Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 22-26.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६७
अत्राह शिष्यः यद्येवमात्मास्ति तस्योपास्तिः कथमिति स्पष्टम् आत्मसेवोपायप्रश्नोऽयम्
यहाँ पर शिष्य कहता है कि यदि इस तरहका आत्मा है तो उसकी उपासना कैसे
की जानी चाहिए ? इसमें आत्मध्यान या आत्मभावना करनेके उपायोंको पूछा गया है
(२) आत्मा अनंतसौख्यवान छे एटले के आत्माना द्रव्यस्वभावमां अतीन्द्रिय
अनंत सुख छे. आवुं परिपूर्ण सुख सर्वज्ञ भगवानने ज होय, कारण के
(१) घातिकर्मोना अभावने लीधे, (२) परिणाम (परिणमन) कोई उपाधि नही होवाथी
अने (३) केवळज्ञान निष्कंप
स्थिरअनाकुळ होवाने लीधे, केवळज्ञान सुखस्वरूप ज छे,
जोके आत्माने संसार - अवस्थामां कर्म साथे संबंध होवाथी ते गुण विभावरूप
परिणमे छे, ते वास्तविक सुखरूप परिणमतो नथी, परंतु ज्यारे आत्मा घातिकर्मथी सर्वथा
मुक्त थाय छे अर्थात् स्वात्मोपलब्धिने प्राप्त करे छे, त्यारे ते गुणनो पूर्ण विकास थतां
आत्मा अनंतसुखस्वभावरूप परिणमे छे.
(३) व्यवहारनयथी आ जीव नामकर्मप्राप्त देह प्रमाण छे, परंतु निश्चयनयथी ते
लोकाकाश प्रमाण असंख्यातप्रदेशी छे. जोके व्यवहारनयथी ते प्रदेशोना संकोचविस्तार सहित
छे. तोपण सिद्ध अवस्थामां संकोच
विस्तारथी रहित शरीर प्रमाणे तेनो आकार छे.
(४) द्रव्यार्थिकनयथी आत्मा टंकोत्कीर्ण ज्ञानना अखंड स्वभावे ध्रुव छेअविनाशी
छे, परंतु पर्यायार्थिकनये ते उत्पादव्यय सहित छे, अर्थात् प्रतिक्षण विनाशिक छे.
(५) आत्मा स्वसंवेदनगम्य छे. ‘अहं अस्मि’ हुं छुं एवा अन्तर्मुखाकाररूपथी जे
ज्ञान अथवा अनुभव थाय छे, तेनाथी आत्मानी सत्ता स्वतःसिद्ध थाय छे. ज्ञानीजनने
अन्तर्बाह्य जल्पो अथवा संकल्पोनो परित्याग करी आत्मस्वरूपनुं आत्मा द्वारा आत्मामां ज
जे अनुभव या वेदन थाय छे, ते स्वसंवेदन छे. आ स्वसंवेदननी अपेक्षाए आत्मा प्रत्यक्ष
छे.
ज्यां आत्मा ज ज्ञेय अने आत्मा ज ज्ञायक होय छे, त्यां चैतन्यनी ते परिणतिने
स्वसंवेदन प्रमाण कहे छे. तेने आत्मानुभव या आत्मदर्शन पण कहे छे. २१.
अहीं शिष्य कहे छे के जो आत्मा आवा प्रकारनो छे, तो तेनी उपासना केवी रीते
करवी जोईए? आत्मउपासनाना उपायनो आ प्रश्न छेए स्पष्ट छे.
१. जुओ, श्री प्रवचनसारगु. आवृत्ति गा. ६० भावार्थ.
२. जुओ, श्री परमात्मप्रकाशकगा. ४३/
२ भावार्थ अने द्रव्यसंग्रह गाथा१०.

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६८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
गुरुराह
संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतसः
आत्मानमात्मवान्न् ध्यायेदात्मनैवात्मनि स्थितम् ।।२२।।
टीकाध्यायेत् भावयेत् कोऽसौ ? आत्मवान् गुप्तेन्द्रियमना ध्वस्तस्वायत्तवृतिर्वा
कं ? आत्मानं यथोक्तस्वभावं पुरुषम् केन ? आत्मनैव स्वसंवेदनरूपेण स्वेनैव तज्ज्ञप्तौ
करणान्तराभावात्
आचार्य कहते हैं
मनको कर एकाग्र, सब इन्द्रियविषय मिटाय
आतमज्ञानी आत्ममें, निजको निजसे ध्याय ।।२२।।
अर्थमनकी एकाग्रतासे इन्द्रियोंको वशमें कर ध्वस्त-नष्ट कर दी है, स्वच्छन्द
वृत्ति जिसने ऐसा पुरुष अपनेमें ही स्थित आत्माको अपने ही द्वारा ध्यावे
विशदार्थजिसने इन्द्रिय और मनको रोक लिया है अथवा जिसने इन्द्रिय और
मनकी उच्छृंखला एवं स्वैराचाररूप प्रवृत्तिको ध्वस्त कर दिया है, ऐसा आत्मा जिसका
स्वरूप पहिले (नं
२१ के श्लोकमें) बता आये हैं, आत्माको आत्मासे ही यानी स्वसंवेदनरूप
आचार्य कहे छेः
इन्द्रियविषयो निग्रही, मन एकाग्र लगाय,
आत्मामां स्थित आत्मने, ज्ञानी निजथी ध्याय. २२
अन्वयार्थ :[चेतसः ] (भाव) मननी [एकाग्रत्वेन ] एकाग्रताथी [करणग्रामं ]
इन्द्रियोना समूहने [संयम्य ] वश करी [आत्मवान् ] आत्मवान् पुरुषे [आत्मनि ] पोतानामां
(आत्मामां) [स्थितं ] स्थित [आत्मानं ] आत्माने [आत्मना एव ] आत्मा द्वारा ज [ध्यायेत् ]
ध्यावो जोईए.
टीका :ध्याववो जोईएभाववो जोईए. कोणे? आत्मवान् (पुरुषे) अर्थात्
जेणे इन्द्रियो अने मनने गोपवेल छे. (संयममां राखेल छे) अथवा जेणे इन्द्रियो अने
मननी स्वैराचाररूप (स्वच्छंद) प्रवृत्तिनो नाश करी दीधो छे एवा आत्माए. कोने
(ध्याववो)? आत्माने एटले जेनो स्वभाव पहेलां (श्लोक २१मां) बताव्यो छे तेवा पुरुषने
(आत्माने); शा वडे? आत्मा वडे ज अर्थात् स्वसंवेदनरूप पोताथी ज (प्रत्यक्ष ज्ञानथी ज)

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६९
उक्तं च [तत्त्वानुशासने ]
स्वपरज्ञप्तिरूपत्वात् न तस्य करणान्तरम्
ततश्चिन्तां परित्यज्य स्वसंवित्यैव वेद्यताम् ।।१६२।।
क्व तिष्ठन्तमित्याह, आत्मनि स्थितं, वस्तुतः सर्वभावानां स्वरूपमात्राधारत्वात् किं
कृत्वा ? संयम्य रूपादिभ्यो व्यावृत्य किं ? करणग्रामं चक्षुरादीन्द्रियगणम् केनोपायेन ?
एकाग्रत्वेन एकं विवक्षितमात्मानं तद् द्रव्यं पर्यायो वा अग्रं प्राधान्येनालम्बनं विषयो यस्य अथवा
प्रत्यक्ष ज्ञानसे ही ध्यावे, कारण कि स्वयं आत्मामें ही उसकी ज्ञप्ति (ज्ञान) होती है उस
ज्ञप्तिमें और कोई करणान्तर नहीं होते जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है
‘‘स्वपरज्ञप्तिरूपत्वात्’’
‘‘वह आत्मा स्वपर-प्रतिभासस्वरूप है वह स्वयं ही स्वयंको जानता है, और परको
भी जानता है उसमें उससे भिन्न अन्य करणोंकी आवश्यकता नहीं है इसलिए चिन्ताको
छोड़कर स्वसंवित्ति-स्वसंवेदनके द्वारा ही उसे जानो, जो कि खुदमें ही स्थित है कारण
कि परमार्थसे सभी पदार्थ स्वरूपमें ही रहा करते हैं इसके लिए उचित है कि मनको
एकाग्र कर चक्षु आदिक इन्द्रियोंकी अपने-अपने विषयों (रूप आदिकों)से व्यावृत्ति करे ’’
यहाँ पर संस्कृतटीकाकार पंडित आशाधरजीने ‘एकाग्र’ शब्दके दो अर्थ प्रदर्शित किये हैं
(ध्याववो जोईए), कारण के ते ज्ञप्तिमां बीजा करण (साधन)नो अभाव छे. (स्वयं आत्मा
ज ज्ञप्तिनुं साधन छे.)
‘तत्त्वानुशासन’श्लोक १६२मां कह्युं छे केः
‘ते आत्मा स्वपर ज्ञप्तिरूप होवाथी (अर्थात् ते स्वयं स्वने अने परने पण
जाणतो होवाथी तेने (तेनाथी भिन्न) अन्य करणनो (साधननो) अभाव छे. माटे चिंताने
छोडी स्वसंवित्ति (एटले स्वसंवेदन) द्वारा ज तेने जाणवो जोईए.’
(शिष्ये) पूछ्युंक्यां रहेला (आत्माने)? आत्मामां स्थित (थयेलाने), कारण के
वस्तुतः (वास्तविक रीते) सर्व पदार्थोने स्वरूपमात्र ज आधार छे (अर्थात् सर्व पदार्थो
पोतपोताना स्वरूपमां ज स्थित होय छे). शुं करीने? रूपादि (विषयो)थी रोकीने (संयमित
करीने) अर्थात् पाछी वाळीने. कोने? इन्द्रियोना समूहने
एटले चक्षु आदि इन्द्रियगणने.
कया उपायथी? एकाग्रपणाथीअर्थात् एक एटले विवक्षित आत्मा ते द्रव्य वा पर्याय
ते अग्र एटले प्रधानपणे अवलंबनभूत विषय छे, जेनोते एकाग्र;

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७० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
एकं पूर्वापरपर्यायाऽनुस्यूतं अग्रमात्मग्राह्यं यस्य तदेकाग्रं तद्भावेन कस्य ? चेतसो मनसः
अयमर्थो यत्र क्वचिदात्मन्येव वा श्रुतज्ञानावष्टम्भात् आलम्बितेन मनसा इन्द्रियाणि निरुद्धय
स्वात्मानं च भावयित्वा तत्रैकाग्रतामासाद्य चिन्तां त्यक्त्वा स्वसंवेदनेनैवात्मानमनुभवेत्
उक्तं च
‘‘गहियं तं सुअणाणा पच्छा संवेयणेण भाविज्ज
जो ण हु सुयमवलंवइ सो मुज्झइ अप्पसब्भावो ।।’’
एक कहिए विवक्षित कोई एक आत्मा, अथवा कोई एक द्रव्य, अथवा पर्याय, वही है अग्र
कहिए प्रधानतासे आलम्बनभूत विषय जिसका ऐसे मनको कहेंगे ‘एकाग्र’
अथवा एक
कहिए पूर्वापर पर्यायोंमें अविच्छिन्नरूपसे प्रवर्तमान द्रव्य-आत्मा वही है, अग्र-आत्मग्राह्य
जिसका ऐसे मनको एकाग्र कहेंगे
सारांश यह है, कि जहाँ कहीं अथवा आत्मामें ही श्रुतज्ञानके सहारेसे भावनायुक्त
हुए मनके द्वारा इन्द्रियोंको रोक कर स्वात्माकी भावना कर उसीमें एकाग्रताको प्राप्त कर
चिन्ताको छोड़ कर स्वसंवेदनके ही द्वारा आत्माका अनुभव करे
जैसा कि कहा भी है
‘‘गहियं तं सुअणाणा’’
अर्थ‘‘उस (आत्मा)को श्रुतज्ञानके द्वारा जानकर पीछे संवेदन (स्वसंवेदन)में
अनुभव करे जो श्रुतज्ञानका आलम्बन नहीं लेता वह आत्मस्वभावके विषयमें गड़बड़ा जाता
एकाग्रनो बीजो अर्थः
एक एटले पूर्वापर पर्यायोमां अनुस्यूतरूपथी (अविच्छिन्नरूपथी) प्रवर्तमान अग्र
एटले आत्मा जेनोते एकाग्रतेना भावथी एटले एकाग्रताथी.
कोना? चित्तना(भाव) मनना. तेनो आ अर्थ छेज्यां कहीं अथवा आत्मामां ज
श्रुतज्ञाननी सहायथी, मनना आलंबन द्वारा इन्द्रियोने रोकीने तथा पोताना आत्माने भावीने
तेमां एकाग्रता प्राप्त करी, चिंता छोडी, स्वसंवेदन द्वारा ज आत्मानो अनुभव करवो.
‘अनगारधर्मामृततृतीय अध्याय’मां कह्युं छे के
‘तेने (आत्माने) श्रुतज्ञान द्वारा ग्रहण करी (जाणी) संवेदन (स्वसंवेदन) द्वारा
अनुभव करवो. जे श्रुतज्ञाननुं अवलंबन लेतो नथी ते आत्मस्वभावना विषयमां मुंझाई
जाय छे (गभराई जाय छे).
तथा ‘समाधिशतक’श्लोक ३२मां कह्युं छे केः

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७१
तथा च [समाधितंत्रे ]प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितम्
बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानन्दनिर्वृतम् ।।३२।।
है इसी तरह यह भी भावना करे कि जैसा कि पूज्यपादस्वामीके समाधिशतकमें कहा
है‘‘प्राच्याव्य विषयेभ्योऽहं’’
‘‘मैं इन्द्रियोंके विषयोंसे अपनेको हटाकर अपनेमें स्थित ज्ञानस्वरूप एवं
परमानन्दमयी आपको अपने ही द्वारा प्राप्त हुआ हूँ ।।२२।।
‘हुं इन्द्रियोना विषयोथी हठावी पोतानामां स्थित ज्ञानस्वरूप तथा परमानंदमयी
आत्माने आत्मा द्वारा प्राप्त थयो छुं.’
भावार्थ :प्रथम श्रुतज्ञान द्वारा आत्माने जाणवो, पछी आत्मामां एकाग्र थवाथी
इन्द्रियोनी बाह्य प्रवृत्ति स्वयं अटकी जशे अर्थात् तेमनी स्वच्छंद प्रवृत्तिनो नाश थशे अने ते
एकाग्रताथी अन्य चिंतानो निरोध थई ध्यानावस्थामां स्वसंवेदन द्वारा आत्मानो अनुभव
थशे.
‘‘जे ज्ञान पांच इन्द्रिय अने छठ्ठा मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं, ते ज्ञान सर्व बाजुथी
समेटाई निर्विकल्प अनुभवमां केवळ स्वरूपसन्मुख थयुं, केम के आ ज्ञान क्षयोपशमरूप छे.
ते एक काळमां एक ज्ञेयने ज जाणी शके. हवे ते ज ज्ञान स्वरूप जाणवाने प्रवर्त्युं त्यारे
अन्यने जाणवानुं सहेज ज बंध थयुं. त्यां एवी दशा थई के बाह्य अनेक शब्दादिक विकार
होवा छतां पण स्वरूपध्यानीने तेनी कांई खबर नथी. ए प्रमाणे मतिज्ञान पण स्वरूपसन्मुख
थयुं. वळी नयादिकना विचारो मटवाथी श्रुतज्ञान पण स्वरूपसन्मुख थयुं......तेथी जे ज्ञान
इन्द्रियो अने मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं ते ज ज्ञान हवे निज अनुभवमां प्रवर्ते छे, तथापि
आ ज्ञानने अतीन्द्रिय कहीए छीए
.’’
आत्मा स्वपर प्रतिभासस्वरूप छे अर्थात् स्वपर प्रकाशक छे. ते स्वयं पोताने
जाणतां पर जणाई जाय छे, तेथी जाणवा माटे तेने बीजां करणोनी (साधनोनी) आवश्यकता
रहेती नथी.
स्वसंवेदनमां ज्ञप्तिक्रियानी निष्पत्ति माटे बीजुं कोई करण अथवा साधकतम हेतु
नथी, कारण के आत्मा स्वयं स्वपर ज्ञप्तिरूप छे. माटे कारणान्तरनी (बीजा कारणनी)
चिंता छोडी स्वज्ञप्ति द्वारा ज आत्माने जाणवो जोईए. २२
१. मोक्षमार्ग प्रकाशकगु. आ. श्री टोडरमल्लजीनी रहस्यपूर्ण चिठ्ठीपृ. ३४५.

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७२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अथाह शिष्यः ! आत्मोपासनया किमिति भगवन्नात्मसेवनया किं प्रयोजनं स्यात् ?
फलप्रतिपत्तिपूर्वकत्वात् प्रेक्षावत्प्रवृत्तेरितिपृष्टः सन्नाचष्टे :
अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः
ददाति यत्तु यस्मास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ।।२३।।
टीकाददाति कासौ, अज्ञानस्य देहादेर्मूढभ्रान्तसंदिग्धगुर्वादेर्वा उपास्तिः सेवा किं ?
यहाँ पर शिष्यका कहना है कि भगवन् ! आत्मासे अथवा आत्माकी उपासना करनेसे
क्या मतलब सधेगाक्या फल मिलेगा ? क्योंकि विचारवानोंकी प्रवृत्ति तो फलज्ञानपूर्वक हुआ
करती है, इस प्रकार पूछे जाने पर आचार्य जवाब देते हैं
अज्ञभक्ति अज्ञानको, ज्ञानभक्ति दे ज्ञान
लोकोक्ती जो जो धरे, करे सो ताको दान ।।२३।।
अर्थअज्ञान कहिये ज्ञानसे रहित शरीरादिककी सेवा अज्ञानको देती है, और
ज्ञानी पुरुषोंकी सेवा ज्ञानको देती है यह बात प्रसिद्ध है, कि जिसके पास जो कुछ होता
है, वह उसीको देता है, दूसरी चीज़ जो उसके पास है नहीं, वह दूसरेको कहाँसे देगा ?
विशदार्थअज्ञान शब्दके दो अर्थ हैं, एक तो ज्ञान रहित शरीरादिक और दूसरे
पछी शिष्य पूछे छे‘भगवन्! आत्मानी उपासनानुं प्रयोजन शुं?
अर्थात् आत्मानी सेवाथी शो मतलब सरे? कारण के विचारवानोनी प्रवृत्ति तो फळज्ञानपूर्वक
होय छे.
एवी रीते पूछवामां आवतां आचार्य कहे छेः
अज्ञभक्ति अज्ञानने, ज्ञानभक्ति दे ज्ञान,
लोकोक्ति‘जे जे धरे, करे ते तेनुं दान.’ २३.
अन्वयार्थ :[अज्ञानोपास्ति ] अज्ञाननी (अर्थात् ज्ञानरहित शरीरादिनी) उपासना
(सेवा) [अज्ञानं ददाति ] अज्ञान आपे छे (अर्थात् अज्ञाननी उपासनाथी अज्ञाननी प्राप्ति
थाय छे), [ज्ञानिसमाश्रयः ] अने ज्ञानीनी सेवा [ज्ञानं ददाति ] ज्ञान आपे छे (अर्थात् ज्ञानी
पुरुषोनी सेवाथी ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे). [यत् तु यस्य अस्ति तद् एव ददाति ] जेनी पासे
जे होय छे ते ज आपे छे, [इदं सुप्रसिद्धं वचः ] ए सुप्रसिद्ध वात छे.
टीका :आपे छे. कोण ते? अज्ञाननी उपासनाअर्थात् अज्ञान एटले

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७३
अज्ञानं, मोहभ्रमसन्देहलक्षणं तथा ददाति कासौ ? ज्ञानिनः स्वभावस्यात्मनो ज्ञानसंपन्नगुर्वादेर्वा
समाश्रयः अनन्यपरया सेवनम् किं ? ज्ञानं स्वार्थावबोधम्
उक्तं च
ज्ञानमेव फलं ज्ञाने ननु श्लाध्यमनश्वरम्
अहो मोहस्य माहात्म्य मन्यदप्यत्र मृग्यते ।।
मिथ्याज्ञान (मोह-भ्रांति-संदेह)वाले मूढ़-भ्रांत तथा संदिग्ध गुरु आदिक सो इनकी उपासना
या सेवा अज्ञान तथा मोह-भ्रमव संदेह लक्षणात्मक मिथ्याज्ञानको देती है और ज्ञानी
कहिये, ज्ञानस्वभाव आत्मा तथा आत्मज्ञानसम्पन्न गुरुओंकी तत्परताके साथ सेवा,
स्वार्थावबोधरूप ज्ञानको देती है
जैसा कि श्री गुणभद्राचार्यने आत्मानुशासनमें कहा है
‘‘ज्ञानमेव फलं ज्ञाने’’
ज्ञान होनेका फल, प्रशंसनीय एवं अविनाशी ज्ञानका होना ही है, यह निश्चयसे
जानो अहो ! यह मोहका ही माहात्म्य है, जो इसमें ज्ञानको छोड़ कुछ और ही फल
ढूँढ़ा जाता है ज्ञानात्मासे ज्ञानकी ही प्राप्ति होना न्याय है इसलिए हे भद्र ! ज्ञानीकी
उपासना करके प्रगट हुई है स्व पर विवेकरूपी ज्योति जिसको ऐसा आत्मा, आत्माके द्वारा
आत्मामें ही सेवनीय है, अनन्यशरण होकर भावना करनेके योग्य है
’’ ।।२३।।
शरीरादिसंबंधी मिथ्या भ्रान्ति अथवा संदिग्ध (अज्ञानी) गुरु आदिक तेनी उपासना
सेवा. शुं (आपे छे)? अज्ञानने अर्थात् मोहभ्रमसंदेहलक्षणवाळा अज्ञानने
(मिथ्याज्ञानने); तथा आपे छे, कोण ते? ज्ञानीनीअर्थात् ज्ञानस्वभाव आत्मानी वा
आत्मज्ञानसंपन्न गुरु आदिनीसेवा अर्थात् अनन्यपराथी (तत्परताथी) सेवा. शुं. (आपे
छे)? ज्ञान अर्थात् स्वार्थावबोधलक्षणवाळुं ज्ञान (आपे छे).
श्री गुणभद्राचार्ये ‘आत्मानुशासन’ श्लो१७५मां कह्युं छे केः
‘ज्ञाननुं (ज्ञाननी उपासनानुं) फळ, प्रशंसनीय अविनाशी सम्यक्ज्ञान ज छे. ए
निश्चयथी जाणो. अहो! ए मोहनुं ज माहात्म्य छे के (ज्ञानने छोडी) अहीं पण (एटले
आ उपासनामां पण) बीजुं शोधे छे.’
शिष्य पूछे छेआ बाबतमां शुं द्रष्टान्त छे?
आचार्य कहे छे‘यत्तु यस्यास्ति तदेव ददाति एनो अर्थ ए छे के जेनी पासे जे
होय ते ज आपे छेअर्थात् जेने स्वाधीन जे छे, ते तेनी उपासना करवामां आवतां आपे

