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अविनाशी पद छे.’
परिणामोथी शुभाशुभ कर्मनो बंध थतो नथी. माटे निर्ममत्वनुं ज चिंतवन करवुं जोईए.
ज कर्मबंधनुं कारण छे, परंतु रागादिथी एकतारहित उपयोग बंधनुं कारण नथी
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करे छे.
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पर्यायविशिष्टतया केवलिनां शुद्धोपयोगमात्रमयत्वेन श्रुतकेवलिनां च संवेद्योहमात्मास्मि
मत्सकाशात्सर्वथा द्रव्यादिप्रकारेण बाह्या भिन्नाः सन्ति
शुद्ध एटले शुद्धनयनी अपेक्षाए द्रव्यकर्म
जाणवा योग्य (ज्ञेय) तथा श्रुतकेवलीओने शुद्धोपयोगमात्रपणाने लीधे संवेदनयोग्य हुं
आत्मा छुं.
द्वारा शुद्धोपयोगमात्ररूपसे जाननेमें आ सकने लायक हूँ, ऐसा मैं आत्मा हूँ, और जो
संयोगसे-द्रव्यकर्मोंके सम्बन्धसे प्राप्त हुए देहादिक पर्याय हैं, वे सभी मुझसे हर तरहसे
(द्रव्यसे, गुणसे, पर्यायसे) बिल्कुल जुदे हैं
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भावो आत्माना चैतन्यस्वरूपथी सर्वथा भिन्न छे. २७.
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हुं संपूर्णपणे छोडुं छुं. शा वडे करवामां आवता (संबंधने)? मन
हुं छोडुं छुं. आनो अभिप्राय ए छे के मन
एक फलवाले संसारकी प्राप्ति होती है, जैसा पूज्यपादस्वामीने समाधिशतकमें कहा है
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मन
शकाय? एवो अर्थ छे.
मरण व रोगादिक होते हैं, तथा मरणादि सम्बन्धी बाधायें भी होती हैं
है कि
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नथी, कारण के मारुं मरण नथी. तेथी मरणना कारणभूत काळा नाग आदिनो भय
वातादि दोषनी विषमता मने नथी, कारण के वातादिनो मूर्त पदार्थ साथे संबंध छे. तेथी
चित्शक्तिरूप भावप्राणोंका कभी भी विछोह नहीं हो सकता
डरता हूँ
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दुखैरभिभूयेय अहमिति सामर्थ्यादत्र दृष्टव्यम्
बालादि अवस्थाओथी उत्पन्न थतां दुःखोथी हुं केवी रीते घेराउं? (केवी रीते दुःखी थाउं?)
एम सामर्थ्यथी अहीं समजवुं.
धर्मो होवाथी, अमूर्त एवा मारामां तेमनो बिलकुल संभव नथी.
शरीरनो (पर्यायद्रष्टिए) नाश थाय छे. परंतु चित्शक्तिलक्षणात्मक ज्ञानदर्शनरूप भावप्राणनो
कदी पण नाश थतो नथी. तेने मरणनो भय नथी, तो मरणना कारणभूत कृष्ण सर्पादिनो
क्यांथी भय होय? न ज होय.
छे. आत्मा साथे नथी; तेथी ज्वरादिनी पीडा तेने केम होय? न ज होय.
धर्मो कदापि पण होई शके नहि. २९.
होते हैं ? इसका जवाब यह है कि ‘एतानि पुद्गले’ ये मृत्यु-व्याधि और बाल-वृद्ध आदि
दशाएँ पुद्गल-मूर्त शरीर आदिकोंमें ही हो सकती हैं
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जन्मप्रभृत्यात्मीयभावेन प्रतिपद्य मुक्तानीदानीं भेदभावनावष्टम्भान्मया त्यक्तानि
मम भविष्यन्ति
भयादि न होय, तो ए देहादि वस्तुओने प्राप्त करीने
लीधे शुं पश्चात्तापकारी बनशे? अर्थात् पोतानी मानी लीधेली ते वस्तुओने में छोडी दीधी,
तेथी शुं ते (वस्तुओ) मने पश्चात्तापजनक थई पडशे?
ही जिन्हें मैंने भेद-भावनाके बलसे छोड़ दिया है; ऐसी देहादिक वस्तुएँ चिरकालके अभ्यस्त-
अभेद संस्कारके वशसे पश्चात्ताप करनेवाली हो सकती हैं, कि ‘अपनी इन चीजोंको मैंने
क्यों छोड़ दिया ?’
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भोजनगन्धमाल्यादिषु स्वयं भुक्त्वा त्यक्तेषु यथा लोकस्य तथा मे सम्प्रति विज्ञस्य
तत्त्वज्ञानपरिणतस्य तेषु फे लाकल्पेषु पुद्गलेषु का स्पृहा ? न कदाचिदपि
करीने छोडी दीधां. जो एम छे तो स्वयं भोगवीने छोडी दीधेला उच्छिष्ट (एंठा) जेवां
भोजन, गंध, मालादिमां
तो तारे निर्ममत्वनी भावना विशेष करवी जोईए. (एम स्वयंने संबोधे छे.)
