Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Anyamat Niroopit Tattva Vichar Sankhya Mat Nirakaran.

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ए प्रमाणे आ क्षेत्रकाळमां जे जे मतोनी घणी प्रवृत्ति छे तेनुं मिथ्यापणुं दर्शाव्युं.
प्रश्नःजो ए मतो मिथ्या छे, तो मोटा मोटा राजादिको वा मोटा विद्यावान
ए मतोमां केवी रीते प्रवर्ते छे?
उत्तरःजीवोने मिथ्यावासना अनादिथी छे, हवे ए मतोमां मिथ्यात्वनुं ज पोषण
छे, वळी जीवोने विषयकषायरूप कार्योनी इच्छा वर्ते छे अने तेमां विषयकषायरूप कार्योनुं
ज पोषण छे. तथा राजादिको अने विद्यावानोनुं एवा धर्ममां विषयकषायरूप प्रयोजन सिद्ध
थाय छे, अने जीव तो लोकनिंद्यपणाने पण उल्लंघी पाप पण जाणीने ते जे कार्योने करवा
इच्छे ते कार्यो करतां कोई धर्म बतावे तो एवा धर्ममां कोण न जोडाय? तेथी ए धर्मोनी
प्रवृत्ति विशेष छे.
प्रश्नःए धर्ममतोमां पण विरागता अने दया इत्यादिक कह्यां छे?
उत्तरःजेम झमक आप्या विना खोटुं द्रव्य (नाणुं) चाले नहि, तेम साच मेळव्या
विना जूठ चाले नहि; परंतु सर्वना हितरूप प्रयोजनमां विषयकषायनुं ज पोषण कर्युं छे.
जेम गीतामां उपदेश आपीने युद्ध कराववानुं प्रयोजन प्रगट कर्युं, तथा वेदांतमां शुद्धनिरूपण
करी स्वच्छंदी थवानुं प्रयोजन दर्शाव्युं, तेम अन्य पण जाणवुं. वळी आ काळ तो निकृष्ट छे,
तेथी आ काळमां निकृष्टधर्मनी ज प्रवृत्ति विशेष होय छे.
जुओ! आ काळमां मुसलमान घणा प्रधान थई गया अने हिंदुओ घटी गया, तथा
हिंदुओमां पण अन्य तो वधी गया अने जैनो घटी गया, ए बधो काळनो दोष छे.
ए प्रमाणे आ क्षेत्रमां, आ काळमां मिथ्याधर्मनी प्रवृत्ति घणी जोवामां आवे छे.
अन्यमत निरुपित तत्त्व विचार
हवे पंडितपणाना बळथी कल्पित युक्तिवडे जुदाजुदा मत स्थापित थया छे, तेमां जे
तत्त्वादिक माने छे, तेनुं निरूपण करीए छीए.
सांख्यमत निराकरण
सांख्यमतमां पचीस तत्त्व माने छे, ते अहीं कहीए छीएसत्त्व, रज अने तमः ए
त्रण गुण कहे छे. सत्त्ववडे प्रसाद (प्रसन्नता) थाय छे, रजोगुणवडे चित्तनी चंचळता थाय छे,
तथा तमोगुणवडे मूढता थाय छे इत्यादि लक्षण तेओ कहे छे. ए रूप अवस्थानुं नाम प्रकृति
छे तेनाथी बुद्धि ऊपजे छे. तेनुं ज नाम महत्त्व छे. तेनाथी अहंकार ऊपजे छे, अहंकारथी
सोळ मात्रा थाय छे, पांच ज्ञानइन्द्रिय थाय छे
स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु अने श्रोत्र तथा
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १२५