एक मन थाय छे, पांच कर्मेन्द्रिय थाय छे — वचन, पग, हाथ, गुदा अने लिंग, पांच तन्मात्रा
थाय छे – रूप, रस, गंध, स्पर्श अने शब्द. वळी रूपथी अग्नि, रसथी जळ, गंधथी पृथ्वी,
स्पर्शथी पवन, शब्दथी आकाश ए प्रमाणे थयां कहे छे. ए रीते चोवीस तत्त्व तो प्रकृतिस्वरूप
छे, एनाथी भिन्न निर्गुण कर्ता – भोक्ता पुरुष एक छे.
ए प्रमाणे पचीस तत्त्व कहे छे, पण ए कल्पित छे. कारण के – ए राजसादि गुण आश्रय
विना केवी रीते होय? एनो आश्रय तो चेतनद्रव्य ज संभवे छे. वळी एनाथी बुद्धि थई कहे
छे, पण बुद्धि नाम तो ज्ञाननुं छे, कोई ज्ञानगुणधारी पदार्थमां ज ए थती देखाय छे, तो
एनाथी ज्ञान थयुं केम मनाय? अहीं कोई कहे के – ‘‘बुद्धि जुदी छे अने ज्ञान जुदुं छे’’ तो
मन तो आगळ सोळ मात्रामां कह्युं, तथा ज्ञान जुदुं कहेशो तो बुद्धि कोनुं नाम ठरावशो? वळी
तेनाथी अहंकार थयो कह्यो. हवे पर वस्तुमां ‘‘हुं करुं छुं’’ एवुं मानवानुं नाम अहंकार छे,
पण साक्षीभूतपणे जाणवाथी तो अहंकार थतो नथी, तो ते ज्ञानवडे ऊपज्यो केम कहेवाय?
वळी अहंकारवडे सोळ मात्रा ऊपजी कही. तेमां पांच ज्ञानेन्द्रियो कही, हवे शरीरमां
नेत्रादि आकाररूप द्रव्यइन्द्रियो छे, ते तो पृथ्वीआदिवत् देखाय छे, अने अन्य वर्णादिकने
जाणवारूप भावइन्द्रिय छे ते ज्ञानरूप छे, त्यां अहंकारनुं शुं प्रयोजन छे? शुं अहंकार बुद्धिरहित
कोईने देखाय छे? तो अहंकारवडे नीपजवां केम संभवे?
वळी मन कह्युं, पण ए मन इन्द्रियवत् ज छे. कारण के द्रव्यमन शरीररूप छे, तथा
भावमन ज्ञानरूप छे. पांच कर्मेन्द्रियो कही, पण ए तो शरीरनां ज अंग छे, मूर्तिक छे. अमूर्तिक
अहंकारथी तेनुं ऊपजवुं केवी रीते मनाय?
वळी पांच ज कर्मेन्द्रियो नथी, पण शरीरनां बधांय अंगो कार्यकारी छे. तथा वर्णन तो
सर्वजीवाश्रित छे. केवळ मनुष्यपर्यायाश्रित ज नथी, तेथी सूंढ – पूंछ इत्यादि अंग पण कर्मेन्द्रियो
ज छे. तो अहीं पांचनी ज संख्या केम कहो छो?
वळी स्पर्शादिक पांच तन्मात्रा कही, पण रूपादिक कांई जुदी वस्तु नथी, ए तो
परमाणुओथी तन्मय गुण छे, तो ए जुदा केवी रीते नीपज्या? वळी अहंकार तो अमूर्तिक
जीवनो परिणाम छे, तेथी ए मूर्तिकगुण तेनाथी नीपज्यो केवी रीते मानीए?
तथा ए पांचेथी अग्नि आदि नीपज्या कहे छे, ते पण प्रत्यक्ष जूठ छे, कारण के
– रूपादिक अने अग्नि आदिने सहभूत गुणगुणीसंबंध छे, मात्र कहेवामां भिन्नता छे; पण
वस्तुमां भेद नथी. कोई प्रकारे जुदा थता भासता नथी, कहेवामात्र वडे ज तेमां भेद उपजावीए
छीए, तो रूपादिकवडे अग्नि आदि ऊपज्या केवी रीते मानीए? कहेवामां पण गुणीमां गुण
छे. पण गुणथी गुणी नीपज्यो केवी रीते मनाय?
१२६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक