Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 27-34.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८७
इत्यादि श्रुतज्ञानभावनया मुमुक्षुर्विशेषेण भावयेत्
उक्तं च[आत्मानुशासने ]
‘निवृत्तिं भावयेद्यावन्ननिर्वृत्तिस्तदभावतः
न वृत्तिर्न निवृत्तिश्च तदेव पदमव्ययम्’ ।।२३६।।
‘‘शरीरादिक मुझसे भिन्न हैं, मैं भी परमार्थसे इनसे भिन्न हूँ, न में इनका कुछ
हूँ, न मेरे ही ये कुछ हैं ’’ इत्यादिक श्रुतज्ञानकी भावनासे मुमुक्षुको भावना करनी चाहिए
आत्मानुशासनमें गुणभद्रस्वामीने कहा है ‘‘निवृत्तिं भावयेत्’’
जब तक मुक्ति नहीं हुई तब तक परद्रव्योंसे हटनेकी भावना करे जब उसका
अभाव हो जाएगा, तब प्रवृत्ति ही न रहेगी बस वही अविनाशी पद जानो ।।२६।।
श्री गुणभद्राचार्ये ‘आत्मानुशासन’श्लोक २३६मां कह्युं छे केः
‘ज्यां सुधी मुक्ति न थाय त्यां सुधी (परभावोथी) निवृत्तिनी (पाछा हठवानी)
भावना करवी. तेना (परभावना) अभावमां प्रवृत्ति अने निवृत्ति ज रहेशे नहि. ते ज
अविनाशी पद छे.’
भावार्थ :ज्यारे स्त्रीपुत्रादि मारां अने हुं तेमनोएवा ममकाररूप विभाव
परिणामोथी जीव परिणमे छे, त्यारे रागद्वेषरूप परिणतिना निमित्ते शुभाशुभ कर्मनो बंध
थाय छे, किन्तु ज्यारे स्त्री, पुत्रादि पदार्थोमां मारापणानी कल्पना छोडी दे छे’, त्यारे निर्मम
परिणामोथी शुभाशुभ कर्मनो बंध थतो नथी. माटे निर्ममत्वनुं ज चिंतवन करवुं जोईए.
जे समये उपयोग विभाव भावोथी एकरूप थाय छे. ते समये रागद्वेष साथे
एकताबुद्धिथी परिणामरूप अध्यवसानभावथी बंध थाय छे. रागादिथी एकतारूप उपयोग
ज कर्मबंधनुं कारण छे, परंतु रागादिथी एकतारहित उपयोग बंधनुं कारण नथी
ते
कर्मथीमुक्तिनुं कारण छे.
जे परने पर अने आत्माने आत्मा मानी रागीद्वेषी थतो नथी अने पर पदार्थोमां
सुखदुःखनी कल्पना करतो नथी, परंतु ते प्रत्ये समभावी रहे छे. ते कर्मोथी छूटे छे अने
परमात्मा बने छे.
‘रागी कर्मथी बंधाय छे अने विरागी कर्मथी छूटे छे’ एवो जिनेन्द्र भगवाननो
बंधमोक्षनो संक्षेपमां उपदेश छे.

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८८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अथाह शिष्यः कथं नु तदिति निर्ममत्वविचिंतनोपायप्रश्नोऽयं
अथ गुरुस्तत्प्रक्रियां मम विज्ञस्य का स्पृहेति यावदुपदिशति
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः
बाह्यः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ।।२७।।
‘पर द्रव्य मारुं नथी’ एवुं परिणमन ज्यारे थाय छे, त्यारे ते परम उदासीनतारूप
परिणमे छे अने तेनुं फळ त्रण लोकना जीवो जेने पोतानो स्वामी माने तेवुं पद ते प्राप्त
करे छे.
ज्यारे पर भावथी रहित थई मुक्त थाय, त्यारे नथी प्रवृत्ति के नथी निवृत्ति, केवल
शुद्धस्वरूप ज छे. २६.
हवे शिष्य कहे छेते (निर्ममत्व) केवी रीते होय? ‘निर्ममत्वनुं चिंतवन करवाना
उपायनो’ आ प्रश्न छे.
हवे गुरु तेनी (उपायनी) प्रक्रियाने ‘एकोऽहं.......श्लोक २७थी लई ‘मम विज्ञस्य
का स्पृहा’श्लोक ३० सुधीना श्लोको द्वारा उपदेशे छे.
निर्मम एक विशुद्ध हुं, ज्ञानी योगीगम्य,
संयोगी भावो बधा, मुजथी बाह्य अरम्य. २७.
अन्वयार्थ :[अहं ] हुं [एकः ] एक, [निर्ममः ] ममतारहित, [शुद्धः ] शुद्ध
यहाँ पर शिष्य कहता है कि इसमें निर्ममता कैसे होवे ? इसमें निर्ममताके चिंतवन
करनेके उपायोंका सवाल किया गया है अब आचार्य उसकी प्रक्रियाको ‘‘एकोऽहं निर्ममः’’
से प्रारम्भ कर ‘‘मम विज्ञस्य का स्पृहा’’ तकके श्लोकों द्वारा बतलाते हैं
मैं इक निर्मम शुद्ध हूँ, ज्ञानी योगीगम्य
कर्मोदयसे भाव सब, मोते पूर्ण अगम्य ।।२७।।
अर्थमैं एक, ममता रहित, शुद्ध, ज्ञानी, योगीन्द्रोंके द्वारा जानने लायक हूँ
*एगो भे सस्सदो आदा णाणदंसणलक्खणो
सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संयोगलक्खणा ।।
[श्री नियमसार गाथा१०२]

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८९
टीकाद्रव्यार्थिकनयादेकः पूर्वापरपर्यायानुस्यूतो निर्ममोममेदमहमस्येत्यभिनिवेशशून्यः
शुद्धः शुद्धनयादेशाद् द्रव्यभावकर्मनिर्मुक्तो ज्ञानी स्वपरप्रकाशनस्वभावो योगीन्द्रगोचरोऽनन्त-
पर्यायविशिष्टतया केवलिनां शुद्धोपयोगमात्रमयत्वेन श्रुतकेवलिनां च संवेद्योहमात्मास्मि
ये तु
संयोगाद् द्रव्यकर्मसम्बन्धाद्याता मया सह सम्बन्धं प्राप्ता भावा देहादयस्ते सर्वेऽपि मत्तो
मत्सकाशात्सर्वथा द्रव्यादिप्रकारेण बाह्या भिन्नाः सन्ति
[ज्ञानी ] ज्ञानी अने [योगीन्द्रगोचरः ] योगीन्द्रो द्वारा जाणवा योग्य छुं; [संयोगजाः ]
संयोगजन्य [सर्वे अपि भावाः ] बधाय जे (देहरागादिक) भावो छे ते [मत्तः ] माराथी
[सर्वथा ] सर्वथा [बाह्याः ] भिन्न छे.
टीका :द्रव्यार्थिकनयथी एक एटले पूर्वापर पर्यायोमां अनुस्यूत (अन्वित),
निर्मम एटले ‘आ मारुं छे,’ ‘हुं एनो छुं’ एवा अभिनिवेश (मिथ्या मान्यता)थी रहित,
शुद्ध एटले शुद्धनयनी अपेक्षाए द्रव्यकर्म
भावकर्मथी रहित, ज्ञानी एटले स्वपरप्रकाशक
स्वभाववाळो अने योगीन्द्रगोचर एटले केवलीओने अनंत पर्यायोनी विशिष्टता सहित
जाणवा योग्य (ज्ञेय) तथा श्रुतकेवलीओने शुद्धोपयोगमात्रपणाने लीधे संवेदनयोग्य हुं
आत्मा छुं.
संयोगथी एटले द्रव्यकर्मना संबंधथी जे देहादिक भावोनो (पदार्थोनो) मारी साथे
संबंध प्राप्त थयो छे, ते बधा माराथी सर्वथा द्रव्यादि प्रकारे (द्रव्य-क्षेत्रकालभावे) बाह्य
एटले भिन्न छे.
भावार्थ :द्रव्यस्वभावे आत्मा एक छे, आत्मा निर्मम छे अर्थात् ‘आ मारुं छे’
अने ‘हुं एनो छुं’एवा अभिनिवेशथी (मिथ्या अभिप्रायथी) शून्य छे; आत्मा शुद्ध छे
अर्थात् द्रव्यकर्मभावकर्मथी रहित छे, ते ज्ञानी एटले स्वपर प्रकाशक स्वभाववाळो छे
अने जेम ते केवली अने श्रुतकेवलीने ज्ञानगोचर छे; तेम सर्व सम्यग्द्रष्टिओने पण ते
संयोगजन्य जितने भी देहादिक पदार्थ हैं, वे मुझसे सर्वथा बाहिरी-भिन्न हैं
विशदार्थमैं द्रव्यार्थिकनयसे एक हूँ, पूर्वापर पर्यायोंमें अन्वित हूँ निर्मम हूँ
मेरा यह’ ‘मैं इसका’ ऐसे अभिनिवेशसे रहित हूँ शुद्ध हूँ, शुद्धनयकी अपेक्षासे, द्रव्यकर्म
भावकर्मसे रहित हूँ, केवलियोंके द्वारा तो अनन्त पर्याय सहित रूपसे और श्रुतकेवलियोंके
द्वारा शुद्धोपयोगमात्ररूपसे जाननेमें आ सकने लायक हूँ, ऐसा मैं आत्मा हूँ, और जो
संयोगसे-द्रव्यकर्मोंके सम्बन्धसे प्राप्त हुए देहादिक पर्याय हैं, वे सभी मुझसे हर तरहसे
(द्रव्यसे, गुणसे, पर्यायसे) बिल्कुल जुदे हैं
।।२७।।

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९० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनर्भावक एवं विमृशति संयोगात्किमिति देहादिभिः सम्बन्धाद्देहिनां किं फलं
स्यादित्यर्थः
तत्र स्वयमेव समाधत्ते
दुःखसन्दोहभागित्वं संयोगादिह देहिनाम्
त्यजाम्येनं ततः सर्वं मनोवाक्कायकर्मभिः ।।२८।।
टीकादुःखानां संदोहः समूहस्तद्भागित्वं देहिनामिह संसारे संयोगाद्देहादिसम्बन्धाद्भवेत्
स्वसंवेदनज्ञानगोचर छे. कर्मसंबंधित शरीर, स्त्री, पुत्रादि बाह्य संयोगी पदार्थो तथा विकारी
भावो आत्माना चैतन्यस्वरूपथी सर्वथा भिन्न छे. २७.
फरी भावक (भावना करनार) विचारे छे के संयोगथी शुं (फळ)? एनो अर्थ ए
छे के देहादिना संबंधथी प्राणीओने शुं फळ मळे?
ते ज समये ते स्वयं ज समाधान करे छेः
देहीने संयोगथी, दुःख समूहनो भोग,
तेथी मनवचकायथी, छोडुं सहु संयोग. २८.
अन्वयार्थ :[इह ] आ संसारमां [संयोगान् ] देहादिकना संबंधथी [देहिनां ]
प्राणीओने [दुःखसंदोहभागित्वं ] दुःखसमूह भोगववुं पडे छे (अर्थात् अनंत दुःख भोगववां
पडे छे), [ततः ] तेथी [पनं सर्वं ] ते समस्त (संबंध)ने [मनोवाक्कायकर्मभिः ] मनवचन
कायनी क्रियाथी [त्यजामि ] हुं तजु छुं.
टीका :दुःखोनो संदोह (समूह)तेनुं भोगववापणुं अहीं एटले आ संसारमां
फि र भावना करनेवाला सोचता है कि देहादिकके सम्बन्धसे प्राणियोंको क्या होता
है ? क्या फल मिलता है ? उसी समय वह स्वयं ही समाधान भी करता है कि
प्राणी जा संयोगते, दुःख समूह लहात
याते मन वच काय युत, हूँ तो सर्व तजात ।।२८।।
अर्थइस संसारमें देहादिकके सम्बन्धसे प्राणियोंको दुःख-समूह भोगना पड़ता
हैअनन्त क्लेश भोगने पड़ते हैं, इसलिये इस समस्त सम्बन्धको जो कि मन, वचन,
कायकी क्रियासे हुआ करते हैं, मनसे, वचनसे, कायसे छोड़ता हूँ अभिप्राय यह है कि

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९१
यतश्चैवं तत एनं संयोगं सर्वं निःशेषं त्यजामि कैः क्रियमाणं ? मनोवाक्कायकर्मभिर्मनोवर्गणा-
द्यालम्बनैरात्मप्रदेशपरिस्पंदैस्तैरेवा त्यजामि अयमभिप्रायो मनोवाक्कायान्प्रतिपरिस्पन्दमान
नात्मप्रदेशान् भावतो निरुद्धामि तद्भेदाभेदाभ्यासमूलत्वात्सुखदुःखैकफलनिर्वृतिसंसृत्योः
तथा चोक्तं [समाधितन्त्रे ]
‘‘स्वबुद्धया यावद् गृह्णीयात्कायवाकचेतसां त्रयम्
संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु निर्वृतिः’’ ।।६२।।
संयोगने लीधे अर्थात् देहादिना संबंधने लीधे होय छे (अर्थात् देहादिना संबंधने लीधे
प्राणीओने अनेक दुःखो भोगववां पडे छे). तेथी ते सर्व संयोगने (तेना प्रत्येना रागने)
हुं संपूर्णपणे छोडुं छुं. शा वडे करवामां आवता (संबंधने)? मन
वचनकायनी क्रियाथी,
मनोवर्गणादिना आलंबनथी आत्मप्रदेशोना परिस्पन्द द्वारा (करवामां आवता संबंधने) ज
हुं छोडुं छुं. आनो अभिप्राय ए छे के मन
वचनकाय प्रति (तेना आलंबनथी) परिस्पन्द
थता आत्माना प्रदेशोने हुं भावथी रोकुं छुं, कारण के सुखदुःख जेनुं एक फळ छे तेवा
मोक्षसंसारनुं तेवा भेदाभेदनो अभ्यास मूल छे. (अर्थात् आत्मा, मनवचनकायथी
भिन्न छेएवा भेदअभ्यासथी सुखरूप मोक्षनी प्राप्ति थाय छे अने आत्मा, मन
वचनकायथी अभिन्न छेएवा अभेद अभ्यासथी दुःखरूप संसारनी प्राप्ति थाय छे).
तथा ‘समाधितंत्र’श्लोक ६२मां कह्युं छे केः
‘ज्यां सुधी शरीर, वाणी अने मनए त्रणने ‘ए मारां छे’ एवी आत्मबुद्धिथी
(जीव) ग्रहण करे छे. त्यां सुधी संसार छे अने ज्यारे तेमनाथी भेदबुद्धिनो (अर्थात्
आत्मा शरीरादिथी भिन्न छेएवी भेदबुद्धिनो) अभ्यास करे छे, त्यारे मुक्ति थाय छे.’
मन, वचन, कायका आलम्बन लेकर चंचल होनेवाले आत्माके प्रदेशोंको भावोंसे रोकता हूँ
आत्मा मन, वचन, कायसे भिन्न है’, इस प्रकारके अभ्याससे सुखरूप एक फलवाले मोक्षकी
प्राप्ति होती है और मन, वचन, कायसे आत्मा अभिन्न है, इस प्रकारके अभ्याससे दुःखरूप
एक फलवाले संसारकी प्राप्ति होती है, जैसा पूज्यपादस्वामीने समाधिशतकमें कहा है
‘‘स्वबुद्धया यत्तु गृह्णीयात्’’
‘‘जब तक शरीर, वाणी और मन इन तीनोंको ये ‘स्व हैंअपने हैं’ इस रूपमें
ग्रहण करता रहता है तब तक संसार होता है और जब इनसे भेद-बुद्धि करनेका अभ्यास
हो जाता है, तब मुक्ति हो जाती है ’’ ।।२८।।

