सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २२३
उत्तरः — त्यां दयादिकनो अंशमात्र तो आव्यो! माटे ए लक्षणोने अतिव्याप्तिपणुं
होय छे, तेथी एनाथी साची परीक्षा थाय नहि.
तो केवी रीते थाय? जैनधर्ममां तो सम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्रने मोक्षमार्ग कह्यो छे,
त्यां सत्यदेवादिक वा जीवादिकनुं श्रद्धान करवाथी सम्यग्दर्शन थाय छे, तेने यथार्थ जाणतां
सम्यग्ज्ञान थाय छे, तथा खरेखरा रागादिक मटतां सम्यक्चारित्र थाय छे. हवे तेना स्वरूपनुं
जेवुं जैनमतमां निरूपण कर्युं छे, तेवुं कोईपण ठेकाणे निरूपण कर्युं नथी, तथा जैन विना
अन्यमतीओ एवां कार्यो करी शकता नथी. माटे ए ज जैनमतनुं साचुं लक्षण छे. ए लक्षणने
ओळखीने जे परीक्षा करे छे ते ज श्रद्धानी छे, पण ए विना अन्य प्रकारथी जे परीक्षा करे
छे, ते मिथ्याद्रष्टि ज रहे छे.
वळी केटलाक संगतिवडे जैनधर्म धारे छे, केटलाक महान पुरुषने जैनधर्ममां प्रवर्तता
देखी पोते पण तेमां प्रवर्ते छे, तथा कोई देखादेखी जैनधर्मनी शुद्ध – अशुद्ध क्रियाओमां प्रवर्ते
छे, – इत्यादि अनेक प्रकारना जीवो पोते तो विचारपूर्वक जैनधर्मनां रहस्यने पिछाणता नथी,
अने जैननाम धरावे छे, ते सर्व मिथ्याद्रष्टि ज जाणवा.
हा, एटलुं खरुं के — जैनमतमां पापप्रवृत्ति विशेष थई शकती नथी अने पुण्यनां
निमित्त घणां छे, तथा साचा मोक्षमार्गनां कारण पण त्यां बन्यां रहे छे; तेथी जे कुळादिकथी
पण जैनी छे तेओ बीजाओ करतां तो भला ज छे.
❀ सांसारिक प्रयोजन अर्थे धार्मधाारक व्यवहाराभासी ❀
जे जीव आजीविका अर्थे, मोटाई माटे, वा कोई विषय – कषायसंबंधी प्रयोजन विचारी
कपटथी जैन थाय छे ते तो पापी ज छे; कारण के – अति तीव्रकषाय थतां ज एवी बुद्धि थाय
छे; तेमनुं सुलझवुं पण कठण छे. जैनधर्म तो संसारनाशना अर्थे सेववामां आवे छे, जे ए
वडे सांसारिक प्रयोजन साधवा इच्छे छे ते मोटो अन्याय करे छे, माटे ते तो मिथ्याद्रष्टि
ज छे.
प्रश्नः — हिंसादिकवडे जे कार्यो करीए, ते कार्यो धर्मसाधनवडे सिद्ध करीए
तो तेमां बूरुं शुं थयुं? एथी तो बंने प्रयोजन सधाय छे?
उत्तरः — पापकार्य अने धर्मकार्यनुं एकसाधन करतां तो पाप ज थाय. जेम कोई
धर्मना साधनरूप चैत्यालय बनावी, तेने ज स्त्रीसेवनादि पापोनुं पण साधन करे; तो तेथी
पाप ज थाय. हिंसादिक करी भोगादिकना अर्थे जुदुं मंदिर बनावे तो बनावो, परंतु
चैत्यालयमां भोगादिक करवा योग्य नथी; तेम पूजा – शास्त्रादिक के जे धर्मनां साधनरूप कार्यो
छे, तेने ज आजीविकादि पापनां पण साधन बनावे तो पापी ज थाय. आजीविकादिक अर्थे