Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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माटे जे मिथ्यात्वनो त्याग करवा इच्छे छे, ते प्रथम ज कुदेवकुगुरुकुधर्मनो त्यागी
थाय, सम्यक्त्वना पच्चीस मळदोषोना त्यागमां पण अमूढद्रष्टि वा छ आयतनमां पण तेनो
ज त्याग कराव्यो छे. माटे तेनो अवश्य त्याग करवो.
वळी ए कुदेवादिना सेवनथी जे मिथ्यात्वभाव थाय छे, ते हिंसादिपापोथी पण
महानपाप छे. कारण केएना फळथी निगोदनर्कादिपर्याय प्राप्त थाय छे, त्यां अनंतकाळसुधी
महासंकट पामे छे, तथा सम्यग्ज्ञाननी प्राप्ति पण महादुर्लभ थई जाय छे.
श्री षट्पाहुडमां (भावपाहुडमां) पण कह्युं छे के
कुच्छियधम्मम्मि रओ कुच्छियपाखंडिभत्तिसंजुत्तो
कुच्छियतवं कुणंतो कुच्छियगइभायणो होइ ।।१४०।।
अर्थःजे कुत्सित्धर्ममां लीन छे, कुत्सित् पाखंडीओनी भक्तिवडे संयुक्त छे, तथा
कुत्सित् तप करे छे, ते जीव कुत्सित् अर्थात् माठीगति भोगववावाळो थाय छे.
हे भव्य! किंचित्मात्र लोभ वा भयथी पण ए कुदेवादिनुं सेवन न कर! कारण के
तेनाथी अनंतकाळ सुधी महादुःख सहन करवुं थाय छे, माटे एवो मिथ्यात्वभाव करवो योग्य
नथी.
जैनधर्ममां तो एवी आम्नाय छे के पहेलां मोटुं पाप छोडावी पछी नानुं पाप
छोडाववामां आवे छे. तेथी ए मिथ्यात्वने सातव्यसनादिथी पण महानपाप जाणी पहेलां
छोडाव्युं छे. माटे जे पापना फळथी डरतो होय, तथा पोताना आत्माने दुःखसमुद्रमां डुबाववा
न इच्छतो होय, ते जीव आ मिथ्यात्वपापने अवश्य छोडो. निंदा-प्रशंसादिना विचारथी शिथिल
थवुं योग्य नथी. नीतिशास्त्रमां पण एम कह्युं छे के
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः
।। (नीतिशतक-८४)
कोई निंदे छे तो निंदो, स्तुति करे छे तो स्तुति करो, लक्ष्मी आवो वा गमे त्यां
जाओ, तथा मरण आजे ज थाओ वा युगांतरे थाओ; परंतु नीतिमां निपुण पुरुषो
न्यायमार्गथी एक पगलुं पण चलित थता नथी.
एवो न्याय विचारी, निंदा-प्रशंसादिना भयथी वा लोभादिकथी पण अन्यायरूप
मिथ्यात्वप्रवृत्ति करवी योग्य नथी.
१९६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक