२२२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
पण केटलाक पापीपुरुषे पोतानुं कल्पित कथन कर्युं छे अने जिनवचन ठराव्युं छे तेने
जैनमतनां शास्त्र जाणी प्रमाण न करवुं. त्यां पण प्रमाणादिथी परीक्षा करी वा परस्पर शास्त्रोथी
तेनी विधि मेळवी, वा ‘‘आ प्रमाणे संभवित छे के नहि?’’ एवो विचार करी विरुद्ध अर्थने
मिथ्या ज जाणवो.
जेम कोई ठगे पोते पत्र लखी तेमां लखवावाळानी जग्याए कोई शाहुकारनुं नाम लख्युं
होय, त्यां तेना नामना भ्रमथी कोई पोतानुं धन ठगाय तो ते दरिद्री ज थाय; तेम कोई
दुराशयीए पोते ग्रंथादिक बनावी तेमां कर्तानुं नाम जिन, गणधर अने आचार्योनुं धर्युं होय
त्यां ए नामना भ्रमथी कोई जूठुं श्रद्धान करे, तो ते मिथ्याद्रष्टि ज थाय.
प्रश्नः — तो १गोम्मटसार गाथा २७मां एम कह्युं छे के – ‘‘सम्यग्द्रष्टि जीव
अज्ञानी गुरुना निमित्तथी जूठुं पण श्रद्धान करे तो आज्ञा मानवाथी सम्यग्द्रष्टि ज
छे’’ – ए कथन केवी रीते कर्युं छे?
उत्तरः — जे प्रत्यक्ष – अनुमानादिगोचर नथी, तथा सूक्ष्मपणाथी जेनो निर्णय न थई
शके तेनी अपेक्षाए ए कथन छे, पण मूळभूत देव – गुरु – धर्मादिक वा तत्त्वादिकनुं अन्यथा
श्रद्धान थतां तो सम्यग्दर्शन सर्वथा रहे ज नहि – एवो ज निश्चय करवो, माटे परीक्षा कर्या
विना केवळ आज्ञावडे ज जे जैनी छे, ते पण मिथ्याद्रष्टि जाणवा.
वळी केटलाक परीक्षा करीने पण जैनी थाय छे, परंतु मूळ परीक्षा करता नथी, मात्र
दया – शील – तप – संयमादि क्रियाओवडे, पूजा – प्रभावनादि कार्योवडे, अतिशय – चमत्कारादिवडे वा
जैनधर्मथी ‘इष्टिप्राप्ति थवाना कारणे जैनमतने उत्तम जाणी प्रीतिवान थई जैनी थाय छे. परंतु
अन्यमतमां पण एवां कार्यो तो होय छे. तेथी ए लक्षणोमां तो अतिव्याप्ति दोष होय छे.
प्रश्नः — ए कार्यो जैनधर्ममां जेवां छे, तेवां अन्यमतमां होतां नथी, तेथी
त्यां अतिव्याप्ति दोष नथी?
उत्तरः — ए तो सत्य छे, एम ज छे, परंतु जेवां तुं दयादिक माने छे, तेवां तो
तेओ पण निरूपण करे छे. परजीवोनी रक्षाने तुं दया कहे छे, त्यारे तेओ पण ते ज कहे
छे. ए ज प्रमाणे अन्य पण जाणवां.
त्यारे ते कहे छे के — तेमनामां ए बराबर नथी, केमके तेओ कोई वखत दया प्ररूपे
छे, कोई वखत हिंसा प्ररूपे छे.
१.सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहदि ।
सद्दहदि असब्भावं अजाणमाणां गुरुणियोगा ।।२७।। (जीवकांड)