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९२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनः स एवं विमृशति पुद्गलेन किल संयोगस्तदपेक्षा मरणादयस्तद्व्यथाः कथं
परिह्रियन्त इति पुद्गलेन देहात्मना मूर्तद्रव्येण सह किल आगमे श्रूयमाणो जीवस्य
सम्बन्धोऽस्ति तदपेक्षाश्च पुद्गलसंयोगनिमित्ते जीवस्य मरणादयो मृत्युरोगादयः सम्भवन्ति
तद्यथा मरणादयः सम्भवन्ति मरणादिसम्बन्धिन्यो बाधाः कथं ? केन भावनाप्रकारेण मया
परिह्रियन्ते तदभिभवः कथं निवार्यत इत्यर्थः स्वयमेव समाधत्ते
भावार्थ :देहादिना संबंधने लीधे संसारमां प्राणीओने अनेक दुःख भोगववां पडे
छे. माटे जीवे ते देहादि साथेनी एकताबुद्धिने सर्वथा छोडवी जोईए, अर्थात् मनवचन
कायनुं आलंबन छोडवुं जोईए अने स्वसन्मुख थई एवा परिणाम करवा जोईए, के जेथी
मन
वचनकायनुं अवलंबन छूटी आत्मा अविकारी थाय अने छेवटे आत्माना प्रदेशोनुं
परिस्पंदन पण अटकी जाय.
ज्यां सुधी शरीरमनवाणीमां आत्मबुद्धि छे, त्यां सुधी संसारनी परंपरा चालु रहे
छे, परंतु मनवचनकाय आत्माथी भिन्न छे, एवा भेदविज्ञानना अभ्यासथी मुक्तिनी
प्राप्ति थाय छे. २८.
वळी, ते आवी रीते विचारे छेः
पुद्गल (शरीरादि मूर्त द्रव्य) साथे खरेखर (जीवनो) संयोग छे. तेनी अपेक्षावाळां
मरणादि अने तेनां दुःखो केवी रीते दूर करी शकाय? पुद्गल साथे एटले शरीर साथे
मूर्तद्रव्य साथेजीवनो संबंध आगममां सांभळवामां आवे छे. तेना कारणे एटले पुद्गलना
संयोगनिमित्ते जीवने मरणादि अर्थात् मरणरोगादि संभवे छे. तेने जेम मरणादि संभवे
छे, तेम मरणादिसंबंधी बाधाओ (दुःखो) पण संभवे छे; तो केवी रीतेक्या प्रकारनी
भावनाथी मारे ते (दुःखादि) परिहरवां? अर्थात् तेनुं आक्रमण (हुमलो) केवी रीते निवारी
शकाय? एवो अर्थ छे.
स्वयं ज तेनुं समाधान करे छेः
फि र भावना करनेवाला सोचता है कि पुद्गलशरीरादिकरूपी मूर्तद्रव्यके साथ
जैसा कि आगममें सुना जाता है, जीवका सम्बन्ध है। उस सम्बन्धके कारण ही जीवका
मरण व रोगादिक होते हैं, तथा मरणादि सम्बन्धी बाधायें भी होती हैं
तब इन्हें कैसे
व किस भावनासे हटाया जावे ? वह भावना करनेवाला स्वयं ही समाधान कर लेता
है कि

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९३
न मे मृत्युः कुतो भीतिर्न मे व्याधि कुतो व्यथा
नाहं बालो न वृद्धोऽहं न युवैतानि पुद्गले ।।२९।।
टीकान मे एकोऽहमित्यादिना निश्चितात्मस्वरूपस्य मृत्युः प्राणत्यागो नास्ति
चिच्छक्तिलक्षणभावप्राणानां कदाचिदपि त्यागाभावात् यतश्च मे मरणं नास्ति ततः कुतः
कस्मात्मरणकारणात्कृष्णसर्पादेर्भीतिर्भयं ममस्यान्न कुतश्चिदपि बिभेमीत्यर्थः तथा
व्यार्धिर्वातादिदोषवैषम्यं मम नास्ति मूर्त्तसम्बन्धित्वाद्वातादीनां यतश्चैवं ततः कस्मात्
क्यां भीति ज्यां अमर हुं, क्यां पीडा वण रोग?
बाल, युवा, नहि वृद्ध हुं, ए सहु पुद्गल जोग. २९.
अन्वयार्थ :[मे मृत्युः न ] मारुं मरण नथी, तो [कुतः भीतिः ] डर कोनो? [मे
व्याधिः न ] मने व्याधि नथी तो [व्यथा कुतः ] पीडा केवी? [अहं न बालः ] हुं बालक नथी,
[अहं न वृद्धः ] हुं वृद्ध नथी, [अहं न युवा ] हुं युवान नथी [एतानि ] ए (सर्व अवस्थाओ)
[पुद्गले सन्ति ] पुद्गलनी छे.
टीका :‘एकोऽहं’ इत्यादिथी जेनुं आत्मस्वरूप निश्चित थयुं छे एवा मने मरण
एटले प्राणत्याग नथी, कारण के चित्शक्तिरूप भावप्राणोनो कदी पण त्याग (नाश) होतो
नथी, कारण के मारुं मरण नथी. तेथी मरणना कारणभूत काळा नाग आदिनो भय
भीति
मने क्यांथी होय? अर्थात् हुं कोईनाथी बीतो नथी एवो अर्थ छे; तथा व्याधि अर्थात्
वातादि दोषनी विषमता मने नथी, कारण के वातादिनो मूर्त पदार्थ साथे संबंध छे. तेथी
मरण रोग मोमें नहीं, तातें सदा निशंक
बाल तरुण नहिं वृद्ध हूँ, ये सब पुद्गल अंक ।।२९।।
अर्थमेरी मृत्यु नहीं तब डर किसका ? मुझे व्याधि नहीं, तब पीड़ा कैसे ? न
मैं बालक हूँ, न बूढा हूँ, न जवान हूँ ये सब बातें (दशाएं) पुद्गलमें ही पाई जाती हैं
विशदार्थ‘‘एकोहं निर्ममः शुद्धः’’ इत्यादिरूपसे जिसका स्वस्वरूप निश्चित हो
गया है, ऐसा जो मैं हूँ, उसका प्राणत्यागरूप मरण नहीं हो सकता, कारण कि
चित्शक्तिरूप भावप्राणोंका कभी भी विछोह नहीं हो सकता
जब कि मेरा मरण नहीं,
तब मरणके कारणभूत काले नाग आदिकोंसे मुझे भय क्यों ? अर्थात् मैं किसीसे भी नहीं
डरता हूँ
इसी प्रकार वात, पित्त, कफ आदिकी विषमताको व्याधि कहते हैं, और वह
मुझे है नहीं, कारण कि वात आदिक मूर्तपदार्थसे ही सम्बन्ध रखनेवाले हैं जब ऐसा