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७४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
को अत्र दृष्टान्त इत्याह यदित्यादि ददातीत्यत्रापि योज्यं ‘तुं अवधारणे’ तेनायमर्थः
संपद्यते यद्येव यस्य स्वाधीनं विद्यते स सेव्यमानं तदेव ददातीत्येतद्वाक्यं लोके सुप्रतीतमतो
भद्र ज्ञानिनमुपास्य समुजृम्भितस्वपरविवेकज्योतिरजस्रमात्मानमात्मनि सेवस्व
अत्राप्याह शिष्यः ज्ञानिनोध्यात्मस्वस्थस्य किं भवतीति निष्पन्नयोग्यपेक्षया स्वात्मध्यान-
फलप्रश्नोयम्
गुरुराह
परीषहाद्यविज्ञानादास्रवस्य निरोधिनी
जायतेऽध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ।।२४।।
यहाँ फि र भी शिष्य कहता है कि अध्यात्मलीन ज्ञानीको क्या फल मिलता है ?
इसमें स्वात्मनिष्ठ योगीकी अपेक्षासे स्वात्मध्यानका फल पूछा गया है आचार्य कहते हैं
परिषहादि अनुभव बिना, आतम-ध्यान प्रताप
शीघ्र ससंवर निर्जरा, होत कर्मकी आप ।।२४।।
छे. आ वाक्य लोकमां सुप्रतीत छे. तेथी हे भद्र! ज्ञानीनी उपासना करीने प्रगट थई छे,
स्व-पर विवेकरूपी ज्योति जेनी एवा आत्माने आत्मा द्वारा आत्मामां ज निरंतर सेव.
भावार्थःअज्ञानीनी उपासना करवाथी अज्ञाननी अने ज्ञानीनी उपासना
करवाथी ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे, कारण के जेनी पासे जे होय ते ज प्राप्त थाय. माटे जेने
स्व
परना भेदविज्ञाननी ज्योति प्रगट थई छे, तेणे आत्मानी आत्मा वडे आत्मामां ज
निरंतर उपासना करवी योग्य छे. २३.
अहीं, वळी शिष्य कहे छेअध्यात्मलीन ज्ञानीने शुं थाय छे (शुं फळ मळे छे)?
निष्पन्न (स्वात्मनिष्ठ) योगीनी अपेक्षाए स्वात्मध्यानना फळनो आ प्रश्न छे.
आचार्य कहे छेः
आत्मध्यानना योगथी, परीसहो न वेदाय,
शीघ्र ससंवर निर्जरा, आस्रवरोधन थाय. २४.
अन्वयार्थ :[अध्यात्मयोगेन ] अध्यात्मयोगथी (आत्मामां आत्माना [परीषहाद्य-
विज्ञानात् ] परीषहादिकनो (मनुष्य, तिर्यंच, देवादिना घोर उपसर्गो अथवा कष्टो आदिनो)

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७५
टीकाजायते भवति कासौ ? निर्जरा एकदेशेन संक्षयो विश्लेष इत्यर्थः केषां ?
कर्मणां सिद्धयोग्यपेक्षयाऽशुभानां च शुभानां साध्ययोग्यपेक्षया त्वसद्वेद्यादीनां कर्मणाम् कथमाशु
सद्यः। केन ? अध्यात्मयोगेन आत्मन्यात्मनः प्रणिधानेन, किं केवला ? नेत्याहनिरोधिनी
प्रतिषेधयुक्ता, कस्यास्रवस्यागमनस्य कर्मणामित्यत्रापि योज्यम् कुत इत्याह, परीषहाणां
क्षुधादिदुःखभेदानामादिशब्दाद्देवादिकृत्तोपसर्गबाधानां चाविज्ञानादसंवेदनात्
तथा चोक्तम्
अर्थआत्मामें आत्माके चिंतवनरूप ध्यानसे परीषहादिकका अनुभव न होनेसे
कर्मोंके आगमनको रोकनेवाली कर्म-निर्जरा शीघ्र होती है
विशदार्थअध्यात्मयोगसे आत्मामें आत्माका ही ध्यान करनेसे कर्मोंकी निर्जरा
(एकदेशसे कर्मोंका क्षय हो जाना, कर्मोंका सम्बन्ध छूट जाना) हो जाती है उसमें भी
जो सिद्धयोगी हैं, उनके तो अशुभ तथा शुभ दोनों ही प्रकारोंके कर्मोंकी निर्जरा हो जाती
है
और जो साध्ययोगी हैं, उनके असातावेदनीय आदि अशुभ कर्मोंकी निर्जरा होती है
कोरी निर्जरा होती हो सो बात नहीं है अपि तु भूख-प्यास आदि दुःखके भेदों (परीषहों)
अनुभव (वेदन) नहि होवाथी (उपसर्गादि तरफ लक्ष नहि होवाथी) [आस्रवस्य ]
(कर्मोना) आस्रवने (आगमनने) [निरोधिनी ] रोकवावाळी [कर्मणां निर्जरा ] कर्मोनी निर्जरा
[आशु ] शीघ्र [जायते ] थाय छे.
टीका :थाय छे. कोण ते? निर्जरा अर्थात् (कर्मोनो) एकदेश संक्षयविश्लेष
अथवा संबंध छूटवो ते (खरी पडवुं ते) एवो अर्थ छे. कोनी (निर्जरा)? कर्मोनी;
सिद्धयोगीनी अपेक्षाए (अर्थात् जे सिद्धयोगी छे तेनां तो) अशुभ तथा शुभ कर्मोनी
निर्जरा अने साध्ययोगीनी अपेक्षाए असातावेदनीय आदिनी निर्जरा थाय छे. केवी
रीते? शीघ्र
जलदी. शा वडे? अध्यात्मयोग द्वारा एटले आत्मामां आत्माना ध्यानथी.
शुं केवल (निर्जरा थाय छे)? (गुरुए) कह्युं, ‘‘ना, ‘निरोधिनी शब्द प्रतिषेध (निषेध)
बतावे छे.’’ कोनो (प्रतिषेध)? आस्रवनो
कर्मोना आगमननो, एम अहीं समजवुं.
कह्युं, ‘शाथी’? परीषहोनोअर्थात् क्षुधा आदि दुःखना भेदोरूप परीषहोनो तथा
‘आदि’ शब्दथी देवो वगेरेथी करेला उपसर्गनी बाधानो अनुभव (वेदन) नहि होवाथी
(बाधा तरफ उपयोग नहि होवाथी) अथवा तेनुं संवेदन नहि होवाथी (कर्मोना
आगमनने आस्रवने रोकवारूप) जूनां कर्मनी निर्जरा साथे संवर पण थाय छे.
वळी ‘आत्मानुशासन’श्लोक २४६मां कह्युं छे केः

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७६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘यस्य पुण्यं च पापं च निष्फलं गलति स्वयम्
स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनरास्रवः’ ।।।।
तथा च[तत्त्वानुशासने ]
‘तथा ह्यचरमाङ्गस्य ध्यानमभ्यस्यतः सदा
निर्जरा संवरश्चास्य सकलाशुभकर्मणाम् ।।२२५।।
अपि च[समाधितन्त्रे ]
की तथा देवादिकोंके द्वारा किये गये उपसर्गोंकी बाधाकों अनुभवमें न लानेसे कर्मोंके
आगमन (आस्रव) को रोक देनेवाली निर्जरा भी होती है
जैसा कि कहा भी है :
‘‘यस्य पुण्यं च पापं च’’
‘‘जिसके पुण्य और पापकर्म, बिना फल दिये स्वयमेव (अपने आप) गल जाते
हैंखिर जाते हैं, वही योगी है उसको निर्वाण हो जाता है उसके फि र नवीन कर्मोंका
आगमन नहीं होता इस श्लोक द्वारा पुण्य-पापरूप दोनों ही प्रकारके कर्मोंकी निर्जरा होना
बतलाया है और भी तत्त्वानुशासनमें कहा है‘‘तथा ह्यचरमांगस्य’’
चरमशरीरीके ध्यानका फल कह देनेके बाद आचार्य अचरमशरीरीके ध्यानका फल
बतलाते हुए कहते हैंकि जो सदा ही ध्यानका अभ्यास करनेवाला है, परन्तु जो
अचरमशरीरी है, (तद्भवमोक्षगामी नहीं है) ऐसे ध्याताको सम्पूर्ण अशुभ कर्मोंकी निर्जरा व
संवर होता है
अर्थात् बह प्राचीन एवं नवीन समस्त अशुभ कर्मोंका संवर तथा निर्जरा
करता है इस श्लोक द्वारा पापरूप कर्मोंकी ही निर्जरा व उनका संवर होना बतलाया
‘जेनां पुण्य अने पाप कर्म फळ आप्या विना स्वयमेव (पोतानी मेळे ज) गळी
(झरी) जाय छे, ते योगी छे. तेनो निर्वाण (मोक्ष) थाय छे अने तेने वळी आस्रव थतो
नथी.’
(आ श्लोकमां पुण्य अने पापरूप कर्मोनी निर्जरा बतावी छे),
तथा
‘तत्त्वानुशासन’श्लोक २२५मां कह्युं छे केः
‘जे सदा ध्याननो अभ्यास करे छे, परंतु अचरमशरीरी छे (तद्भवमोक्षगामी
नथी) तेनां (तेवा ध्यातानां) सकल अशुभ कर्मोनी निर्जरा अने संवर थाय छे’.
(आ श्लोकमां पापरूप कर्मोनी ज निर्जरा तथा संवर बताव्यो छे).
वळी, श्री पूज्यपादस्वामीए
‘समाधितन्त्र’
श्लोक ३४मां कह्युं छे केः

