Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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तेमां नैयायिकमां प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, द्रष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय,
वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छळ, जाति अने निग्रहस्थानए सोळ तत्त्व कहे छे.
प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द अने उपमा ए चार प्रकारना प्रमाण कहे छे; आत्मा, देह,
अर्थ अने बुद्धि इत्यादिने प्रमेय कहे छे; ‘‘आ शुं छे’’ तेनुं नाम संशय छे; जेना अर्थे प्रवृत्ति
थाय ते प्रयोजन छे; जेने वादी
प्रतिवादी माने ते द्रष्टांत छे, द्रष्टांत वडे जेने ठरावीए ते सिद्धांत
छे; अनुमाननां प्रतिज्ञा आदि पांच अंग ते अवयव छे, संशय दूर थतां कोई विचारथी ठीक
थाय ते तर्क छे. ते पछी प्रतीतिरूप जाणवुं थाय ते निर्णय छे, आचार्य
शिष्यमां पक्ष प्रतिपक्ष
वडे अभ्यास ते वाद छे, जाणवानी इच्छारूप कथामां जे छळजाति आदि दूषण ते जल्प छे,
प्रतिपक्षरहित वाद ते वितंडा छे, साचा हेतु नहि एवा असिद्ध आदि भेदसहित ते हेत्वाभास
छे, छळपूर्वक वचन ते छल छे, खरां दूषण नथी एवा दूषणाभास ते जाति छे, अने जेनाथी
परवादीनो निग्रह थाय ते निग्रहस्थान छे.
ए प्रमाणे संशयादि तत्त्व कहे छे, पण ए कोई वस्तुस्वरूप तत्त्व तो नथी. ज्ञाननो
निर्णय करवाने वा वादवडे पांडित्य प्रगट करवाना कारणभूत विचारोने तत्त्व कहे छे, पण एनाथी
परमार्थकार्य केवी रीते थाय? काम
क्रोधादि भावोने मटाडी निराकुळ थवुं ए कार्य छे. हवे ए
प्रयोजन तो अहीं कांई पण देखाड्युं ज नहि. पांडित्यनी अनेक युक्तिओ बनावी, ए पण एक
चातुर्य छे. तेथी ए तत्त्व तत्त्वभूत नथी.
तमे कहेशो के‘‘एने जाण्या विना प्रयोजनभूत तत्त्वनो निर्णय करी शकातो नथी, माटे
एने तत्त्व कहे छे.’’ हवे एवी परंपरा तो व्याकरणवाळा पण कहे छे केव्याकरण भणवाथी
अर्थनो निर्णय थाय छे, तथा भोजनादिकना अधिकारी पण कहे छे केभोजन करवाथी शरीरनी
स्थिरता थतां तत्त्वनिर्णय करवाने समर्थ थाय, पण एवी युक्ति कार्यकारी नथी.
अहीं जो एम कहेशो के‘‘व्याकरणभोजनादिक तो अवश्य तत्त्वज्ञाननां कारण नथी,
ए तो लौकिककार्य साधवानां कारण छे.’’ तो जेम ए छे तेम कहेलां तत्त्वो पण लौकिक कार्य
साधवानां ज कारणो छे. जेम इन्द्रियादिकथी जाणवाने प्रत्यक्षादि प्रमाण कहे छे वा स्थाणु
पुरुषादिमां संशयादिकनुं निरूपण कर्युं. तेथी जेने जाणवाथी कामक्रोधादिक अवश्य दूर थाय,
निराकुळता ऊपजे ते ज तत्त्व कार्यकारी छे.
तमे कहेशो के‘‘प्रमेय तत्त्वमां आत्मादिकनो निर्णय थाय छे, तेथी ते कार्यकारी छे,’’
पण प्रमेय तो बधीय वस्तुओ छे, प्रमीतिनो विषय नथी एवी कोई पण वस्तु नथी, माटे प्रमेयने
तत्त्व शा माटे कह्युं? आत्मा आदि तत्त्व कहेवां हतां.
वळी आत्मादिकनुं स्वरूपपणुं अन्यथा प्ररूपण कर्युं छे, एम पक्षपातरहित विचार
करवाथी भासे छे. जेम केआत्माना बे भेद तेओ कहे छेःपरमात्मा अने जीवात्मा. हवे
१२८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक