Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Jiv-Ajiva Tattvanu Anyatharoop Jivajivatattvana Shraddhanani Ayatharthata.

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २२९
लगावे छे, अन्यने उपदेश आपे छे, परंतु ते तत्त्वोनो भाव भासतो नथी; अने त्यां तो
ते वस्तुना भावनुं ज नाम तत्त्व कह्युं छे तेथी भाव भास्या विना तत्त्वार्थश्रद्धान क्यांथी होय?
भाव भासवो शुं छे, ते अहीं कहीए छीए
जेम कोई पुरुष चतुर थवा अर्थे संगीतशास्त्र द्वारा स्वर, ग्राम, मूर्छना, रागनुं स्वरूप
अने ताल-तानना भेदो तो शीखे छे, परंतु स्वरादिनुं स्वरूप ओळखता नथी, अने स्वरूप
ओळखाण थया विना अन्य स्वरादिने अन्य स्वरादिरूप माने छे, अथवा सत्य पण माने तो
निर्णय करीने मानतो नथी; तेथी तेने चतुरपणुं थतुं नथी; तेम कोई जीव, सम्यक्त्वी थवा
अर्थे शास्त्र द्वारा जीवादि तत्त्वोनुं स्वरूप शीखी ले छे, परंतु तेना स्वरूपने ओळखतो नथी,
अने स्वरूप ओळखाण सिवाय अन्य तत्त्वोने अन्य तत्त्वरूप मानी ले छे, अथवा सत्य पण
माने छे तो त्यां निर्णय करीने मानतो नथी, तेथी तेने सम्यक्त्व थतुं नथी. वळी जेम कोई
संगीत शास्त्रादि भण्यो होय वा न भण्यो होय पण जो ते स्वरादिना स्वरूपने ओळखे छे
तो ते चतुर ज छे; तेम कोई शास्त्र भण्यो होय वा न भण्यो होय, पण जो ते जीवादिना
स्वरूपने ओळखे छे तो ते सम्यग्द्रष्टि ज छे. जेम हिरण स्वर-रागादिनां नाम जाणतुं नथी
पण तेना स्वरूपने ओळखे छे, तेम अल्पबुद्धि, जीवादिकनां नाम जाणतो नथी पण तेना
स्वरूपने ओळखे छे के ‘‘ आ हुं छुं, आ पर छे, आ भाव बूरा छे, आ भला छे,’’ ए
प्रमाणे स्वरूपने ओळखे तेनुं नाम भावभासन छे.
शिवभूतिमुनि जीवादिकनां नाम जाणता
नहोता अने ‘तुषमाषभिन्न’ (भावपाहुड गा. ५३) एम रटवा लाग्या. हवे ए सिद्धांतनो
शब्द नहोतो परंतु स्वपरना भावरूप ध्यान कर्युं तेथी तेओ केवळज्ञानी थया; अने अगिआर
अंगनोे पाठी जीवादि तत्त्वोना विशेष भेदो जाणे छे, परंतु भाव भासतो नथी तेथी ते
मिथ्याद्रष्टि ज रहे छे.
हवे तेने तत्त्वश्रद्धान केवा प्रकारनुं होय छे ते अहीं कहीए छीए
जीव-अजीवतत्त्वनुं अन्यथारुप
जीवाजीवतत्त्वना श्रद्धाननी अयथार्थता
जैनशास्त्रोथी जीवना त्रस-स्थावरादिरूप तथा गुणस्थान-मार्गणादिरूप भेदोने जाणे छे.
अजीवना पुद्गलादिभेदोने तथा तेना वर्णादिभेदोने जाणे छे, परंतु अध्यात्मशास्त्रोमां भेद-
विज्ञानना कारणभूत वा वीतरागदशा थवाने कारणभूत जेवुं निरूपण कर्युं छे तेवुं जाणतो नथी.
वळी कोई प्रसंगवश तेवुं पण जाणवुं थई जाय, त्यारे शास्त्रानुसार जाणी तो ले छे,
तुसमासं घोसंतो भावविसुद्धो महाणुभावो य
णामेण य सिवभूई केवलणाणी फु डं जाओ ।।५३।। (भावपाहुड)