२३० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
परंतु स्वने स्व-रूप जाणी परनो अंश पण पोतानामां न मेळववो तथा पोतानो
अंश पण परमां न मेळववो – एवुं साचुं श्रद्धान करतो नथी. जेम अन्य मिथ्याद्रष्टि,
निर्धार विना पर्यायबुद्धिथी जाणपणामां वा वर्णादिमां अहंबुद्धि धारे छे, तेम आ पण
आत्माश्रित ज्ञानादिमां तथा शरीराश्रित उपदेश-उपवासादि क्रियाओमां पोतापणुं माने छे.
वळी कोई वखत शास्त्रानुसार साची वात पण बनावे परंतु त्यां अंतरंग निर्धाररूप
श्रद्धान नथी, तेथी जेम क्रेफी मनुष्य माताने माता पण कहे तोपण ते शाणो नथी, तेम आने
पण सम्यग्द्रष्टि कहेता नथी.
वळी जेम कोई बीजानी ज वातो करतो होय तेम आ आत्मानुं कथन करे छे, परंतु
‘आ आत्मा हुं छुं’ – एवो भाव भासतो नथी.
वळी जेम कोई बीजाने बीजाथी भिन्न बतावतो होय तेम आत्मा अने शरीरनी
भिन्नता प्ररूपे छे; परंतु हुं ए शरीरादिथी भिन्न छुं – एवो भाव भासतो नथी.
वळी पर्यायमां जीव-पुद्गलना परस्पर निमित्तथी अनेक क्रियाओ थाय छे ते सर्वने
बे द्रव्योना मेळापथी नीपजी माने छे पण आ जीवनी क्रिया छे तेनुं पुद्गल निमित्त छे तथा
आ पुद्गलनी क्रिया छे तेनुं जीव निमित्त छे – एम भिन्न-भिन्न भाव भासतो नथी. इत्यादि
भाव भास्या विना तेने जीव-अजीवनो साचो श्रद्धानी कही शकाय नहि. कारण के जीव-अजीव
जाणवानुं प्रयोजन तो ए ज हतुं ते थयुं नहि.
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आuावतत्त्वना श्रद्धाननी अयथार्थता ✾
वळी आस्रवतत्त्वमां – जे हिंसादिरूप पापास्रव छे तेने हेय जाणे छे, तथा अहिंसादि-
रूप पुण्यास्रव छे तेने उपादेय माने छे, हवे ए बंने कर्मबंधनां ज कारण छे, तेमां उपादेयपणुं
मानवुं ए ज मिथ्याद्रष्टि छे. श्री समयसारना बंधाधिकारमां पण ए ज कह्युं छे के? –
१सर्वजीवोने जीवन-मरण, सुख-दुःख पोतपोताना कर्मना निमित्तथी थाय छे. ज्यां
अन्य जीव अन्य जीवना ए कार्योनो कर्ता थाय, ए ज मिथ्याअध्यवसाय बंधनुं कारण छे.
त्यां अन्य जीवने जीवाडवानो वा सुखी करवानो अध्यवसाय थाय ते तो पुण्यबंधनुं कारण
छे, तथा मारवानो वा दुःखी करवानो अध्यवसाय थाय ते पापबंधनुं कारण छे.
१ समयसार गा. २५४ थी २५६ तथा समयसार कळश बंध अधिकार
सर्वं सदैव नियतं भवति स्वकीय कर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।
अज्ञानमेतदिह यत्तु परः परस्य कुर्यात्पुमान् मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।।६ ।।
अज्ञानमेतदधिगम्य परात्परस्य पश्यन्ति ये मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।
कर्माण्यहंकृतिरसेन चिकीर्षवस्ते मिथ्यादृशो नियतमात्महनो भवन्ति ।।७ ।।