तरह इस समय तत्त्वज्ञानसे विशिष्ट हुए मेरी उन छिनकी हुई रेंट (नाक) सरीखे पुद्गलोंमें
क्या अभिलाषा हो सकती है ? नहीं नहीं, हरगिज नहीं
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संस्कारवशे अनादिकाळथी अनेकवार भोगवीने छोडी दीधेला पदार्थोने हवे
शकातुं नथी. एवो ज कोई तेनो (आत्मानो) प्रायोगिक (परनिमित्तथी थएलो) तेम ज
वैस्रसिक (स्वाभाविक) गुण छे.’
एवो ज तेनो गुण को प्रायोगी ने वैस्रसिक छे.
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पोताना संतानने (प्रवाहने) पुष्ट करे छे (चालु राखे छे), एवो अर्थ छे.
हित करता है अर्थात् द्रव्यकर्म, जीवमें औदयिक आदि भावोंको पैदा कर नये
द्रव्यकर्मोंको ग्रहण कर अपनी संतानको पुष्ट किया करता है, जैसा कि अमृतचंद्राचार्यने
पुरुषार्थसिद्धियुपायमें कहा है
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स्वात्मोपलब्धिरूप मोक्षको चाहता है
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करे तो जूनां कर्म
भोगवतो नथी, त्यारे जूनां कर्मनो उदय नवा कर्म
पुरुषार्थ उपर ज कर्मना बळनुं माप व्यवहारे अंकाय छे. कर्मनो ज्यारे संचय थाय छे त्यारे
कर्म पोतानुं हित इच्छे छे, एम कहेवाय छे. ते जड होवाथी तेने चाहना के इच्छा होती
नथी. कर्म कर्मनुं हित इच्छे छे एटले कर्माविष्ट जीव कर्मनो संचय करे छे
निमित्तपणुं तूटतुं जाय छे. ए समये जीवनी सबळता थई अने कर्मनी निर्बळता थई; एम
कहेवामां आवे छे.
ए समये जीवनी निर्बळता छे अने कर्मनी ते काळे सबळता छे, एम कहेवामां आवे छे.
चाहता ? सभी चाहते हैं
वर्ते नहि निजभानमां, कर्ता कर्म प्रभाव.....७८
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छे; कर्म के निमित्तोनो तेमां कांई दोष नथी. कर्मनुं सबळपणुं के निर्बळपणुं कहेवुं ते
व्यवहारनयनुं कथन छे.
पुद्गलना परिणामने परस्पर मात्र निमित्त
वस्तुस्थितिको न जाननेवाले) हो रहे हो
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(आत्मानो) अनुग्रह (उपकार) करवामां तत्पर था. शुं करतो (तुं)? उपकार करतो. कोनो?
परनो अर्थात् सर्वथा पोतानाथी बाह्य (भिन्न) देखाता तथा इन्द्रियो द्वारा अनुभवमां
आवता शरीरादिनो (उपकार करतो); कारण के (तुं) केवो छे? तुं अज्ञानी
जाणतो, त्यां सुधी तेनो उपकार करे छे, परंतु तेने तत्त्वथी जाण्या पछी (अर्थात् स्वने
स्व
करवा तुं तत्पर था)
अभ्याससे छोड़कर प्रधानतासे अपने (आत्माके) उपकार करनेमें तत्पर हो जाओ
करना आदि रूप उपकार करनेमें लगे हुए हो
उपकार करनेमें लग जाते हैं
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लाग्यो रहे छे; माटे आचार्यनो तेने उपदेश छे के, ‘अविद्यानो त्याग करी तत्त्वज्ञानी बन अने
उपकार करवानो विकल्प छोडी शुद्धात्मा बनवारूप आत्मोपकार कर.’
हैं
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अनुभवथी. ते पण केवी रीते? अभ्यासथी अर्थात् अभ्यासनी भावनाथी; ते (अभ्यास)
पण गुरुना उपदेशथी अर्थात् धर्माचार्यना तथा आत्माना सुद्रढ स्व
एटले अविच्छिन्नपणे मोक्षसुखनो अनुभव करे छे, कारण के ते (मोक्षसुखनो) अनुभव,
कर्मोथी भिन्न आत्मानो अनुभव करनारने अविनाभावीपणे होय छे (बीजाने नहि).
चाहिये
है
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आदिथी आत्माने भिन्न अनुभव करनारने ज होय छे, बीजाने नहि.
स्वाधीन आनन्दको प्राप्त कर लेता है
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(शिष्य) पूछे छे
आकांक्षा करे छे. तथा अभीष्ट (इच्छेला) अर्थात् आत्मा द्वारा जिज्ञासित मोक्षसुखना
उपायना जिज्ञासु आत्माने आत्मविषय संबंधी बतावनार होवाथी अर्थात् ‘आ मोक्षसुखनो
करानेवाला है, इसलिए अपना (आत्माका) गुरु आप (आत्मा) ही है
सुखके उपायोंको जतलानेवाला बन जाता है, कि यह मोक्ष-सुखके उपाय मुझे करना