२२८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
परमहंसादि अन्यमतीओमां तथा जैनी मिथ्याद्रष्टिओमां पण होय छे, माटे एमां
अतिव्याप्तिपणुं छे, ए वडे साची परीक्षा थाय नहि; वळी ते जे गुणोनो विचार करे छे तेमां
केटलाक जीवाश्रित छे तथा केटलाक पुद्गलाश्रित छे, तेनी विशेषता नहि जाणवाथी
असमानजातीय मुनिपर्यायमां एकत्वबुद्धिथी ते मिथ्याद्रष्टि ज रहे छे. सम्यग्दर्शन – ज्ञान –
चारित्रनी एकतारूप मोक्षमार्ग ए मुनिओनुं साचुं लक्षण छे तेने ओळखतो नथी.
जो ए ओळखाण थाय तो ते मिथ्याद्रष्टि रहे नहि. ए प्रमाणे मुनिनुं साचुं स्वरूप
ज न जाणे तो तेने साची भक्ति केवी रीते होय? मात्र पुण्यबंधना कारणभूत शुभक्रियारूप
गुणोने ओळखी तेनी सेवाथी पोतानुं भलुं थवुं जाणी तेनामां अनुरागी थई भक्ति करे छे.
ए प्रमाणे तेनी गुरुभक्तिनुं स्वरूप कह्युं.
शास्त्रभकितनुं अन्यथापणुं
हवे शास्त्रभक्तिनुं स्वरूप कहीए छीएः —
केटलाक जीव तो आ केवळी भगवाननी वाणी छे माटे केवळीना पूज्यपणाथी आ पण
पूज्य छे — एम जाणी भक्ति करे छे, तथा केटलाक आ प्रमाणे परीक्षा करे के – आ शास्त्रोमां
वैराग्यता, दया, क्षमा, शील, संतोषादिकनुं निरूपण छे माटे ते उत्कृष्ट छे, एम जाणी तेनी
भक्ति करे छे, पण एवां कथन तो अन्य शास्त्र – वेदान्तादिकमां पण होय छे.
वळी आ शास्त्रोमां त्रिलोकादिनुं गंभीर निरूपण छे माटे उत्कृष्टता जाणी भक्ति करे
छे; परंतु अहीं अनुमानादिकनो तो प्रवेश नथी तेथी सत्य-असत्यनो निर्णय करीने महिमा
केवी रीते जाणे? माटे ए प्रमाणे तो साची परीक्षा थाय नहि. अहीं तो अनेकान्तरूप साचा
जीवादितत्त्वोनुं निरूपण छे तथा साचो रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग दर्शाव्यो छे तेथी
जैनशास्त्रोनी उत्कृष्टता छे तेने ओळखतो नथी, केमके जो ए ओळखाण थई जाय
तो ते मिथ्याद्रष्टि रहे नहि.
ए प्रमाणे शास्त्रभक्तिनुं स्वरूप कह्युं.
ए प्रमाणे तेने देव-गुरु-शास्त्रनी प्रतीति थई छे तेथी ते पोताने व्यवहारसम्यक्त्व थयुं
माने छे, परंतु तेनुं साचुं स्वरूप भास्युं नथी तेथी प्रतीति पण साची थई नथी, अने साची
प्रतीति विना सम्यक्त्वनी प्राप्ति नथी तेथी मिथ्याद्रष्टि ज छे.
तत्त्वार्थश्रद्धाननुं अयथार्थपणुं
वळी शास्त्रमां ‘तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’ (मोक्षशास्त्र अ. १ सूत्र २) एवुं वचन कह्युं
छे; तेथी शास्त्रोमां जेम जीवादितत्त्व लख्यां छे तेम पोते शीखी ले छे, अने त्यां उपयोग