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९४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
ज्वरादिविकारात् मम व्यथा स्यात्तथा बालाद्यवस्थो नाहमस्मि, ततः कथं बालाद्यवस्थाप्रभवैः
दुखैरभिभूयेय अहमिति सामर्थ्यादत्र दृष्टव्यम्
तर्हि क्व मृत्युप्रभृतीनी स्युरित्याहएतानि
मृत्युव्याधिबालादीनि पुद्गले मूर्त्ते देहादावेव सम्भवन्ति मूर्तधर्मत्वादमूर्ते मयि तेषां
नितरामसम्भवात्
ज्वरादि विकारोथी मने व्यथा (पीडा) केम होय? तथा हुं बालादि अवस्थावाळो नथी. तेथी
बालादि अवस्थाओथी उत्पन्न थतां दुःखोथी हुं केवी रीते घेराउं? (केवी रीते दुःखी थाउं?)
एम सामर्थ्यथी अहीं समजवुं.
पूछे छेत्यारे मृत्यु वगेरे शामां होय छे? ए मृत्यु, व्याधि, बालादि
(अवस्थाओ) पुद्गलमां एटले मूर्त शरीरादिमां ज संभवे छे. कारण के तेओ मूर्त पदार्थोना
धर्मो होवाथी, अमूर्त एवा मारामां तेमनो बिलकुल संभव नथी.
भावार्थ :जे जीवने पोताना चिदानंद स्वरूपनो निश्चय थई गयो छे, तेने
(सम्यग्द्रष्टिने) द्रव्यप्राणना त्यागरूप मरणनो भय होतो नथी, कारण के ते निःशंक छे के
शरीरनो (पर्यायद्रष्टिए) नाश थाय छे. परंतु चित्शक्तिलक्षणात्मक ज्ञानदर्शनरूप भावप्राणनो
कदी पण नाश थतो नथी. तेने मरणनो भय नथी, तो मरणना कारणभूत कृष्ण सर्पादिनो
क्यांथी भय होय? न ज होय.
वळी, तेने वातपित्तकफनी विषमताथी (असमानताथी) उत्पन्न थता व्याधिओनो
पण डर होतो नथी. कारण के ते जाणे छे के तेमनो संबंध मूर्त पदार्थो (शरीरादि) साथे
छे. आत्मा साथे नथी; तेथी ज्वरादिनी पीडा तेने केम होय? न ज होय.
वळी बाल, वृद्धादि अवस्थाओ पुद्गलनी छे. आत्मानी नथी; तेथी ते अवस्थाओथी
उत्पन्न थतां दुःखोनुं वेदन पण तेने केम होय? न ज होय.
मृत्यु, व्याधि तथा बाल वृद्धादि अवस्थाओ पुद्गलमूर्त शरीरादिमां ज होई शके
छे. कारण के ते बधा मूर्तिमान पुद्गलना धर्मो छे. जीव तो अमूर्तिक चेतन छे. तेमां ते
धर्मो कदापि पण होई शके नहि. २९.
है, तब ज्वर आदि विकारोंसे मुझे व्यथा तकलीफ कैसी ? उसी तरह मैं बालवृद्ध आदि
अवस्थावाला भी नहीं हूँ तब बालवृद्ध आदि अवस्थाओंसे पैदा होनेवाले दुःखों-क्लेशोंसे
मैं कैसे दुःखी हो सकता हूँ ? अच्छा यदि मृत्यु वगैरह आत्मामें नहीं होते, तो किसमें
होते हैं ? इसका जवाब यह है कि ‘एतानि पुद्गले’ ये मृत्यु-व्याधि और बाल-वृद्ध आदि
दशाएँ पुद्गल-मूर्त शरीर आदिकोंमें ही हो सकती हैं
कारण कि ये सब मूर्तिमान पदार्थोंके
धर्म हैं मैं तो अमूर्त हूँ, मुझमें वे कदापि नहीं हो सकतीं

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९५
भूयोऽपि भावक एव स्वयमाशङ्कतेतर्ह्येतान्यासाद्य मुक्तानि पश्चात्तापकारीणि
भविष्यन्तीति यद्युक्तनीत्या भयादयो मे न भवेयुस्तर्हि एतानि देहादिवस्तुन्यासाद्य
जन्मप्रभृत्यात्मीयभावेन प्रतिपद्य मुक्तानीदानीं भेदभावनावष्टम्भान्मया त्यक्तानि
चिराभ्यस्ताभेदसंस्कारवशात्पश्चात्तापकारीणि किमितींमानि मयात्मीयानि त्यक्तानीत्यनुशयकारीणि
मम भविष्यन्ति
भुक्तोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपिपुद्गलाः
उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ।।३०।।
फरीथी भावक (भावना करनार) ज स्वयं आशंका करे छे. त्यारे प्राप्त करीने छोडी
दीधेली ते (शरीरादि वस्तुओ) पश्चात्तापकारी बनशे; अर्थात् जो उक्त नीति अनुसार मने
भयादि न होय, तो ए देहादि वस्तुओने प्राप्त करीने
एटले जन्मथी मांडीने तेमने
आत्मीय भावे स्वीकारीनेहवे में छोडी दीधी अर्थात् भेदभावनाना बळथी में त्यजी दीधी;
तो ते देहादि वस्तुओ, चिरकालना अभ्यस्त अभेद (एकत्वबुद्धिना अभ्यासना) संस्कारने
लीधे शुं पश्चात्तापकारी बनशे? अर्थात् पोतानी मानी लीधेली ते वस्तुओने में छोडी दीधी,
तेथी शुं ते (वस्तुओ) मने पश्चात्तापजनक थई पडशे?
अहीं भावक स्वयं ज प्रतिषेधनो विचार करी कहे छे
‘ना, एम बनी शकशे नहि,’ कारण केः
मोहे भोगवी पुद्गलो, कर्यो, सर्वनो त्याग,
मुज ज्ञानीने क्यां हवे, ए एंठोमां राग? ३०.
फि र भी भावना करनेवाला खुद शंका करता है, कि यदि कही हुई नीतिके अनुसार
मुझे भय आदि न होवे न सही, परन्तु जो जन्मसे लगाकर अपनाई गई थी और भले
ही जिन्हें मैंने भेद-भावनाके बलसे छोड़ दिया है; ऐसी देहादिक वस्तुएँ चिरकालके अभ्यस्त-
अभेद संस्कारके वशसे पश्चात्ताप करनेवाली हो सकती हैं, कि ‘अपनी इन चीजोंको मैंने
क्यों छोड़ दिया ?’
भावक-भावना करनेवाला स्वयं ही प्रतिबोध हो सोचता है कि नहीं, ऐसा हो सकता
है, कारण कि
सब पुद्गलको मोहसे, भोग भोगकर त्याग
मैं ज्ञानी करता नहीं, उस उच्छिष्टमें राग ।।३०।।

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९६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अत्र स्वयमेव प्रतिषेधमनुध्यायति तन्नेति यतः
टीकामोहादविद्यावेशवशादनादिकालं कर्मादिभावेनोपादाय सर्वे पुद्गलाः मया
संसारिणा जीवेन वारंवारं पूर्वमनुभूताः पश्चाच्च नीरसीकृत्य त्यक्ताः यतश्चैवं तत् उच्छिष्टेष्विव
भोजनगन्धमाल्यादिषु स्वयं भुक्त्वा त्यक्तेषु यथा लोकस्य तथा मे सम्प्रति विज्ञस्य
तत्त्वज्ञानपरिणतस्य तेषु फे लाकल्पेषु पुद्गलेषु का स्पृहा ? न कदाचिदपि
वत्स ! त्वया
मोक्षार्थिना निर्ममत्वं विचिन्तनीयम्
अन्वयार्थ :[मोहात् ] मोहथी [सर्वे अपि ] बधाय [पुद्गलाः ] पुद्गलो [मुहुः ]
वारंवार [मया भुक्तोज्झिताः ] में भोगव्यां अने छोडी दीधां. [उच्छिष्टेषु इव तेषु ] उच्छिष्ट
(एंठा) जेवा ते पदार्थोमां [अद्य ] हवे [मम विज्ञस्य ] मारा जेवा भेदज्ञानीने [का स्पृहा ]
शी स्पृहा (चाहना) होय? (अर्थात् ए भोगोनी मने हवे इच्छा नथी).
टीका :मोहथी अर्थात् अविद्याना आवेशवश अनादिकालथी मेंसंसारी जीवे
सर्व पुद्गलोने कर्मादिभावे ग्रहण करीने वारंवार पहेलां भोगव्यां अने पछी तेमने नीरस
करीने छोडी दीधां. जो एम छे तो स्वयं भोगवीने छोडी दीधेला उच्छिष्ट (एंठा) जेवां
भोजन, गंध, मालादिमां
जेम लोकने भोगवीने छोडी दीधेला (पदार्थोमां) स्पृहा (इच्छा)
होती नथी,तेम हवे तत्त्वज्ञानथी परिणत विज्ञ (ज्ञानी) एवा मने ते उच्छिष्ट (भोगवीने
छोडी दीधेलां) जेवा पुद्गलोमां शी स्पृहा होय? कदापि न होय, वत्स! तुं मोक्षार्थी छे
तो तारे निर्ममत्वनी भावना विशेष करवी जोईए. (एम स्वयंने संबोधे छे.)
अर्थमोहसे मैंने समस्त ही पुद्गलोंको बारबार भोगा और छोड़ा भोगभोगकर
छोड़ दिया अब जूठनके लिए (मानिन्द) उन पदार्थोंमें मेरी क्या चाहना हो सकती है ?
अर्थात् उन भोगोंके प्रति मेरी चाहना-इच्छा ही नहीं है
विशदार्थअविद्याके आवेशके वशसे अनादिकालसे ही मुझ संसारीजीवको कर्म
आदिके रूपमें समस्त पुद्गलोंको बारबार पहिले भोगा, और पीछा उन्हें नीरस (कर्मत्वादि
रहित) करकरके छोड़ दिया जब ऐसा है, तब स्वयं भोगकर छोड़ दिये गये जूँठन-
उच्छिष्ट भोजन, गन्ध, मालादिकोंमें जैसे लोगोंको फि र भोगनेकी स्पृहा नहीं होती, उसी
तरह इस समय तत्त्वज्ञानसे विशिष्ट हुए मेरी उन छिनकी हुई रेंट (नाक) सरीखे पुद्गलोंमें
क्या अभिलाषा हो सकती है ? नहीं नहीं, हरगिज नहीं
भैया ! जब की तुम मोक्षार्थी हो
तब तुम्हें निर्ममत्वकी ही भावना करनी चाहिए (एसा स्वयंको संबोधन क रते हैं) ।।३०।।