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७७
आत्मदेहान्तरज्ञानजनिताह्लादनिर्वृतः
तपसा दुष्कृतं घोरं भुञ्जानोऽपि न खिद्यते ।।३४।।
एतच्च व्यवहारनयादुच्यते कुत इत्याशङ्कायां पुनराचार्य एवाहसा खलु कर्मणो भवति
तस्य सम्बन्धस्तदा कथमिति वत्स ! आकर्णय खलु यस्मात्सा एकदेशेन विश्लेषलक्षणा निर्जरा
कर्मणः चित्सामान्यानुविधायिपुद्गलपरिणामरूपस्य द्रव्यकर्मणः सम्बन्धिनी संभवति द्रव्ययोरेव
संयोगपूर्वविभागसंभवात्
तस्य च द्रव्यकर्मणस्तदा योगिनः स्वरूपमात्रावस्थानकाले सम्बन्धः
प्रत्यासत्तिरात्मना सह कथं ? केन संयोगादिप्रकारेण सम्भवति ? सूक्ष्मेक्षिकया समीक्षस्व, न
गया है और भी पूज्यपादस्वामीने समाधिशतकमें कहा है‘‘आत्मदेहान्तरज्ञान’’
‘‘आत्मा व शरीरके विवेक (भेद) ज्ञानसे पैदा हुए आनन्दसे परिपूर्ण (युक्त) योगी,
तपस्याके द्वारा भयंकर उपसर्गो व घोर परीषहोंको भोगते हुए भी खेद-खिन्न नहीं होते
हैं
यह सब व्यवहारनयसे कहा जाता है कि बन्धवाले कर्मोंकी निर्जरा होती है,
परमार्थसे नहीं कदाचित् तुम कहो कि ऐसा क्यों ? आचार्य कहते हैं कि वत्स ! सुनो,
क्योंकि एकदेशसे सम्बन्ध छूट जाना, इसीको निर्जरा कहते हैं वह निर्जरा कर्मकी
(चित्सामान्यके साथ अन्वयव्यतिरेक रखनेवाले पुद्गलोंके परिणामरूप द्रव्यकर्मकी) हो सकती
है
क्योंकि संयोगपूर्वक विभाग दो द्रव्योंमें ही बन सकता है अब जरा बारीक दृष्टिसे
‘आत्मा अने शरीरना भेदज्ञानथी उत्पन्न थयेला आनंदथी परिपूर्ण (युक्त) योगी,
तपस्या द्वारा भयंकर उपसर्गो तथा घोर परीषहोने भोगवतो होवा छतां खेदखिन्न थतो
नथी.’
आ व्यवहारनयथी कहेवामां आव्युं छे. ‘शाथी’? एवी आशंका थतां, फरीथी
आचार्य ज कहे छेते (निर्जरा) खरेखर कर्मनी थाय छे.
तेनो (कर्मनो) संबंध त्यारे केवी रीते छे?
वत्स! सांभळ. खरेखर ते (निर्जरा) एकदेश (कर्मना) विश्लेषलक्षणवाळी
(छूटवारूप) कर्मनी निर्जरा, चित्सामान्यने अनुविधायी (अनुसरता) पुद्गलपरिणामरूप
द्रव्यकर्म संबंधी होय छे, कारण के बे द्रव्योना संयोगपूर्वक (तेमनो) विभाग (छूटा पडवुं)
संभवे छे.
ज्यारे योगी पुरुष स्वरूपमात्रमां अवस्थान करी रह्यो छे, ते समये द्रव्यकर्मनो

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७८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
कथमपि सम्भवतीत्यर्थः यदा खल्वात्मैव ध्यानं ध्येयं च स्यात्तदा सर्वात्मनाप्यात्मनः परद्रव्याद्
व्यावृत्य स्वरूपमात्रावस्थितत्वात्कथं द्रव्यान्तरेण सम्बन्धः स्यात्तस्य द्विष्ठत्वात् न चैतत्संसारिणो
न संभवतीति वाच्यं संसारतीरप्राप्तस्य योगिनो मुक्तात्मवत्पञ्चह्स्वाक्षरोच्चारणकालं
यावत्तथावस्थानसम्भवात् कर्मक्षपणाभिमुखस्य लक्षणोत्कृष्टशुक्ललेश्यासंस्कारावेशवशात्तावन्मात्र-
कर्मपारतन्त्रव्यवहरणात्
तथाचोक्तम् परमागमे
विचार करो कि उस समय जब कि योगी पुरुष स्वरूपमात्रमें अवस्थान कर रहा है, उस
समय द्रव्यकर्मका आत्माके साथ संयोगादि सम्बन्धोंमेंसे कौनसा सम्बन्ध हो सकता है ?
मतलब यह है कि किसी तरहका सम्बन्ध नहीं बन सकता
जिस समय आत्मा ही ध्यान
और ध्येय हो जाता है, उस समय हर तरहसे आत्मा परद्रव्योंसे व्यावृत होकर केवलस्वरूपमें
ही स्थित हो जाता है
तब उसका दूसरे द्रव्यसे सम्बन्ध कैसा ? क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें
रहा करता है, एकमें नहीं होता है
यह भी नहीं कहना कि इस तरहकी अवस्था संसारी-जीवमें नहीं पाई जाती कारण
कि संसाररूपी समुद्र-तटके निकटवर्ती अयोगीजनोंका मुक्तात्माओंकी तरह पंच ह्रस्व अक्षर
(अ, इ, उ, ऋ, लृ) के बोलनेमें जितना काल लगता है, उतने काल तक वैसा (निर्बन्ध-
बन्ध रहित) रहना सम्भव है
शीघ्र ही जिनके समस्त कर्मोंका नाश होनेवाला है, ऐसे जीवों (चौदहवें
आत्मा साथे संबंध (प्रत्यासत्ति) केवी रीते कया संयोगादि प्रकारे संभवे छे ते जरा
सूक्ष्मद्रष्टिथी विचार कर; अर्थात् कोई रीते (संबंध) संभवतो नथी, एवो अर्थ छे.
ज्यारे खरेखर आत्मा ज ध्यान अने ध्येय थई जाय छे त्यारे सर्व रीते आत्मा
पर द्रव्योथी व्यावृत्त थई, स्वरूपमात्रमां अवस्थित थवाथी बीजा द्रव्य साथे तेनो संबंध
केवी रीते होय? कारण के संबंध तो बे (द्रव्यो) वच्चे होय (एकमां न होय) आवी
(अवस्था) संसारी जीवने संभवती नथी, एम नहि (अर्थात् संभवे छे) एवुं वाच्य छे,
कारण के संसारना कांठाने प्राप्त थयेला अयोगीने, मुक्तात्मानी माफक पांच ह्नस्व
[अ, इ,
उ, ऋ लृ ] बोलवामां जेटलो काळ लागे तेटला काळ सुधी तेवी (निर्बन्ध) अवस्था रहेवी
संभवित छे.
जेमनां समस्त कर्मो शीघ्र नाश थवानां छे, एवा (चौदमा गुणस्थानवर्ती) जीवने

