२३२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
✾ बंधातत्त्वनुं अन्यथारुप ✾
वळी बंधतत्त्वमां जे अशुभभावोथी नरकादिरूप पापबंध थाय तेने तो बूरो जाणे अने
शुभभाववडे देवादिरूप पुण्यबंध थाय तेने भलो जाणे; पण ए प्रमाणे दुःख-सामग्रीमां द्वेष
अने सुखसामग्रीमां राग तो बधा जीवोने होय छे, तेथी तेने पण राग-द्वेष करवानुं श्रद्धान
थयुं. जेवो आ पर्यायसंबंधी सुखदुःखसामग्रीमां राग-द्वेष करवो थयो, तेवो ज भावी
पर्यायसंबंधी सुखदुःखसामग्रीमां राग-द्वेष करवो थयो.
वळी शुभाशुभभावोवडे पुण्य-पापनां विशेषो तो अघातिकर्मोमां थाय छे, पण
अघातिकर्मो आत्मगुणनां घातक नथी. बीजुं शुभाशुभभावोमां घातिकर्मोनो तो निरंतर बंध थाय
छे, जे सर्व पापरूप ज छे अनेे ए ज आत्मगुणनो घातक छे; माटे अशुद्ध (शुभाशुभ)
भावोवडे कर्मबंध थाय छे तेमां भलो-बूरो जाणवो ए ज मिथ्याश्रद्धान छे.
एवा श्रद्धानथी बंधतत्त्वनुं पण तेने सत्यश्रद्धान नथी.
✾ संवरतत्त्वनुं अन्यथारुप ✾
वळी संवरतत्त्वमां-अहिंसादिरूप शुभास्रवभावने संवर माने छे, परंतु एक ज कारणथी
पुण्यबंध पण मानीए तथा संवर पण मानीए एम बने नहि.
प्रश्नः – मुनिने एक काळमां एक भाव थाय छे, त्यां तेमने बंध पण थाय
छे, तथा संवर-निर्जरा पण थाय छे, ते केवी रीते?
उत्तरः – ए भाव मिश्ररूप छे, कंईक वीतराग थया छे तथा कंईक सराग रहेल छे.
जे अंश वीतराग थयो ते वडे तो संवर छे, तथा जे अंश सराग रह्यो ते वडे बंध छे;
हवे (मिश्र एवा) एक भावथी तो बे कार्य बने छे, पण एक प्रशस्तरागथी ज पुण्यास्रव
पण मानवो तथा संवर-निर्जरा पण मानवी ए भ्रम छे. मिश्रभावमां पण आ सरागता छे,
आ विरागता छे — एवी ओळखाण सम्यग्द्रष्टिने ज होय छे, तेथी ते अवशेष सरागभावने
हेयरूप श्रद्धे छे. मिथ्याद्रष्टिने एवी ओळखाण नथी, तेथी ते सरागभावमां संवरना भ्रमथी
प्रशस्तरागरूप कार्योने उपादेय श्रद्धे छे.
वळी सिद्धांतमां गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय तथा चारित्र – ते वडे संवर
थाय छे एम कह्युं छे, तेनुं पण ते यथार्थ श्रद्धान करतो नथी.
केवी रीते ते अहीं कहीए छीएः —
गुप्तिः – मन-वचन-कायानी बाह्य चेष्टा मटाडे, पापचिंतवन न करे, मौन धारे,
गमनादि न करे, तेने ते गुप्ति माने छे; हवे मनमां तो भक्ति आदिरूप प्रशस्तरागादि