Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९६ ][ छ ढाळा
चारित्र चोथा गुणस्थानथी शरू थाय छे, अने मुनिदशामां वधारे
उच्च थाय छे. त्यारपछी शुक्लध्यानवडे चार घाति कर्मनो नाश
थतां ते जीव केवळज्ञान पामीने अरिहंतपद पामे छे; पछी
बाकीना चार अघाति कर्मनो पण नाश करीने क्षणमात्रमां मोक्ष
पामीने संसारथी कायमने माटे विदाय थई जाय छे त्यारे ते
आत्मामां अनंतकाळ सुधी अनंत चतुष्टयनो (अनंत-ज्ञान-
दर्शन-सुख-वीर्यनो) एक सरखो अनुभव थया करे छे, पछी
तेने पंच परावर्तनरूप संसारमां भटकवुं पडतुं नथी. कदी
अवतार धारण करवा पडता नथी. सदाय अक्षय-अनंत सुखने
अनुभवे छे. अखंडित ज्ञान-आनंदरूप अनंतगुणमां निश्चल रहे
छे तेने मोक्षस्वरूप कहे छे.
जे जीव मोक्षनी प्राप्ति माटे आ रत्नत्रयने धारण करे छे
अने करशे ते मोक्ष पामे छे अने पामशे. दरेक जीव मिथ्यात्व,
कषाय अने विषयोनुं सेवन तो अनादि काळथी करतो आव्यो
छे पण तेनाथी तेने जरापण शांति मळी नथी, शांतिनुं एकमात्र
कारण मोक्षमार्ग, तेमां ज ते जीवे तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति कदी करी
नथी, तेथी हवे पण जो शांतिनी (आत्महितनी) इच्छा होय
तो आळस छोडी (आत्मानुं) कर्तव्य समजी रोग अने घडपण
वगेरे आव्या पहेलां ज मोक्षमार्गमां प्रवृत्त थवुं जोईए, केम के
आ पुरुषपर्याय, सत्समागम वगेरे सुयोग वारंवार प्राप्त थता
नथी, माटे तेने पामीने व्यर्थ गुमाववो न जोईए-आत्महित
साधी लेवुं जोईए.