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७९
‘सीलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसवो जीवो
कम्मरयबिप्पमुक्को गयजोगो केवली होदि ।।
गुणस्थानवाले जीवों) में भी उत्कृष्ट शुक्लेश्याके संस्कारके वशसे उतनी देर (पंच ह्रस्व
अक्षर बोलनेमें जितना समय लगता है, उतने समय) तक कर्मपरतन्त्रताका व्यवहार होता
है, जैसा कि परमागम(गोम्मटसार-जीवकांड) में कहा गया है
‘‘सीलेसिं संपत्तो’’
‘‘जो शीलोंके ईशत्व (स्वामित्व) को प्राप्त हो गया है, जिसके समस्त आस्रव रुक
गये हैं, तथा जो कर्मरूपी धूलीसे रहित हो गया है, वह गतयोग-अयोगकेवली होता
है’’
।।२४।।
पण उत्कृष्ट शुक्ललेश्याना संस्कारना आवेशवश तेटला समय सुधी (पांच ह्नस्व स्वर
बोलवामां जेटलो समय लागे त्यां सुधी) कर्म परतन्त्रतानो व्यवहार होय छे; तथा
परमागममां
गोम्मटसार जीवकांडमां कह्युं छे केः
‘जेओ शीलोना (अढार हजार शीलोना) भेदोना इशत्वने (स्वामित्वने) प्राप्त थया
छे, जेमने समस्त आस्रव रोकाई गयो छे तथा जे कर्मरूपी रजथी रहित थई गया छे;
ते गतयोग (अयोग) केवली छे.’
भावार्थ :अध्यात्मयोगथी आत्मामां आत्मानुं ज जोडाण (ध्यान) करवाथी कर्मोनी
निर्जरा थाय छे.
ते ध्यान करनार जीवोना बे प्रकार छेः
(१) सिद्धयोगी अर्थात् जे ते भवे ज मुक्ति पामे छे अने (२) अचरमशरीरी
ध्यानाभ्यासी योगी अर्थात् साध्ययोगीजेओ ते भवे मुक्ति पामता नथी ते
(१) सिद्धयोगी क्षपकश्रेणी मांडी ते ज भवे मोक्ष पामे छे.
आठमा गुणस्थानेथी
ते श्रेणी शरू थाय छे. दशमा गुणस्थान सुधी तेमने शुद्धोपयोग
१. ‘मोह अने योगना निमित्तथी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्ररूप आत्माना गुणोनी
तारतम्यरूप अवस्थाविशेषने गुणस्थान कहे छे. तेना चौद भेद छेः
१. मिथ्यात्व, २. सासादन, ३. मिश्र, ४. अविरतसम्यग्द्रष्टि, ५. देशविरत, ६. प्रमतविरत,
७. अप्रमत्तविरत, ८. अपूर्वकरण, ९. अनिवृतिकरण, १०. सूक्ष्मसंपराय, ११. उपशान्तमोह,
१२. क्षीणमोह, १३. सयोगी केवली अने १४. अयोगी केवली.
(श्री जैन सिद्धान्त प्रवेशिका५९१, ५९२.)

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८० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
श्रूयतां चास्यैवार्थस्य संग्रहश्लोकः
कटस्य कर्त्ताहमिति सम्बधः स्याद् द्वयोर्द्वयोः
ध्यानं ध्येयं यदात्मैव सम्बन्धः कीदृशस्तदा ।।२५।।
उपरिलिखित अर्थको बतलानेवाला और भी श्लोक सुनो
‘कटका मैं कर्तार हूँ’ यह है द्विष्ठ सम्बन्ध
आप हि ध्याता ध्येय जहँ, कै से भिन्न सम्बन्ध ।।२५।।
अर्थ‘‘मैं चटाईका बनानेवाला हूँ’’ इस तरह जुदाजुदा दो पदार्थोंमें सम्बन्ध
साथे अबुद्धिपूर्वक शुभ भाव होय छे; तेमने शुद्धोपयोगना कारणे घातिकर्मनी निर्जरा थाय
छे अने अबुद्धिपूर्वकना शुभ भावने लीधे तेमने घातिकर्मनो तथा अघातिनी शुभकर्मप्रकृतिनो
गुणस्थान अनुसार बंध थाय छे.
वीतरागता प्राप्त थया पछी योगथी मात्र सातावेदनीय कर्मनो आस्रव थाय छे.
१४मा गुणस्थानमां तेमने कर्मोनो संवर परिपूर्ण थाय छे तथा सर्व कर्मोनी निर्जरा १४मा
गुणस्थानने अंते थाय छे. आ प्रमाणे सिद्धयोगीनी दशा होय छे.
(२) साध्ययोगीमुख्यपणे सातमा गुणस्थानवर्ती मुनि साध्ययोगी कहेवाय छे.
ज्यारे तेओ निर्विकल्प स्वरूपमां लीन थाय छे त्यारे जेटला अंशे वीतरागता होय छे तेटला
अंशे घातिकर्मनो बंध थतो नथी, परंतु त्यां अबुद्धिपूर्वक शुभभाव होवाथी तेटला अंशे
घातिकर्मनो तेमज सातावेदनीयादि शुभकर्मनो बंध थाय छे, परंतु असातावेदनीयादि
अशुभकर्मनो बंध थतो नथी.
चोथा पांचमा गुणस्थाने पण धर्मी जीव कोई कोई वखते निर्विकल्प ध्यानमां होय
छे अने त्यारे तेने कर्मोना संवरबंधनी व्यवस्था उपर प्रमाणे होय छे. मुख्यपणे ४
६ गुणस्थानोमां सविकल्प दशा होय छे.
आ ज अर्थने बतावनार संग्रहश्लोक सांभळः
‘चटाईनो करनार हुं’, ए बेनो संयोग,
स्वयं ध्यानने ध्येय ज्यां, केवो त्यां संयोग? २५.
अन्वयार्थ :[अहं ] हुं [कटस्य ] चटाईनो [कर्त्ता ] कर्ता छुं [इति ] ए रीते [द्वयोः

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८१
टीकास्याद् भवेत् कोसौ ? सम्बन्धः द्रव्यादिना प्रत्यासत्तिः कयोः ? द्वयोः
कथंचिद्भिन्नयोः पदार्थयोः इति अनेन लोकप्रसिद्धेन प्रकारेण कथमिति यथाहमस्मि कीदृशः
कर्त्ता निर्माता कस्य ? कटस्य वंशदलानां जलादिप्रतिबन्धाद्यर्थस्य परिणामस्य एवं सम्बन्धस्य
द्विष्ठतां प्रदर्श्य प्रकृतेर्व्यतिरेकमाह ध्यानमित्यादि ध्यायते येन ध्यायति वा यस्तद्धयानं
ध्यातिक्रियां प्रति करणं कर्ता वा
उक्तं च; [तत्त्वानुशासने ]
हुआ करता है जहाँ आत्मा ही ध्यान, ध्याता (ध्यान करनेवाला) और ध्येय हो जाता है,
वहाँ सम्बन्ध कैसा ?
विशदार्थलोकप्रसिद्ध तरीका तो यही है, कि किसी तरह भिन्न (जुदाजुदा)
दो पदार्थोंमें सम्बन्ध हुआ करता है जैसे बाँसकी खपच्चियोंसे जलादिकके सम्बन्धसे
बननेवाली चटाईका मैं कर्ता हूँबनानेवाला हूँ यहाँ बनानेवाला ‘मैं’ जुदा हूँ और
बननेवाली ‘चटाई’ जुदी है तभी उनमें ‘कर्तृकर्म’ नामक सम्बन्ध हुआ करता है इस
प्रकार सम्बन्ध द्विष्ठ (दो में रहनेवाला) हुआ करता है इसको बतलाकर, प्रकृतमें (ध्यानमें)
वह बात (भिन्नता) बिलकुल भी नहीं है, इसको दिखलाते हैं
‘‘ध्यायते येन, ध्यायति वा यस्तद् ध्यानं, ध्यातिक्रियां प्रति करणं कर्त्ता च’’
द्वयोः ] जुदा जुदा बे पदार्थो वच्चे [सम्बन्धः ] संबंध [स्यात् ] होई शके. [यदा ] ज्यारे
[आत्मा एव ] आत्मा ज [ध्यानं ध्येयं ] ध्यान अने ध्येयरूप थई जाय [तदा ] त्यारे [कीदृशः
सम्बन्धः ] संबंध केवो?
टीका :होई शके. कोण ते? संबंध अर्थात् द्रव्यादि साथे प्रत्यासत्ति (निकट
संयोग). कया बंनेनो (संबंध)? आ लोकप्रसिद्ध प्रकार वडे कथंचित् बंने भिन्न पदार्थोनो.
केवी रीते? जेम के ‘हुं छुं.’ केवो (हुं)? कर्ता एटले निर्माता (करनार). कोनो (कर्त्ता)
चटाईनो
अर्थात् वांसनी चीपोना जलादिना संबंधथी उत्पन्न थता पदार्थना
परिणामनोएवी रीते संबंधनुं द्विष्ठपणुं (एटले बंनेमां रहेवावाळा संबंधने) बतावीने
प्रकृतिनी भिन्नता कही (अनादिथी आत्मा अने कर्मनो संयोग संबंध छे, परंतु संबंध बंने
भिन्न पदार्थो वच्चे होई शके, तेथी प्रकृति (कर्म) आत्माथी भिन्न पदार्थ छे एम कह्युं ).
ध्यान इत्यादिजे द्वारा ध्याववामां आवे अर्थात् जे ध्यावे ते ध्यान छे अथवा
ध्यातिक्रियामां जे करण (साधन) होय वा कर्ता होय तेने (सर्वेने) ध्यान कहे छे.
‘तत्त्वानुशासन’श्लोक ६७मां कह्युं छे केः

