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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनः शिष्य एवाह — ‘न हि सर्वे विपद्वन्तः ससंपदोपि दृश्यन्त इति’ भगवन् ! समस्ता
अपि संसारिणो न विपत्तियुक्ताः सन्ति सश्रीकाणामपि केषांचिद् दृश्यमानत्वादिति ।
अत्राह —
दुरर्ज्येनासुरक्ष्येण नश्वरेण धनादिना ।
स्वस्थंमन्यो जनः कोऽपि ज्वरवानिव सर्पिषा ।।१३।।
फि र शिष्यका कहना है कि, भगवन् ! सभी संसारी तो विपत्तिवाले नहीं हैं, बहुतसे
सम्पत्तिवाले भी दिखनेमें आते हैं । इसके विषयमें आचार्य कहते हैं : —
कठिन प्राप्त संरक्ष्य ये, नश्वर धन पुत्रादि ।
इनसे सुखकी कल्पना, जिमि घृतसे ज्वर व्याधि ।।१३।।
तेथी, दुःखना कारणभूत अनेक विपत्तिओ निरंतर आवती होवाथी संसार अवश्य
विनाश करवा योग्य छे. एम तुं जाण.
भावार्थ : — संसार घटीयंत्र जेवो छे. घटीयंत्रने तेनी पाटलीओ उपर पग मूकी गोळ
गोळ चलाववामां आवे छे. पगथी एक पाटली दूर कराय के तरत ज बीजी पाटलीओ एक
पछी एक यंत्र चलावनारनी सामे उपस्थित (हाजर) थाय छे, तेम संसारमां एक विपत्ति
(आपदा) दूर कराय के तरत ज बीजी अनेक विपत्तिओ तेनी सामे हाजर ज थाय छे.
माटे संसार अवश्य नाश करवा योग्य छे. संसार प्रत्येनी रुचिनो त्याग थतां अर्थात्
तेना तरफ उपेक्षाबुद्धि थतां संसारनो अभाव थई जाय छे. पर पदार्थो प्रत्ये ममत्वभाव,
अहंभाव, कर्तृत्वभाव तथा राग द्वेषादिरूप भाव — ए आंतरिक संसार छे, – अज्ञानताए
ऊभो करेलो संसार छे. आत्मस्वभावनी सन्मुखताए तेनो नाश थतां बाह्य संयोगरूप
संसारनो पण स्वयं अभाव थई जाय छे. १२.
फरीथी शिष्य ज बोले छे — ‘भगवन्! बधाय विपत्तिवाळा होता नथी,
सम्पत्तिवाळा (सुखी) पण जोवामां आवे छे — अर्थात् बधाय संसारीओ विपत्तिवाळा
(दुःखी) होता नथी, कारण के केटलाक लक्ष्मीवाळा (सुखी) लोक पण जोवामां आवे छे.’
तेना उत्तरमां आचार्य कहे छे —
ज्वर – पीडित ज्यम घी वडे, माने निजने चेन,
कष्ट – साध्य धन आदिथी, माने मूढ सुख तेम. १३.