सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २२७
त्यां अनिष्ट नाश अने इष्ट प्राप्तिना कारणमां उपचारथी अरहंतादिनी भक्ति कहीए छीए;
पण जे जीव पहेलांथी ज सांसारिक प्रयोजन सहित भक्ति करे छे तेने तो पापनो ज
अभिप्राय रह्यो कांक्षा, विचिकित्सारूप भाव थतां ए वडे पूर्व पापनुं संक्रमणादि केवी रीते
थाय? तेथी तेनुं कार्य सिद्ध थयुं नहि.
वळी केटलाक जीव भक्तिने मोक्षनुं कारण जाणी तेमां अति अनुरागी थई प्रवर्ते छे,
पण ते तो जेम अन्यमती भक्तिथी मुक्ति माने छे तेवुं आनुं पण श्रद्धान थयुं; परंतु भक्ति
तो रागरूप छे अने रागथी बंध छे माटे ते मोक्षनुं कारण नथी. रागनो उदय आवतां
जो भक्ति न करे तो पापानुराग थाय एटला माटे अशुभराग छोडवा अर्थे ज्ञानी भक्तिमां
प्रवर्ते छे अने मोक्षमार्गमां बाह्य निमित्तमात्र पण जाणे छे, परंतु त्यां ज उपादेयपणुं मानी
संतुष्ट थतो नथी पण शुद्धोपयोगनो उद्यमी रहे छे.
ते ज श्री पंचास्तिकायनी (गाथा १३६नी) व्याख्यामां पण कह्युं छे के अयं हि स्थूल-
लक्ष्यतया केवलभक्ति प्राधान्यस्योअज्ञानिनो भवति। उपरितनभूमिकायालब्धास्पदस्यास्थानरागनिषेधार्थं
तीव्ररागज्वरविनोदार्थं वा कदाचिज्ज्ञानिनोऽपि भवतीति।
अर्थः — आ भक्ति, केवळभक्ति ज छे प्रधान जेने एवा अज्ञानी जीवोने ज होय
छे, तथा तीव्र रागज्वर मटाडवा अर्थे वा कुस्थानना रागनो निषेध करवाने अर्थे कदाचित्
ज्ञानीने पण होय छे.
प्रश्नः – जो एम छे, तो ज्ञानी करतां अज्ञानीने भक्तिनी विशेषता थती हशे?
उत्तरः — यथार्थपणानी अपेक्षाए तो ज्ञानीने साची भक्ति छे, अज्ञानीने नहि; तथा
रागभावनी अपेक्षाए अज्ञानीने श्रद्धानमां पण भक्तिने मुक्तिनुं कारण जाणवाथी अति
अनुराग छे; ज्ञानीना श्रद्धानमां तेने शुभबंधनुं कारण जाणवाथी तेवो अनुराग नथी. बाह्यमां
कदाचित् ज्ञानीने घणो अनुराग होय छे, कदाचित् अज्ञानीने पण होय छे — एम जाणवुं.
ए प्रमाणे देवभक्तिनुं स्वरूप बताव्युं.
गुरुभकितनुं अन्यथारुप
हवे तेने गुरुभक्ति केवी होय छे ते कहीए छीएः —
केटलाक जीव आज्ञानुसारी छे तेओ तो ‘आ जैनना साधु छे, अमारा गुरु छे, माटे
तेमनी भक्ति करवी’ – एम विचारी तेमनी भक्ति करे छे; तथा केटलाक जीव परीक्षा पण करे
छे तो त्यां ‘‘आ मुनि दया पाळे छे, शील पाळे छे, धनादि राखता नथी, उपवासादि तप
करे छे, क्षुधादिपरिषह सहन करे छे, कोईथी क्रोधादि करता नथी, उपदेश आपी बीजाओने
धर्ममां लगावे छे,’’ — इत्यादि गुण विचारी तेमां भक्तिभाव करे छे, पण एवा गुणो तो