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८२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘ध्यायते येन तद्धयानं यो ध्यायति स एव वा
यत्र वा ध्यायते यद्वा ध्यातिर्वा ध्यानमिष्यते’ ।।६७।।
ध्यायत इति ध्येयं वा ध्यातिक्रिययाऽऽध्याप्यं यदा यस्मिन्नात्मनः परमात्मना
सहैकीकरणकाले आत्मैव चिन्मात्रमेव स्यात्तदा कीदृशः संयोगादिप्रकारः सम्बन्धो द्रव्यकर्मणा
सहात्मनः स्यात् येन जायतेध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरेति परमार्थतः कथ्यते
जिसके द्वारा ध्यान किया जाय अर्थात् जो ध्यान करनेमें करण होसाधन हो, उसे ध्यान
कहते हैं तथा जो ध्याता हैध्यानका कर्ता है, उसे भी ध्यान कहते हैं, जैसा कि कहा
भी है‘‘ध्यायते येन तद् ध्यानं’’
‘‘जो ध्यैञ् चिन्तायाम्’’ धातुका व्याप्य हो अर्थात् जो ध्याया जावे, उसे ध्येय कहते
है परंतु जब आत्माका परमात्माके साथ +एकीकरण होनेके समय, आत्मा ही चिन्मात्र हो
जाता है, तब संयोगादिक प्रकारोंमेंसे द्रव्यकर्मोंके साथ आत्माका कौनसे प्रकारका सम्बन्ध
होगा ? जिससे कि ‘‘अध्यात्मयोगसे कर्मोंकी शीघ्र निर्जरा हो जाती है’’ यह बात परमार्थसे
कही जावे
भावार्थ यह है कि आत्मासे कर्मोंका सम्बन्ध छूट जाना निर्जरा कहलाती है
परंतु जब उत्कृष्ट अद्वैत ध्यानावस्थामें किसी भी प्रकार कर्मका सम्बन्ध नहीं, तब छूटना
किसका ? इसलिए सिद्धयोगी कहो या गतयोगी अथवा अयोगी केवली कहो, उनमें कर्मोंकी
निर्जरा होती है, यह कहना व्यवहारनयसे ही है, परमार्थसे नहीं
’’ ।।२५।।
‘जे द्वारा ध्यान करवामां आवे छे ते ध्यान अथवा जे ध्यान ध्यावे छे ते ज ध्यान
छे, अथवा जे ध्याववामां आवे छे ते अथवा ध्यातिने ध्यान कहे छे.’
जे ध्याववामां आवे ते ध्येय छे अथवा ध्यातिक्रियाथी ध्येय समजवुं. ज्यारे
आत्माना, परमात्मा साथे एकीकरणना काळे आत्मा ज चिन्मात्र ज थई जाय, त्यारे
द्रव्यकर्म साथे आत्मानो संयोगादि
रूप केवा प्रकारनो संबंध होई शके; जेथी
‘अध्यात्मयोगथी कर्मोनी शीघ्र निर्जरा थई जाय छे’ए संबंधी (श्लोक २४मां) परमार्थे
कहेवामां आव्युं छे?
भावार्थ :चटाई अने चटाईनो कर्ताबंने एकबीजाथी भिन्नभिन्न छे, तेथी
ते बंनेनो संयोग संबंध बनी शके छे, परंतु ध्यान अने ध्येयरूप अवस्था आत्माथी अभिन्न
होवाथी तेनो आत्मा साथे तादात्म्य संबंध छे, संयोग संबंध नथी.
जे समये आत्मा ध्यान अवस्थामां परमात्मरूपनी साथे एकमेक थई जाय छे, ते
समये ध्यान अने ध्येयमां अभिन्नता रहे छे. ते समये चैतन्यरूप आत्मपिंड सिवाय अन्य

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८३
अत्राह शिष्य :तर्हि कथं बन्धस्तत्प्रतिपक्षश्च मोक्ष इति भगवन् !
यद्यात्मकर्मद्रव्ययोरध्यात्मयोगेन विश्लेषः क्रियते तर्हि कथं केनोपायप्रकारेण तर्योबन्धः
परस्परप्रदेशानुप्रवेशलक्षणः संश्लेषः स्यात्
तत्पूर्वकत्वाद्विश्लेषस्य कथं च तत्प्रतिपक्षो
बन्धविरोधीमोक्षः सकलकर्मविश्लेषलक्षणो जीवस्य स्यात्तस्यैवानन्तसुखहेतुत्वेन योगिभिः
प्रार्थनीयत्वात्
यहाँ पर शिष्यका कहना है कि भगवन् ! यदि आत्मद्रव्य और कर्मद्रव्यका
अध्यात्मयोगके बलसे बन्ध न होना बतलाया जाता है, तो फि र किस प्रकारसे उन दोनोंमें
(आत्मा और कर्मरूप पुद्गल द्रव्योंमें) परस्पर एकके प्रदेशोंमें दूसरेके प्रदेशोंका मिल जाना
रूप बंध होगा ? क्योंकि बन्धाभाव तो बंधपूर्वक ही होगा
और बंधका प्रतिपक्षी, संपूर्ण
कर्मोंकी विमुक्तावस्थारूप मोक्ष भी जीवको कैसे बन सकेगा ? जो कि अविच्छिन्न अविनाशी
सुखका कारण होनेसे योगियोंके द्वारा प्रार्थनीय हुआ करता है ?
कोई पर द्रव्यना संबंधनो अभाव होवाथी संयोगादिरूप कोई नवो संबंध घटतो नथी,
परंतु ते अवस्थामां कर्मादिनो जे जूनो संयोग संबंध छे, तेनो पण निर्जरा द्वारा अभाव
थाय छे.
श्लोक-२४मां कह्युं छे के ‘अध्यात्मयोगथी कर्मोनी शीघ्र निर्जरा थाय छे’ए कथन
पूर्वबद्ध कर्मोनी अपेक्षाए छे. ज्यारे आत्मानुं परमात्मा साथे एकीकरण थाय छे, त्यारे
आत्मा ज चिन्मात्र थई जाय छे, तो पछी आत्मानो द्रव्यकर्मो साथे संबंध ज केवी रीते
बने? उत्कृष्ट अद्वैत ध्यानावस्थामां नवा कर्मनो कोई पण प्रकारनो संबंध नथी, तो छूटवुं
कोनुं (निर्जरा कोनी)? तेथी सिद्धयोगी या गतयोगी अथवा अयोगकेवली ने कर्मोनी निर्जरा
कही छे ते पूर्वबद्ध कर्मोनी थाय छे, एम समजवुं. तेमने कर्मोनी निर्जरा थाय छे
ए कहेवुं
ए व्यवहारनयथी छे, निश्चयनयथी नहि. २५
अहीं शिष्य कहे छेत्यारे बंध अने तेनो प्रतिपक्षरूप मोक्ष केवी रीते? भगवान्!
जो अध्यात्मयोगथी आत्मद्रव्य अने द्रव्यकर्मनो विश्लेष (एक बीजाथी भिन्न) करवामां
आवे, तो केवी रीते एटले कया प्रकारना उपाय वडे, ते बंनेनो बंध
अर्थात् परस्पर
प्रदेशानुप्रवेशलक्षण संश्लेष (संयोगरूप बंध) होय? कारण के ते पूर्वक (बंधपूर्वक) ज
विश्लेष (वियोग) होय; अने तेनो प्रतिपक्षी एटले बन्धविरोधी मोक्ष जे संपूर्ण कर्मोना
विश्लेष (अभाव) लक्षणवाळो छे ते जीवने केवी रीते होई शके? कारण के अनंतसुखनुं
कारण होवाथी योगीओ द्वारा ते प्रार्थनीय छे.

