वळी ए सर्वथी भिन्न एक पुरुष कहे छे, पण तेनुं स्वरूप अवक्तव्य कही कांई प्रत्युत्तर
करता नथी. तो कोण समजे? जो पूछीए के – ते केवो छे? क्यां छे? केवी रीते कर्ता – हर्ता छे?
ते बताव. जे बतावे तेमां विचार करतां अन्यथापणुं भासे.
ए प्रमाणे सांख्यमतमां कहेलां कल्पित तत्त्व मिथ्या जाणवां.
वळी तेओ पुरुषने प्रकृतिथी भिन्न जाणवानुं नाम मोक्षमार्ग कहे छे; पण प्रथम तो
प्रकृति – पुरुष कोई छे ज नहि. तथा केवळ जाणवामात्रथी तो सिद्धि थती नथी. पण जाणपणावडे
रागादिक मटाडतां सिद्धि थाय छे. केवळ जाणवामात्रथी तो कांई रागादिक घटे नहि. कारण के –
प्रकृतिनुं कर्तव्य माने अने पोते अकर्ता रहे, त्यारे रागादि शामाटे घटाडे? माटे ए मोक्षमार्ग
नथी.
वळी प्रकृतिथी पुरुषनुं भिन्न थवुं तेने मोक्ष कहे छे. हवे पचीस तत्त्वोमां चोवीस तत्त्व
तो प्रकृति संबंधी कह्यां अने एक पुरुष भिन्न कह्यो, हवे ते तो जुदो ज छे. कोई जीवपदार्थ
ए पचीस तत्त्वोमां कह्यो ज नथी, वळी पुरुषने ज प्रकृति संयोग थतां जीवसंज्ञा थाय छे, तो
जुदा – जुदा पुरुष प्रकृतिसहित छे, तेमां पाछळथी साधन वडे कोई पुरुष प्रकृतिरहित थाय छे
एम सिद्ध थयुं, पुरुष एक तो न ठर्यो!
वळी प्रकृति ए पुरुषनी भूल छे के कोई व्यंतरीवत् जुदी ज छे? के जे जीवने आवी
वळगे छे? जो तेनी भूल छे, तो प्रकृतिथी इन्द्रियादिक वा स्पर्शादिक तत्त्व ऊपज्यां केवी रीते
मानीए? तथा जो जुदी छे, तो ते पण एक वस्तु थई, सर्व कर्तव्य तेनुं ठर्युं, पुरुषनुं कांई
कर्तव्य ज रह्युं नहि, पछी उपदेश शा माटे आपो छो?
ए प्रमाणे मोक्षमार्गपणुं मानवुं मिथ्या छे.
वळी त्यां प्रत्यक्ष, अनुमान अने आगम त्रण प्रमाण कहे छे, पण तेना सत्य – असत्यनो
निर्णय जैनना न्यायग्रंथोथी जाणवो.
ए सांख्यमतमां कोई तो ईश्वरने मानता नथी, कोई एक पुरुषने ईश्वर माने छे, कोई
शिवने तथा कोई नारायणने देव माने छे. एम तेओ पोतानी इच्छानुसार कल्पना करे छे, कांई
निश्चय नथी. ए मतमां कोई जटा धारण करे छे, कोई चोटी राखे छे, कोई मुंडित थाय छे.
तथा कोई कथ्थई वस्त्र पहेरे छे. इत्यादिक अनेक प्रकारना वेषधारी तत्त्वज्ञानना आश्रयवडे पोताने
महंत कहेवडावे छे.
ते प्रमाणे सांख्यमत निरूपण कर्युं.
✾ नैयायिक मत – निराकरण ✾
शिवमतमां नैयायिक अने वैशेषिक एवा बे भेद छे.
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १२७