२३४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
चारित्रः – वळी हिंसादि सावद्य (पापकारी) योगना त्यागने चारित्र माने छे, त्यां
महाव्रतादिरूप शुभयोगने उपादेयपणाथी ग्राह्य माने छे, पण तत्त्वार्थसूत्रमां आस्रवपदार्थनुं
निरूपण करतां महाव्रत – अणुव्रतने पण आस्रवरूप कह्यां छे तो ए उपादेय केवी
रीते होय? तथा आस्रव तो बंधनो साधक छे अने चारित्र मोक्षनुं साधक छे, तेथी
महाव्रतादिरूप आस्रवभावोने चारित्रपणुं संभवतुं नथी; सर्व कषायरहित जे
उदासीनभाव तेनुं ज नाम चारित्र छे.
जे चारित्रमोहना देशघाति स्पर्द्धकोना उदयथी महामंद प्रशस्तराग थाय छे ते तो
चारित्रनो मळ छे, एने नहि छूटतो जाणीने तेनो त्याग करता नथी अने सावधयोगनो ज
त्याग करे छे; परंतु जेम कोई पुरुष कंदमूळादि घणा दोषवाळी हरितकायनो त्याग करे छे
तथा केटलाक हरितकायोनुं भक्षण करे छे पण तेने धर्म मानतो नथी, तेम मुनि हिंसादि
तीव्रकषायरूप भावोनो त्याग करे छे तथा केटलाक मंदकषायरूप महाव्रतादिनुं पालन करे छे
परंतु तेने मोक्षमार्ग मानता नथी.
प्रश्नः – जो ए प्रमाणे छे तो चारित्रना तेर भेदोमां महाव्रतादिक केम कह्यां छे?
उत्तरः – त्यां तेने व्यवहारचारित्र कह्युं छे, अने व्यवहार नाम उपचारनुं छे. ए
महाव्रतादि थतां ज वीतरागचारित्र थाय छे – एवो संबंध जाणी ए महाव्रतादिकमां चारित्रनो
उपचार कर्यो छे; निश्चयथी निष्कषायभाव छे ते ज साचुं चारित्र छे.
ए प्रमाणे संवरना कारणोने अन्यथा जाणतो होवाथी संवरतत्त्वनो पण ए साचो
श्रद्धानी थतो नथी.
✾ निर्जरातत्त्वनां श्रद्धाननी अयथार्थता ✾
वळी ते अनशनादि तपथी निर्जरा माने छे, पण केवळ बाह्यतप ज करवाथी तो निर्जरा
थाय नहि. बाह्यतप तो शुद्धोपयोग वधारवा अर्थे करवामां आवे छे, शुद्धोपयोग निर्जरानुं
कारण छे तेथी उपचारथी तपने पण निर्जरानुं कारण कह्युं छे. जो बाह्यदुःख सहन करवुं
ए ज निर्जरानुं कारण होय तो तिर्यंचादिक पण भूख – तरसादि सहन करे छे.
प्रश्नः – ए तो पराधीनपणे सहे छे, स्वाधीनपणे धर्मबुद्धिपूर्वक उपवासादिरूप
तप करे तेने निर्जरा थाय छे.
उत्तरः – धर्मबुद्धिथी बाह्य उपवासादिक तो करे, पण त्यां उपयोग तो अशुभ,
शुभ वा शुद्ध जेम परिणमे तेम परिणमो. जो घणा उपवासादि करतां घणी निर्जरा थाय
तथा थोडा करतां थोडी थाय एवो नियम ठरे त्यारे तो निर्जरानुं मुख्य कारण उपवासादिक