सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २२५
तप करे छे तो भूख्या रहेवाथी जेम पोतानुं महंतपणुं थाय ते कार्य करे छे; पण
परिणामोनी पिछाण नथी.
व्रतादिक धारे छे तो बाह्यक्रिया उपर ज द्रष्टि छे; तेमां पण कोई साची क्रिया करे
छे तो कोई जूठी करे छे, पण अंतरंग रागादिकभाव थाय छे तेनो तो विचार ज नथी; अथवा
बाह्य साधन पण रागादिक पोषवा करे छे.
वळी पूजा – प्रभावनादि कार्य करे छे तो त्यां लोकमां पोतानी जेम मोटाई थाय वा
विषयकषाय पोषाय तेम ए कार्यो करे छे, तथा घणां हिंसादिक उपजावे छे.
पण ए कार्यो तो पोताना वा अन्य जीवोना परिणाम सुधारवा माटे कह्यां छे, वळी
त्यां किंचित् हिंसादिक पण थाय छे, परंतु त्यां थोडो अपराध थाय अने घणो गुण थाय ते
कार्य करवुं कह्युं छे; हवे परिणामोनी तो ओळखाण नथी के – अहीं अपराध केटलो थाय छे,
अने गुण केटलो थाय छे, ए प्रमाणे नफा – तोटानुं के विधि – अविधिनुं ज्ञान नथी.
वळी शास्त्राभ्यास करे छे तो त्यां पद्धतिरूप प्रवर्ते छे, जो वांचे छे तो बीजाओने
संभळावी दे छे, भणे छे तो पोते भणी जाय छे तथा सांभळे छे तो कहे छे ते सांभळी
ले छे; पण शास्त्राभ्यासनुं जे प्रयोजन छे, तेने पोते अंतरंगमां अवधारतो नथी. इत्यादिक
धर्मकार्योना मर्मने पिछाणतो नथी.
कोई तो कुळमां जेम वडीलो प्रवर्ते तेम अमारे पण करवुं, अथवा बीजाओ करे छे
तेम अमारे पण करवुं, वा आ प्रमाणे करवाथी अमारा लोभादिकनी सिद्धि थशे. इत्यादि
विचारपूर्वक अभूतार्थधर्मने साधे छे.
वळी केटलाक जीवो एवा होय छे के – जेमने कंईक तो कुळादिरूप बुद्धि छे तथा कंईक
धर्मबुद्धि पण छे, तेथी तेओ कंईक पूर्वोक्त प्रकारे पण धर्मनुं साधन करे छे, तथा कंईक
आगममां कह्युं छे ते प्रमाणे पण पोताना परिणामोने सुधारे छे; ए प्रमाणे तेमनामां मिश्रपणुं
होय छे.
❀ धार्मबुद्धिथी धार्मधाारक व्यवहाराभासी ❀
वळी केटलाक धर्मबुद्धिथी धर्म साधे छे परंतु निश्चयधर्मने जाणता नथी, तेथी तेओ
अभूतार्थरूप धर्मने साधे छे, अर्थात् मात्र व्यवहारसम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्रने मोक्षमार्ग जाणी
तेनुं साधन करे छे.
❀ सम्यग्दर्शननुं अन्यथारुप ❀
शास्त्रमां देव – गुरु – धर्मनी प्रतीति करवाथी सम्यक्त्व होवुं कह्युं छे, एवी आज्ञा मानी
अरहंतदेव, निर्ग्रंथगुरु तथा जैनशास्त्र विना बीजाओने नमस्कारादि करवानो त्याग कर्यो छे,