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८४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
गुरुराह
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात्
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ।।२६।।
टीकाममेत्यव्ययं ममेदमित्यभिनिवेशार्थमव्ययानामनेकार्थत्वात् तेन सममो
ममेदमित्यभिनिवेशाविष्टो अहमस्येत्यभिनिवेशाविष्टश्चोपलक्षणत्वात् जीवः कर्मभिर्बध्यते
आचार्य कहते हैं
मोही बाँधत कर्मको, निर्मोही छुट जाय
यातें गाढ़ प्रयत्नसे, निर्ममता उपजाय ।।२६।।
अर्थ‘‘ममतावाला जीव बँधता है और ममता रहित जीव मुक्त होता है इसलिए
हर तरहसे पूरी कोशिशके साथ निर्ममताका ही ख्याल रक्खे ’’
विशदार्थअव्ययोंके अनेक अर्थ होते हैं, इसलिए, ‘‘मम’’ इस अव्ययका अर्थ
अभिनिवेश’ है, इसलिए ‘समम’ कहिए ‘मेरा यह है’ इस प्रकारके अभिनिवेशवाला जीव
गुरु कहे छेः
मोही बांधे कर्मने, निर्मम जीव मुकाय,
तेथी सघळा यत्नथी, निर्मम भाव जगाय. २६.
अन्वयार्थ :[सममः जीवः ] ममतावाळो जीव अने [निर्ममः जीवः ] ममतारहित
जीव [क्रमात् ] अनुक्रमे [बध्यते ] बंधाय छे अने [मुच्यते ] मुक्त थाय छे (बंधनथी छूटे
छे); [तस्मात् ] तेथी [सर्वप्रयत्नेन ] पूरा प्रयत्नथी [निर्ममत्वं ] निर्ममत्वनुं [विचिन्तयेत् ] विशेष
करीने चिंतवन करवुं जोईए.
टीका :अव्ययोना अनेक अर्थ होय छे, ‘मम’ ए अव्यय छे. तेनो अर्थ
अभिनिवेश थाय छे, तेथी ‘सममः’ अर्थात् ‘मम इदम्’ ‘आ मारुं छे’ एवा अभिनिवेशवाळो
(जीव) तथा उपलक्षणथी ‘अहम् अस्यं’हुं आनो छुंएवा अभिनिवेशवाळो जीव
कर्मोथी बंधाय छे.
परदब्बरओ वज्झदि विरओ मुच्चेइ विविह - कम्मेहिं
एसो जिणउवदेसो समासदो बन्ध - मुक्खस्स ।।२३।।
[मोक्षप्राभृत ]

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८५
तथा चोक्तम्
‘न कर्मबहुलं जगन्नचलनात्मकं कर्म वा,
न चापि करणानि वा न चिदचिद्वधो बन्धकृत्
यदैक्यमुपयोगभूःसमुपयाति रागादिभिः
स एव किल केवलं भवति बन्धसेतुर्नृणाम् ।।
तथा स एव जीवो निर्ममस्तद्विपरीतस्तैर्मुच्यत इति यथासंख्येन योजनार्थं
क्रमादित्युपात्तम्
उक्तं च
भी कर्मोंसे बँधता है उपलक्षणसे यह भी अर्थ लगा लेना कि ‘मैं इसका हूँ’ ऐसे
अभिनिवेशवाला जीव भी बँधता है, जैसा कि अमृतचंद्राचार्यने समयसार कलशमें कहा है
‘‘न कर्म बहुलं जगन्न’’
अर्थन तो कर्मस्कन्धोंसे भरा हुआ यह जगत् बंधका कारण है, और न हलन-
चलनादिरूप क्रिया ही, न इन्द्रियाँ कारण हैं और न चेतन-अचेतन पदार्थोंका विनाश करना
ही बन्धका कारण है
किन्तु जो उपयोगस्वरूपी जमीन रागादिकोंके साथ एकताको प्राप्त
होती है, सिफ र् वही अर्थात् जीवोंका रागादिक सहित उपयोग ही बन्धका कारण है यदि
वही जीव निर्ममरागादि रहित-उपयोगवाला हो जाय, तो कर्मोंसे छूट जाता है कहा भी
है कि‘‘अकिंचनोऽह’’
श्री अमृतचन्द्राचार्ये श्री समयसार कलश श्लोक १६४मां कह्युं छे केः
‘कर्मबंध करनारुं कारण, नथी बहु कर्मयोग्य पुद्गलोथी भरेलो लोक, नथी चलनरूप
कर्म (अर्थात् कायवचनमननी क्रियारूप योग), नथी अनेक प्रकारनां करणो (इन्द्रियो)
के नथी चेतनअचेतननो घात. ‘उपयोग भू’ अर्थात् आत्मा रागादिक साथे जे ऐक्य पामे
छे ते ज एक (मात्र रागादिक साथे एकपणुं पामवुं ते ज) खरेखर पुरुषोने बंधनुं कारण
छे.’
तथा ते ज जीव जो निर्मम एटले तेनाथी विपरीत (अर्थात् रागादिथी रहित
उपयोगवाळो) थाय, तो ते कर्मोथी छूटी जाय छे.
(अनुक्रम संख्यानी योजना माटे श्लोकमां ‘क्रमात्’ शब्द वापर्यो छे, (जेम के
सममः, वध्यते, निर्ममः मुच्यते).

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८६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘अकिञ्चनोऽहमित्यास्व त्रैलोक्याधिपतिर्भवेः
योगिगम्यं तव प्रोक्तं रहस्यं परमात्मनः ।।’’ [आत्मानुशासने ]
अथवा‘‘रागी बध्नाति कर्माणि वीतरागो विमुञ्चति
जीवो जिनोपदेशोऽयं संक्षेपाद्वन्धमोक्षयोः ।।’’ [ज्ञानार्णवे ]
यस्मादेवं तस्मात्सर्वप्रयत्नेन व्रताद्यवधानेन मनोवाक्कायप्रणिधानेन वा निर्ममत्वं
विचिन्तयेत्
मत्तः कायादयोऽभिन्नास्तेभ्योऽहमपि तत्त्वतः
नाहमेषां किमप्यस्मि ममाप्येते न किञ्चन ।। [तत्त्वानुशासन१५८ ]
मैं अकिंचन हूँ, मेरा कुछ भी नहीं, बस ऐसे होकर बैठे रहो और तीन लोकके
स्वामी हो जाओ यह तुम्हें बड़े योगियोंके द्वारा जाने जा सकने लायक परमात्माका रहस्य
बतला दिया है
और भी कहा है‘‘रागी बध्नाति कर्माणि०’’ रागी जीव कर्मोंको बाँधता है
रागादिसे रहित हुआ जीव मुक्त हो जाता है बस यही संक्षेपमें बंध मोक्ष विषयक जिनेन्द्रका
उपदेश है जब कि ऐसा है, तब हरएक प्रयत्नसे व्रतादिकोंमें चित्त लगाकर अथवा मन,
वचन, कायकी सावधानतासे निर्ममताका ही ख्याल रखना चाहिए ‘‘मत्तः कायादयो
भिन्नास्
’’
‘आत्मानुशासन’श्लोक ११०मां कह्युं छे केः
‘हुं अकिंचन छुं (एटले मारुं कांई पण नथी)एम भावना करी बेसी रहो
(परिणमो) अने त्रण लोकना स्वामी बनी जाओ. आ तने योगीओने गम्य (जाणी शकाय
तेवुं)
एवुं परमात्मानुं रहस्य बताव्युं छे;
अथवा ज्ञानार्णवपृ. २४२मां कह्युं छे केः
‘रागी (जीव) कर्मो बांधे छे अने वीतरागी जीव (रागादिथी रहित जीव) कर्मोथी
मुक्त थाय छे. बंधमोक्ष संबंधी जिनेन्द्रनो आ संक्षेपमां उपदेश छे.’
तेथी सर्व प्रयत्नथी व्रतादिमां (शुद्ध परिणमनमां) अवधानथी (चित्त लगावी)
अथवा मन, वचन, कायनी सावधानीथी निर्ममत्वनुं विशेष प्रकारे चिंतवन करवुं जोईए.
‘माराथी शरीरादि भिन्न छे अने परमार्थे तेमनाथी हुं पण भिन्न छुं. हुं तेमनो कांई
पण नथी अने तेओ पण मारा कांईपण नथी,’
इत्यादि श्रुतज्ञाननी भावनाथी मुम़ुक्षुए (खास करीने) भाववुं जोईए.