अनादिकाळथी चाल्या आवता पांच परावर्तनरूप संसारना
परिभ्रमणनो त्याग करी उत्तम सुख
अरु धरेंगे ते शिव लहैं, तिन सुयश-जल जग-मल हरैं;
इमि जानि, आलस हानि, साहस ठानि, यह सिख आदरौ,
जबलौं न रोग जरा गहै, तबलौं झटिति निज हित करौ. १४.
प्रकारना (रत्नत्रय) रत्नत्रयने (धरैं अरु धरेंगे) धारण करे छे
अने करशे (ते) ते (शिव) मोक्ष (लहैं) पामे छे तथा पामशे; अने
(तिन) ते जीवना (सुयश-जल) सुकीर्तिरूपी जल (जग-मल)
संसाररूपी मेलनो (हरैं) नाश करे छे अने करशे. (इमि) एम
(जानि) जाणीने (आलस) प्रमाद [स्वरूपमां असावधानी]
(हानि) छोडीने (साहस) हिंमत-पुरुषार्थ (ठानि) करीने (यह)
आ (सिख) शिखामण-उपदेश (आदरौ) ग्रहण करो के (जबलौं)
ज्यां सुधी (रोग जरा) रोग के घडपण (न गहै) न आवे
(तबलौं) त्यां सुधीमां (झटिति) शीघ्र (निजहित) आत्मानुं हित
(करौ) करी लेवुं जोईए.