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९७
अत्राह शिष्यः अथ कथं ते निबध्यन्त इति अथेति प्रश्ने केन प्रकारेण पुद्गला
जीवेन नियतमुपादीयन्त इत्यर्थः
गुरुराह
कर्म कर्महिताबन्धि जीवोजीवहितस्पृहः
स्व - स्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थं को वा न वाञ्छति ।।३१।।
भावार्थ :ज्ञानी विचारे छे के जेम कोई भोजनादि पदार्थोने स्वयं भोगवीने छोडी
दे अने छोडी दीधेला उच्छिष्ट (एंठा) पदार्थोने फरीथी भोगववा इच्छे नहि, तेम अविद्याना
संस्कारवशे अनादिकाळथी अनेकवार भोगवीने छोडी दीधेला पदार्थोने हवे
ज्ञानी
थयाथीहुं भोगववा इच्छतो नथी अर्थात् ते भोगो प्रति हवे तेने स्पृहा ज थती नथी.
अहीं आचार्ये ‘सर्व पुद्गलोने में वारंवार भोगव्यां अने छोडी दीधां’एम ज
कह्युं छे ते व्यवहारनयनुं कथन छे, कारण के जे परद्रव्य छे ते ग्रही शकातुं नथी तथा छोडी
शकातुं नथी. एवो ज कोई तेनो (आत्मानो) प्रायोगिक (परनिमित्तथी थएलो) तेम ज
वैस्रसिक (स्वाभाविक) गुण छे.’
* ३०.
अहीं शिष्य कहे छे के‘ते पुद्गलो केवी रीते बंधाय छे? एटले के जीव द्वारा
पुद्गलो शा माटे अने क्या प्रकारे हंमेशा बंधने प्राप्त थतां रहे छे?
गुरु कहे छेः
कर्म कर्मनुं हित चहे, जीव जीवनो स्वार्थ,
स्व प्रभावनी वृद्धिमां, कोण न चाहे स्वार्थ. ३१.
यहाँ पर शिष्य कहता है कि वे पुद्गल क्यों बँध जाते हैं ? अर्थात् जीवके द्वारा
पुद्गल क्यों और किस प्रकारसे हमेशा बन्धको प्राप्त होते रहते हैं ?
आचार्य उत्तर देते हुए कहते हैं :
कर्म कर्महितकार है, जीव जीवहितकार
निज प्रभाव बल देखकर, को न स्वार्थ करतार ।।३१।।
*जे द्रव्य छे पर तेहने न ग्रही न छोडी शकाय छे,
एवो ज तेनो गुण को प्रायोगी ने वैस्रसिक छे.
(श्री समयसार गु. आवृत्ति गाथा ४०६)

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९८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका
‘‘कत्थवि बलिओ जीव कत्थवि कम्माइ हुंति बलियाइ
जीवस्स य कम्मस्स य पुव्वविरुद्धाइ वइराइ ।।’’
इत्यभिधानात्पूर्वोपार्जितं बलवत्कर्म कर्मणः स्वस्यैव हितमाबध्नाति
जीवस्यौदयिकादिभावमुद्भाव्य नवनवकर्माधायकत्वेन स्वसन्तानं पुष्णातीत्यर्थः
तथा चोक्तं [पुरुषार्थसिद्धयुपाये ]
अन्वयार्थ :[कर्म कर्महिताबन्धि ] कर्म कर्मनुं हित चाहे छे, [जीवः जीवहितस्पृहः ]
जीव जीवनुं हित चाहे छे. [स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे ] पोतपोतानो प्रभाव वधतां, [कः वा ] कोण
[स्वार्थे ] पोतानो स्वार्थ [न वाञ्छति ] न इच्छे?
टीका :‘कत्थवि.......बइराई’
‘कोई वखत जीव बलवान थाय छे, तो कोई वखत कर्म बलवान थाय छे. ए
रीते जीव अने कर्मने पहेलेथी (अनादिथी) विरोध अर्थात् वैर चाल्युं आव्युं छे.
आ कथनानुसार पूर्वोपार्जित बलवान कर्म (द्रव्यकर्म), कर्मनुं एटले पोतानुं ज हित
करे छे, अर्थात् जीवमां औदयिकादि भावोने उत्पन्न करी नवां नवां द्रव्यकर्मोनुं ग्रहण करी
पोताना संतानने (प्रवाहने) पुष्ट करे छे (चालु राखे छे), एवो अर्थ छे.
तथा ‘पुरुषार्थसिद्धयुपाय’मां कह्युं छे केः
अर्थकर्म कर्मका हित चाहते हैं जीव जीवका हित चाहता है सो ठीक ही
है, अपने अपने प्रभावके बढ़ने पर कौन अपने स्वार्थको नहीं चाहता अर्थात् सब अपना
प्रभाव बढ़ाते ही रहते हैं
विशदार्थकभी जीव बलवान होता है तो कभी कर्म बलवान हो जाते हैं
इस तरह जीव और कर्मोंका पहिलेसे (अनादिसे) ही बैर चला आ रहा है ऐसा
कहनेसे मतलब यह निकला कि पूर्वोपार्जित बलवान, द्रव्यकर्म, अपना यानी द्रव्यकर्मका
हित करता है अर्थात् द्रव्यकर्म, जीवमें औदयिक आदि भावोंको पैदा कर नये
द्रव्यकर्मोंको ग्रहण कर अपनी संतानको पुष्ट किया करता है, जैसा कि अमृतचंद्राचार्यने
पुरुषार्थसिद्धियुपायमें कहा है

