चारित्रने (जीव) भावे छे, ते (जीव) प्रतिक्रमण छे.
(नियमसार गाथा-९१)
प्रमाणः — स्व-पर वस्तुनुं निश्चय करनार सम्यग्ज्ञान.
बहिरंग तपः — बीजा जोई शके एवा पर पदार्थोथी संबंध
राखवावाळो इच्छानिरोध.
मनोगुप्तिः — मन तरफ उपयोग न जतां आत्मामां ज लीनता.
महाव्रतः — निश्चय रत्नत्रयपूर्वक त्रणे योग (मन, वचन,
काया) तथा करण-करावण-अनुमोदन सहित हिंसादि
पांच पापोनो सर्वथा त्याग. (हिंसा, जूठ, चोरी,
अब्रह्म अने परिग्रह — ए पांच पापनो सर्वथा
त्याग.)
रत्नत्रयः — निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र.
वचनगुप्तिः — बोलवानी इच्छा गोपववी अर्थात् आत्मामां
लीनता.
शुक्ल ध्यानः — अत्यंत निर्मळ, वीतरागता पूर्ण ध्यान.
शुद्ध उपयोगः — शुभाशुभ राग-द्वेषादिथी रहित आत्मानी
चारित्रपरिणति.
समितिः — प्रमाद रहित यत्नाचार सहित सम्यक् प्रवृत्ति.
स्वरूपाचरण चारित्रः — आत्मस्वरूपमां एकाग्रतापूर्वक रमणता-
लीनता.
छठ्ठी ढाळ ][ २०१