हेय तत्त्वोनुं स्वरूप समजीने पोताना शुद्ध उपादान-आश्रित
निश्चयरत्नत्रय (शुद्धात्म आश्रित वीतरागभावरूप मोक्षमार्ग)ने
धारण करे छे, तथा करशे ते जीव पूर्ण पवित्रतारूप मोक्षदशाने
पामे छे तथा पामशे. (गुणस्थानना प्रमाणमां शुभ राग आवे
छे ते व्यवहार रत्नत्रयनुं स्वरूप जाणवुं अने तेने उपादेय न
मानवुं तेनुं नाम व्यवहाररत्नत्रयनुं धारण करवुं कहेवाय छे;)
जे जीवो मोक्ष पाम्या अने पामशे तेनुं सुकीर्तिरूपी जळ केवुं
छे?
हरवानुं निमित्त छे. आम जाणीने प्रमादने छोडी, साहस
एटले पाछो न फरे एवो अखंडित पुरुषार्थ राखी आ उपदेश
अंगीकार करो. ज्यां सुधी रोग अने घडपणे शरीरने घेर्युं
नथी ते पहेलां (वर्तमानमां ज) शीघ्र आत्मानुं हित करी लेवुं
जोईए. १४.
चिर भजे विषय-कषाय अब तो त्याग निजपद बेईए;
कहा रच्यो पर पदमें, न तेरो पद यहै, क्यों दुख सहै,
अब ‘दौल’! होउ सुखी स्वपद रचि, दाव मत चूकौ यहै. १५.