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९९
जीवकृतं परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये
स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ।।१२।।
परिणममानस्य चिदश्चिदात्मकैः स्वयमपि स्वकैर्भावैः
भवति हि निमित्तमात्रं पौद्गलिकं कर्म तस्यापि ।।१३।।
तथा जीवः कालादिलब्ध्या बलवानात्मा जीवस्य स्वस्यैव हितमनन्तसुखहेतुत्वेनोपकारकं
मोक्षमाकाङ्क्षति अत्र दृष्टान्तमाहस्वस्वेत्यादि निजनिजमाहात्म्यबहुतरत्वे सति स्वार्थं
*‘जीवकृत परिणामने निमित्तमात्ररूप पामीने (जीवथी भिन्न) अन्य पुद्गलो स्वयं
ज कर्मरूप परिणमे छे.’ १२.
निश्चयथी पोताना चेतनात्मक परिणामोथी स्वयं ज परिणमता जीवने पण ते
पौद्गलिक कर्म निमित्तमात्र थाय छे.’ १३.
तथा कालादि लब्धिथी बलवान थयेलो आत्मा, जीवने पोताने ज हितरूप तथा
अनंतसुखना कारणपणाने लीधे उपकारक एवा मोक्षनी आकांक्षा करे छे.
अहीं द्रष्टान्त कहे छे‘स्वस्वेत्यादि०’
पोतपोतानुं माहात्म्य अधिकतर वधतां, पोताना स्वार्थने अर्थात् पोताने उपकारक
वस्तुने कोण न इच्छे? अर्थात् सर्वे इच्छे छेएवो अर्थ छे.
‘‘जीवकृतं परिणामं’’ ‘‘परिणममानस्य’’
जीवके द्वारा किये गये परिणाम जो कि निमित्तमात्र हैं, प्राप्त करके जीवसे विभिन्न
पुद्गल खुद ब खुद कर्मरूप परिणम जाते हैं और अपने चेतनात्मक परिणामोंसे स्वयं ही
परिणमनेवाले जीवके लिए वह पौद्गलिककर्म सिफ र् निमित्त बन जाता है तथा कालादि
लब्धिसे बलवान हुआ जीव अपने हितको अनन्त सुखका कारण होनेसे उपकार करनेवाले
स्वात्मोपलब्धिरूप मोक्षको चाहता है
यहाँ पर एक स्वभावोक्ति कही जाती है कि ‘‘अपने
*जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो परिणमइ ।।८०।।
णवि कुव्वइ कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीव गुणे
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोह्णंपि ।।८१।।
[समयसारे कुन्दकुन्दाचार्यः ]

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१०० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
स्वस्योपकारकं वस्तु को न वाञ्छति, सर्वोप्यभिलषतीत्यर्थः ततो विद्धि कर्माविष्टो जीवः
कर्मसञ्चिनोतीति
तेथी जाण के कर्माविष्ट (कर्मथी बंधायेलो) जीव कर्मोनो संचय करे छे (नवां कर्म
ग्रहण करे छे).
भावार्थ :आ जीवने अनादि काळथी कर्म साथे संबंध छे. पूर्वसंचित कर्मना
उदयकाळे जीव जो पोतानुं आत्मस्वरूप भूली कर्मना उदयमां जोडाय अर्थात् तेमां आत्मबुद्धि
करे तो जूनां कर्म
नवा कर्मना आस्रवमां निमित्त थाय छे. ज्यारे जीव कर्मोदयमां जोडाय
छे. त्यारे कर्मनी बळजोरी छे एम कहेवाय छे, पण ज्यारे जीव कर्मविपाकने एकताबुद्धिए
भोगवतो नथी, त्यारे जूनां कर्मनो उदय नवा कर्म
बंधमां निमित्त थतो नथी. ते समये एम
कहेवाय के जीवना बळवान पुरुषार्थ आगळ कर्मनुं कांई चालतुं नथी.
कर्म तो जड छे. तेने तो सुखदुःख नहि होवाथी हितअहित होतुं नथी, पण
जीवना हीनाधिक पुरुषार्थनी अपेक्षाए ते बळवान के बळहीन कहेवाय छे. जीवना वर्तमान
पुरुषार्थ उपर ज कर्मना बळनुं माप व्यवहारे अंकाय छे. कर्मनो ज्यारे संचय थाय छे त्यारे
कर्म पोतानुं हित इच्छे छे, एम कहेवाय छे. ते जड होवाथी तेने चाहना के इच्छा होती
नथी. कर्म कर्मनुं हित इच्छे छे एटले कर्माविष्ट जीव कर्मनो संचय करे छे
एवो टीकाकारनो
कहेवानो भाव छे.
ज्यारे आ जीव स्वस्वरूपनुं भान करी, परथी हठी स्वसन्मुख तरफनो पुरुषार्थ
जेम जेम वधारतो जाय छे, तेम तेम तेनुं (जीवन) बळ वधतुं जाय छे अने कर्मनुं
निमित्तपणुं तूटतुं जाय छे. ए समये जीवनी सबळता थई अने कर्मनी निर्बळता थई; एम
कहेवामां आवे छे.
+
ज्यारे जीव स्वस्वरूपथी च्युत थई पर तरफनुंकर्म, निमित्तादि तरफवलण करी
परनी साथे एकताबुद्धिरूप ऊंधो पुरुषार्थ करे छे, त्यारे ते कर्मने स्वयं वश थई जाय छे.
ए समये जीवनी निर्बळता छे अने कर्मनी ते काळे सबळता छे, एम कहेवामां आवे छे.
अपने माहात्म्यके प्रभावके बढ़ने पर स्वार्थको अपनी-अपनी उपकारक वस्तुको कौन नहीं
चाहता ? सभी चाहते हैं
।।३१।।
+चेतन जो निज भानमां, कर्ता आप स्वभाव,
वर्ते नहि निजभानमां, कर्ता कर्म प्रभाव.....७८
[श्रीमद् राजचन्द्र कृत‘आत्मसिद्धि’.......७८]

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०१
यतश्चैवं ततः
परोपकृतिमुत्सृज्य स्वोपकारपरो भव
उपकुर्वन्परस्याज्ञो दृश्यमानस्य लोकवत् ।।३२।।
परनी साथे एकताबुद्धि आदि थतां जीवने राग-द्वेषादि थाय छे. आ रागद्वेषादिना
निमित्ते कर्मबंध स्वयं थाय छे. ए रीते कर्मनी संतति चालु राखवामां जीव स्वयं ज अपराधी
छे; कर्म के निमित्तोनो तेमां कांई दोष नथी. कर्मनुं सबळपणुं के निर्बळपणुं कहेवुं ते
व्यवहारनयनुं कथन छे.
‘अज्ञानीजीवना परिणामने निमित्त करीने पुद्गलो कर्मपणे परिणमे छे अने
पुद्गलकर्मने निमित्त करीने अज्ञानीजीव पण परिणमे छे. एम जीवना परिणामने अने
पुद्गलना परिणामने परस्पर मात्र निमित्त
नैमित्तिकभाव छे, पण परस्पर कर्ताकर्मभाव
नथी.’ ३१.(जुओ श्री समयसार गा. ८०, ८१, ८२नी टीका)
एम छे तेथीः
द्रश्यमान देहादिनो, मूढ करे उपकार,
त्यागी पर उपकारने, कर निजनो उपकार. ३२.
अन्वयार्थ :[अज्ञः लोकवत् ] तुं लोक समान मूढ थई [दृश्यमानस्य परस्य ]
देखवामां आवता (शरीरादि) पर पदार्थनो [उपकुर्वन् ] उपकार करे छे. (हवे) तुं [परोपकृतिं ]
परना उपकारनी इच्छा [उत्सृज्य ] छोडी दई [स्वोपकारपरः भव ] पोताना उपकारमां तत्पर
था.
इसलिये समझो कि कर्मोंसे बँधा हुआ प्राणी कर्मोंका संचय किया करता है जब
कि ऐसा है तब
प्रगट अन्य देहादिका, मूढ़ करत उपकार
सज्जनवत् या भूल को, तज कर निज उपकार ।।३२।।
अर्थपरके उपकार करनेको छोड़कर अपने उपकार करनेमें तत्पर हो जाओ
इन्द्रियोंके द्वारा दिखाई देते हुए शरीरादिकोंका उपकार करते हुए तुम अज्ञ (वास्तविक
वस्तुस्थितिको न जाननेवाले) हो रहे हो
तुम्हें चाहिये कि दुनियाँकी तरह तुम भी अपनी
भलाई करनेमें लगो

