प्रमाणे (मुख्योपचार) निश्चय अने व्यवहार (दु भेद) ए बे
प्रकारना (रत्नत्रय) रत्नत्रयने (धरैं अरु धरेंगे) धारण करे छे
अने करशे (ते) ते (शिव) मोक्ष (लहैं) पामे छे तथा पामशे; अने
(तिन) ते जीवना (सुयश-जल) सुकीर्तिरूपी जल (जग-मल)
संसाररूपी मेलनो (हरैं) नाश करे छे अने करशे. (इमि) एम
(जानि) जाणीने (आलस) प्रमाद [स्वरूपमां असावधानी]
(हानि) छोडीने (साहस) हिंमत-पुरुषार्थ (ठानि) करीने (यह)
आ (सिख) शिखामण-उपदेश (आदरौ) ग्रहण करो के (जबलौं)
ज्यां सुधी (रोग जरा) रोग के घडपण (न गहै) न आवे
(तबलौं) त्यां सुधीमां (झटिति) शीघ्र (निजहित) आत्मानुं हित
(करौ) करी लेवुं जोईए.