कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ३९
टीका — यावदतिबाह्यते अतिक्रम्यते; प्रेर्यते । कासौ ? विपत् सहजशारीरमान-
सागन्तुकानामापदां मध्ये या काप्येका विवक्षिता आपत् । जीवेनेति शेषः । क्व ? भवपदावर्ते
भवः संसारः पदावर्त इव — पादचाल्यघटीयन्त्रमिव — भूयो भूयः परिवर्त्तमानत्वात् । केव,
पदिकेव — पादाक्रान्तदण्डिका यथा तावद्भवति । काः ? अन्या अपूर्वाः प्रचुराः — बह्वो विपदः
आपदः पुरो अग्रे जीवस्य पदिका इव, काछिकस्येति सामर्थ्यं योज्यं । अतो जानीहि दु
खैकनिबन्धन विपत्तिनिरन्तरत्वात् संसारस्यावश्यविनाश्यत्त्वम् ।।
एक विपत्ति भुगतकर तय की जाती है, उसी समय दूसरी-दूसरी बहुतसी विपत्तियाँ सामने
आ उपस्थित हो जाती हैं ।
विशदार्थ — पैरसे चलाये जानेवाले घटीयंत्रको पदावर्त कहते हैं, क्योंकि उसमें
बार बार परिवर्तन होता रहता है । सो जैसे उसमें पैरसे दबाई गई लकड़ी या पटलीके
व्यतीत हो जानेके बाद दूसरी पटलियाँ आ उपस्थित होती हैं, उसी तरह संसाररूपी
पदावर्तमें एक विपत्तिके बाद दूसरी बहुतसी विपत्तियाँ जीवके सामने आ खड़ी होती हैं ।
इसलिये समझो कि एकमात्र दुःखोंकी कारणीभूत विपत्तियोंका कभी भी अन्तर न
पड़नेके कारण यह संसार अवश्य ही विनाश करने योग्य है । अर्थात् इसका अवश्य नाश
करना चाहिए ।।१२।।
ते पहेलां तो [अन्याः ] बीजी [प्रचुराः ] घणी [विपदः ] विपत्तिओ [पुरः भवन्ति ] सामे
उपस्थित थाय छे.
टीका : — दूर कराय छे – अतिक्रमाय छे – प्रेराय छे ते पहेलां, कोण ते? विपत्ति
(दुःख) – अर्थात् सहज शारीरिक या मानसिक आवी पडती आपदाओमां कोई एक विवक्षित
(खास) आपदा. [‘जीव द्वारा’ ए शब्द अध्याहार छे.] क्यां? भव पदावर्तमां – भव एटले
संसार अने पदावर्त एटले पगथी चलाववामां आवतुं घटीयंत्र, कारण के तेमां वारंवार
परिवर्तन थतुं रहे छे, — घटीयंत्र जेवा संसारमां. कोनी माफक? पदाक्रान्त (पग मूकी
चलाववामां आवती) पाटलीनी जेम (दूर कराय ते पहेलां अर्थात् एक पाटली व्यतीत थाय
ते पहेलां बीजी पाटली) उपस्थित थाय छे. कोण? (उपस्थित थाय छे.) अन्य एटले अपूर्व
अने प्रचुर एटले बहु विपत्तिओ — आपदाओ, जीवनी सामे, जेम नदीमां काछिकनी*
सामे पाटलीओ (उपस्थित थाय छे तेम.) — एम सामर्थ्यथी समजवुं.
* काछिक – नदी उपरनुं प्राणी.