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१०२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका :अविद्याना वशे परना एटले कर्मना अथवा शरीरादिकना करवामां
आवता उपकारनो, विद्याना (सम्यक्ज्ञानना) अभ्यासथी त्याग करी, तुं प्रधानपणे पोतानो
(आत्मानो) अनुग्रह (उपकार) करवामां तत्पर था. शुं करतो (तुं)? उपकार करतो. कोनो?
परनो अर्थात् सर्वथा पोतानाथी बाह्य (भिन्न) देखाता तथा इन्द्रियो द्वारा अनुभवमां
आवता शरीरादिनो (उपकार करतो); कारण के (तुं) केवो छे? तुं अज्ञानी
तत्त्वोनो अजाण
छे. कोनी माफक? लोकोनी माफक. जेम (अज्ञानी) लोक ज्यां सुधी परने पररूप नथी
जाणतो, त्यां सुधी तेनो उपकार करे छे, परंतु तेने तत्त्वथी जाण्या पछी (अर्थात् स्वने
स्व
रूप अने परने पररूप जाण्या पछी) तेनो उपकार करवो छोडी दे छे अने पोतानो
उपकार करवा तत्पर थाय छे, तेम तुं पण तत्पर था (अर्थात् तत्त्वज्ञानी बनी आत्मोपकार
करवा तुं तत्पर था)
एवो अर्थ छे.
भावार्थ :अज्ञानने लीधे अज्ञानी जीव ज्यां सुधी कर्म तथा शरीरादिने पररूप
नथी जाणतो, त्यां सुधी ते तेनुं भलुं करवानीतेना उपर उपकार करवानी वृत्ति करे छे,
परंतु ज्यारे तेने भेदविज्ञानना बळे स्वपरनी भिन्नता भासे छे अर्थात् ते स्वने स्व
रूप अने परने पररूप जाणे छे, त्यारे तेने पर उपर उपकार करवानो भाव छूटी जाय
टीकापरस्य कर्मणो देहादेर्वा अविद्यावशात् क्रियमाणमुपकारं विद्याभ्यासेन
त्यक्त्वात्मानुग्रहप्रधानो भव त्वं किं कुर्वन्सन् ? उपकुर्वन् ! कस्य, परस्य सर्वथा स्वस्माद्वाह्यस्य
दृश्यमानस्येन्द्रियैरनुभूयमानस्य देहादेः किं विशिष्टो यतस्त्वं ? अज्ञस्तत्त्वानभिज्ञः
किंवल्लोकवत् यथा लोकः परं परत्वेनाजानंस्तस्योपकुर्वन्नपि तं तत्त्वेन ज्ञात्वा तदुपकारं त्यक्त्वा
स्वोपकारपरो भवत्येवं त्वमपि भवेत्यर्थः ।।३२।।
विशदार्थपर कहिये कर्म अथवा शरीरादिक, इनका अविद्या-अज्ञान अथवा
मोहके वशसे जो उपकार किया जाता रहा है, उसे विद्या सम्यग्ज्ञान अथवा वीतरागताके
अभ्याससे छोड़कर प्रधानतासे अपने (आत्माके) उपकार करनेमें तत्पर हो जाओ
तुम
सर्वथा अपने (आत्मा)से बाह्य इन्द्रियोंके द्वारा अनुभवमें आनेवाले इन शरीरादिकोंकी रक्षा
करना आदि रूप उपकार करनेमें लगे हुए हो
इसलिए मालूम पड़ता है कि तुम अज्ञ
(वस्तुओंके वास्तविक स्वरूपसे अजान) हो सो जैसे दुनियाके लोग जब तक दूसरेको
दूसरे रूपमें नहीं जानते, तब तक उनका उपकार करते हैं परन्तु ज्यों ही वे अपनेको
अपना और दूसरेको दूसरा जानते हैं, उनका (दूसरोंका) उपकार करना छोड़कर अपना
उपकार करनेमें लग जाते हैं
इसी प्रकार तुम भी तत्त्वज्ञानी बनकर अपनेको स्वाधीन
शुद्ध बनाने रूप आत्मोपकार करनेमें तत्पर हो जाओ ।।३२।।

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०३
छे अने ते स्वसन्मुख थई पोताना आत्मा उपर उपकार करवा उद्यमशील बने छे.
श्री पूज्यपादाचार्ये ‘समाधितंत्र’ श्लोक ३१मां कह्युं छे केः
‘आ शरीर जड छे. ते सुख-दुःखने कांई जाणतुं नथी, छतां मूढबुद्धिबहिरात्मा
तेनामां निग्रहअनुग्रहबुद्धि (अपकारउपकारबुद्धि) करे छे.
आ जीव, वस्तुस्वरूपथी अजाण होवाथी पोताना आत्माथी सर्वथा भिन्न शरीरादिनुं
कांई करी शकतो नथी, तोपण अज्ञानथी तेनी रक्षा करवा आदिरूप उपकार करवाना विकल्पमां
लाग्यो रहे छे; माटे आचार्यनो तेने उपदेश छे के, ‘अविद्यानो त्याग करी तत्त्वज्ञानी बन अने
उपकार करवानो विकल्प छोडी शुद्धात्मा बनवारूप आत्मोपकार कर.’
अहीं, शिष्य कहे छेकई रीते ते बंने वच्चेनो भेद जणाय? अर्थात् कया उपायथी
स्वपरनो भेद जणाय? ते भेद जाणनारने शुं (लाभ) थाय? एवो अर्थ छे.
आचार्य कहे छेः
गुरुउपदेश, अभ्यास ने, संवेदनथी जेह,
जाणे निजपर भेदने, वेदे शिवसुख तेह. ३३.
अथाह शिष्यः, कथं तयोर्विशेष इति केनोपायेन स्वपरयोर्भेदो विज्ञायेत तद्धि ज्ञातुश्च
किं स्यादित्यर्थः
गुरुराह
गुरुपदेशादभ्यासात्संवित्तेः स्वपरान्तरम्
जानति यः स जानाति मोक्षसौख्यं निरन्तरम् ।।३३।।
यहाँ पर शिष्य कहता है कि किस उपायसे अपने और परमें विशेषता (भेद) जानी
जाती है, और उसके जाननेवालेको क्या होगा ? किस फलकी प्राप्ति होगी ? आचार्य कहते
हैं
गुरु उपदेश अभ्याससे निज अनुभवसे भेद
निज पर को जो अनुभवे, लहै स्वसुख वेखेद ।।३३।।
न जानन्ति शरीराणिं सुखदुःखान्यबुद्धयः
निग्रहानुग्रहघियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ।।६१।।
[समाधितन्त्र, श्री पूज्यपादाचार्यः ]

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१०४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अन्वयार्थ :[यः ] जे [गुरूपदेशात् ] गुरुना उपदेशथी [अभ्यासात् ] अभ्यास द्वारा
[संवित्तेः ] स्वसंवेदनथी [स्वपरान्तरं ] स्वपरनो भेद [जानाति ] जाणे छे, [सः ] ते [निरन्तरं ]
निरंतर [मोक्षसौख्यं ] मोक्षनुं सुख [जानाति ] अनुभवे छे.
टीका :जे जाणे छे. शुं ते? स्वपरनुं अन्तर अर्थात् आत्मा अने परनो
भेद,अर्थात् जे पोताना आत्माने परथी भिन्न देखे छे (जाणे छे)एवो अर्थ छे.
कया कारणथी? संवित्तिथी (स्वसंवेदनथी) अर्थात् लक्षणथी पोताना लक्ष्यना (आत्माना)
अनुभवथी. ते पण केवी रीते? अभ्यासथी अर्थात् अभ्यासनी भावनाथी; ते (अभ्यास)
पण गुरुना उपदेशथी अर्थात् धर्माचार्यना तथा आत्माना सुद्रढ स्व
परनुं भेदज्ञान उत्पन्न
करनार वाक्यथी (थाय छे). तेवी रीते स्वात्माने परथी भिन्न अनुभव करनार ते निरंतर
एटले अविच्छिन्नपणे मोक्षसुखनो अनुभव करे छे, कारण के ते (मोक्षसुखनो) अनुभव,
कर्मोथी भिन्न आत्मानो अनुभव करनारने अविनाभावीपणे होय छे (बीजाने नहि).
तथा ‘तत्त्वानुशासन’ श्लोक १७०मां कह्युं छे केः
टीकायो जानाति किं ? तत्स्वपरान्तरं आत्म - परयोर्भेदं, यः स्वात्मानं परस्माद्भिन्नं
पश्यतीत्यर्थः कुतः हेतोः ? संवित्तेर्लक्षणतः स्वलक्ष्यानुभवात् एषोऽपि कुतः ? अभ्यासात्
अभ्यासभावनातः एषोऽपि गुरूपदेशात् धर्माचार्यस्यात्मनश्च सुदृढस्वपरविवेकज्ञानोत्पादक-
वाक्यात् स तथान्यापोढस्वात्मानुभविता मोक्षसौख्यं निरन्तरमविच्छिन्नमनुभवति कर्म-
विविक्तानुभाव्यविनाभावित्वात्तस्य
तथा चोक्तं [तत्त्वानुशासने ]
अर्थजो गुरुके उपदेशसे अभ्यास करते हुए अपने ज्ञान (स्वसंवेदन)से अपने
और परके अन्तरको (भेदको) जानता है वह मोक्षसम्बन्धी सुखका अनुभवन करता रहता
है
विशदार्थगुरु कहिये धर्माचार्य अथवा गुरु कहिये स्वयं आत्मा, उसके उपदेशसे
सुदृढ़ स्व पर विवेक ज्ञानके पैदा करनेवाले वाक्योंके और उसके अनुसार अभ्यास करना
चाहिये
बार बार अभ्यास करनेसे संवित्ति-अपने लक्ष्यका अनुभव होने लगता है उस
संवित्ति (स्वसंवेदन)के द्वारा जो स्वात्माको परसे भिन्न जानतादेखता है, भिन्न आत्माका
अनुभव करनेवाला मोक्ष-सुखको निरन्तर हमेशा विच्छेद रहित अनुभव करने लग जाता
है
क्योंकि वह मोक्ष-सुखका अनुभव, कर्मोंसे भिन्न आत्माका अनुभव करनेवालोंको होता
है, अन्योंको नहीं जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है‘‘तदेवानुभंवश्चाय,’’

