२२४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
हिंसादिकवडे व्यापारादिक करे तो करो, परंतु पूजनादि कार्योमां तो आजीविकादिनुं प्रयोजन
विचारवुं योग्य नथी.
प्रश्नः — जो ए प्रमाणे छे तो मुनि पण धर्मसाधन अर्थे परघर भोजन करे
छे, तथा साधर्मी साधर्मीनो उपकार करे – करावे छे, ते केम बने?
उत्तरः — तेओ पोते कांई आजीविकादिनुं प्रयोजन विचारी धर्म साधता नथी, परंतु
तेमने धर्मात्मा जाणी केटलाक स्वयं भोजन – उपकारादिक करे छे तो तेमां कांई दोष नथी; पण
जे पोते ज भोजनादिकनुं प्रयोजन विचारी धर्म साधे छे, ते तो पापी ज छे. जे वैराग्यवान
थई मुनिपणुं अंगीकार करे छे, तेने भोजनादिनुं प्रयोजन होतुं नथी, कोई स्वयं भोजनादिक
आपे तो शरीरनी स्थिति अर्थे ले, नहि तो समता राखे छे — संक्लेशरूप थता नथी, वळी तेओ
पोताना हित अर्थे धर्म साधे छे, तथा पोताने जेनो त्याग नथी एवो उपकार करावे छे, पण
उपकार कराववानो अभिप्राय नथी. कोई साधर्मी स्वयं उपकार करे तो करे, तथा न करे तो
तेथी पोताने कांई संक्लेश थतो नथी. हवे ए प्रमाणे तो योग्य छे, पण जो पोते ज आजीविकादिनुं
प्रयोजन विचारी बाह्यधर्मसाधन करे अने कोई भोजनादिक उपकार न करे तो संक्लेश करे, याचना
करे, उपाय करे वा धर्मसाधनमां शिथिल थई जाय, तो तेने पापी ज जाणवो.
ए प्रमाणे सांसारिक प्रयोजन अर्थे जे धर्म साधे छे ते पापी पण छे अने मिथ्याद्रष्टि
तो छे ज.
ए प्रमाणे जैनमतवाळा पण मिथ्याद्रष्टि जाणवा.
❀ व्यवहाराभासी धार्मधाारकोनी सामान्य प्रवृत्ति ❀
हवे तेमने धर्मनुं साधन केवुं होय छे ते अहीं विशेष दर्शावीए छीएः –
जे जीवो कुळप्रवृत्तिवडे वा देखादेखी लोभादिकना अभिप्रायपूर्वक धर्म साधन करे छे,
तेमने तो धर्मद्रष्टि ज नथी, कारण के तेओ जो भक्ति करे छे तो चित्त तो क्यांय छे, द्रष्टि
फर्या करे छे, तथा मुखेथी पाठादिक वा नमस्कारादिक करे छे, परंतु ते ठीक नथी. तेमने ‘‘हुं
कोण छुं , कोनी स्तुति करुं छुं, शुं प्रयोजन अर्थे स्तुति करुं छुं, तथा आ पाठनो शो अर्थ
छे?’’ ए आदिनुं कांई भान नथी.
कदाचित् कुदेवादिकनी पण सेवा करवा लागी जाय छे, त्यां सुदेव – गुरु – शास्त्रादिमां
अने कुदेव – गुरु – शास्त्रादिमां विशेषतानी पिछाण नथी.
वळी ते दान आपे छे तो पात्र – अपात्रना विचाररहित जेम पोतानी प्रशंसा थाय तेम
आपे छे.