Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 223 of 370
PDF/HTML Page 251 of 398

 

background image
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २३३
नानाप्रकारना विकल्पो थाय छे, अने वचन-कायानी चेष्टा पोते रोकी राखे छे पण ए तो
शुभप्रवृत्ति छे, हवे प्रवृत्तिमां तो गुप्तिपणुं बने नहि. वीतरागभाव थतां ज्यां मन-वचन-
कायानी चेष्टा थाय नहि ए ज साची गुप्ति छे.
समितिःवळी परजीवोनी रक्षा अर्थे यत्नाचार प्रवृत्ति तेने समिति माने छे, पण
हिंसाना परिणामोथी तो पाप थाय छे तथा रक्षाना परिणामोथी संवर कहेशो तो पुण्यबंधनुं
कारण कोण ठरशे? एषणा समितिमां दोष टाळे छे त्यां रक्षानुं प्रयोजन नथी, माटे रक्षाने
अर्थे ज समिति नथी.
तो समिति केवी रीते होय छे?मुनिओने किंचित् राग थतां गमनादिक्रिया थाय छे,
त्यां ते क्रियाओमां अति आसक्तताना अभावथी प्रमादरूप प्रवृत्ति थती नथी, तथा बीजा
जीवोने दुःखी करी पोतानुं गमनादि प्रयोजन साधता नथी तेथी स्वयमेव ज दया पळाय छे;
ए प्रमाणे साची समिति छे.
धर्मःवळी बंधादिकना भयथी वा स्वर्ग-मोक्षनी इच्छाथी क्रोधादि करतो नथी, पण
त्यां क्रोधादि करवानो अभिप्राय तो गयो नथी; जेम कोई राजादिकना भयथी वा महंतपणाना
लोभथी परस्त्री सेवतो नथी तो तेने त्यागी कही शकाय नहि, ते ज प्रमाणे आ क्रोधादिनो
त्यागी नथी. तो केवी रीते त्यागी होय? पदार्थ इष्ट-अनिष्ट भासतां क्रोधादिक थाय छे, ज्यारे
तत्त्वज्ञानना अभ्यासथी कोई इष्ट-अनिष्ट न भासे त्यारे स्वयमेव ज क्रोधादिक ऊपजता नथी,
त्यारे साचो धर्म थाय छे.
अनुप्रेक्षाःवळी अनित्यादि चिंतवनथी शरीरादिकने बूरां जाणी, हितकारी न जाणी,
तेनाथी उदास थवुं तेनुं नाम ते अनुप्रेक्षा कहे छे; पण ए तो जेम कोई मित्र हतो त्यारे
तेनाथी राग हतो अने पाछळथी तेना अवगुण जोई ते उदासीन थयो; तेम शरीरादिकथी
राग हतो पण पाछळथी तेना अनित्यत्वादि अवगुण देखी आ उदासीन थयो, परंतु एवी
उदासीनता तो द्वेषरूप छे; ज्यां जेवो पोतानो वा शरीरादिनो स्वभाव छे तेवो ओळखी भ्रम
छोडी, तेने भलां जाणी राग न करवो तथा बूरां जाणी द्वेष न करवो
एवी साची उदासीनता
अर्थे यथार्थ अनित्यत्वादिकनुं चिंतवन करवुं ए ज साची अनुप्रेक्षा छे.
परीषहजयःवळी क्षुधादिक लागतां तेना नाशनो उपाय न करवो, तेने ते
परिषहसहनता कहे छे. हवे उपाय तो न कर्यो अने अंतरंगमां क्षुधादि अनिष्टसामग्री मळतां
दुःखी थयो तथा रति आदिनुं कारण मळतां सुखी थयो, ए तो दुःख-सुखरूप परिणाम छे,
अने ए ज आर्त-रौद्रध्यान छे, एवा भावोथी संवर केवी रीते थाय? दुःखनां कारणो मळतां
दुःखी न थाय तथा सुखनां कारणो मळतां सुखी न थाय पण ज्ञेयरूपथी तेनो जाणवावाळो
ज रहे, ए ज साचो परिषहजय छे.