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०५
तेनो जआत्मानो ज अनुभव करतां करतां आ आत्मा उत्कृष्ट एकाग्रताने प्राप्त करे
छे अने वाणीने अगोचर (वाणीथी कही शकाय नहि तेवो) आत्माधीन आनंद अनुभवे छे.
भावार्थ :जे, गुरु एटले धर्माचार्यतेमना उपदेश अने शास्त्राभ्यासना निमित्ते
आत्मसंवेदनथी स्वपरना भेदविज्ञाननो वारंवार अभ्यास करे छे, ते आत्माने परथी भिन्न
अनुभवे छे अने मोक्षसुखनो निरंतर स्वाद ले छे, कारण के मोक्षसुखनो अनुभव कर्मो
आदिथी आत्माने भिन्न अनुभव करनारने ज होय छे, बीजाने नहि.
परथी भिन्न आत्मानो सतत अनुभव करनारने ज आत्मस्वरूपमां उत्कृष्ट स्थिरता
(एकाग्रता) प्राप्त थाय छे अने ते वचनातीत अतीन्द्रिय आत्माधीन आनंद अनुभवे छे. ३३.
पछी शिष्य पूछे छेते बाबतमां कोण गुरु छे? अर्थात् मोक्ष सुखना अनुभवना
विषयमां कोण गुरु छे?
गुरु कहे छेः
निज हित अभिलाषी स्वयं, निज हित नेता आत्म,
निज हित प्रेरक छे स्वयं, आत्मानो गुरु आत्म. ३४.
‘तमेवानुभवंश्चायमैकाग्रयं षरमृच्छति
तथात्माधीनमान्न्दमेति वाचामगोचरम्’ ।।१७० इत्यादि
अथ शिष्यः पृच्छतिकस्तत्र गुरुरिति तत्र मोक्षसुखानुभवविषये ?
गुरुराह
स्वस्मिन्सदभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः
स्वयं हित[तं ]प्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ।।३४।।
उस आत्माका अनुभवन करते हुए यह आत्मा, उत्कृष्ट एकाग्रताको प्राप्त कर लेता
है, और इसी तरह मन तथा वाणीके अगोचर अथवा वचनोंसे भी न कहे जा सकनेवाले
स्वाधीन आनन्दको प्राप्त कर लेता है
।।३३।।
आगे शिष्य पूछता है कि मोक्ष-सुखके अनुभवके विषयमें कौन गुरु होता है ? आचार्य
कहते हैं
आपहिं निज हित चाहता, आपहि ज्ञाता होय
आपहिं निज हित प्रेरता, निज गुरु आपहि होय ।।३४।।

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१०६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अन्वयार्थ :(आत्मा) [स्वयं ] स्वयं [स्वस्मिन् ] पोतानामां [सद अभिलाषित्वात् ]
सत्नी (कल्याणनी या मोक्षसुखनी) अभिलाषा करतो होवाथी, [अभीष्टज्ञापकत्वतः ]
अभीष्टने (पोताना इच्छेला मोक्षसुखना उपायने) बतावतो होवाथी अने [हितप्रयोक्तृत्वात् ]
पोताना हितमां (मोक्षसुखना उपायमां) पोताने योजतो होवाथी [आत्मा एव ] आत्मा ज
[आत्मनः ] आत्मानो [गुरुः अस्ति ] गुरु छे.
टीका :जे शिष्य सदानिरंतर कल्याणनी (मोक्षसुखनी) अभिलाषा करे छे अने
तेथी तेना उपायनो जिज्ञासु छे, तेने (आत्मागुरु) ते उपाय बतावे छे अने ते उपाय
विषे नहि प्रवर्तता तेने तेमां प्रवर्तावे छे. ते गुरु खरेखर प्रसिद्ध छे.
एम होई, आत्मानो गुरु आत्मा ज होई शके.
(शिष्य) पूछे छे
केवी रीते?
स्वयं (आत्मा) आत्मा वडे मोक्षसुखना अभिलाषी आत्मामां सत् एटले प्रशस्त
मोक्षसुखनी निरंतर अभिलाषा करे छे; अर्थात् ‘मोक्षसुख मने प्राप्त थाओ’ एवा भावथी
आकांक्षा करे छे. तथा अभीष्ट (इच्छेला) अर्थात् आत्मा द्वारा जिज्ञासित मोक्षसुखना
उपायना जिज्ञासु आत्माने आत्मविषय संबंधी बतावनार होवाथी अर्थात् ‘आ मोक्षसुखनो
टीकायः खलु शिष्यः सदा अभीक्ष्णं कल्याणमभिलषति तेन जिज्ञास्यमानं तदुपायं
तं ज्ञापयति तत्र चाप्रवर्त्तमानं तं प्रवर्तयति स किल गुरुः प्रसिद्धः एवं च सत्यात्मनः आत्मैव
गुरुः स्यात् कुत इत्याहस्वयमात्मना स्वस्मिन्मोक्षसुखाभिलाषिण्यात्मनि सत् प्रशस्तं
मोक्षसुखमभीक्ष्णमभिलषति मोक्षसुखं मे सम्पद्यतामित्याकाङ्क्षतीत्येवंभावात् तथाभीष्टस्यात्मना
जिज्ञास्यमानस्य मोक्षसुखोपायस्यात्मविषये ज्ञापकत्वादेष मोक्षसुखोपायो मया सेव्य इति
अर्थजो सत्का कल्याणका वांछक होता है, चाहे हुए हितके उपायोंको जतलाता
है, तथा हितका प्रवर्त्तक होता है, वह गुरु कहलाता है जब आत्मा स्वयं ही अपनेमें
सत्कीकल्याणकी यानी मोक्ष-सुखकी अभिलाषा करता है, अपने द्वारा चाहे हुए मोक्ष-
सुखके उपायोंको जतलानेवाला है, तथा मोक्ष-सुखके उपायोंमें अपने आपको प्रवर्तन
करानेवाला है, इसलिए अपना (आत्माका) गुरु आप (आत्मा) ही है
विशदार्थयह आत्मा स्वयं ही जब मोक्ष सुखाभिलाषी होता है, तब सत्की यानी
मोक्ष-सुखकी हमेशा अभिलाषा करता रहता है, कि मुझे मोक्ष-सुख प्राप्त हो जावे इसी
तरह जब स्वयं आत्मा मोक्ष-सुखके उपायोंको जानना चाहता है, तब यह स्वयं मोक्षके
सुखके उपायोंको जतलानेवाला बन जाता है, कि यह मोक्ष-सुखके उपाय मुझे करना