सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २३५
ज ठरे, पण एम तो बने नहि, कारण – परिणाम दुष्ट थतां उपवासादि करतां पण निर्जरा
थवी केम संभवे?
वळी अहीं जो एम कहेशो के – ‘जेवो अशुभ – शुभ – शुद्धरूप उपयोग परिणमे ते
अनुसार बंध – निर्जरा छे.’ तो उपवासादि तप निर्जरानुं मुख्य कारण क्यां रह्युं? त्यां तो
अशुभ – शुभ परिणाम बंधना कारण ठर्यां, तथा शुद्ध परिणाम निर्जरानुं कारण ठर्यो.
प्रश्नः – तो तत्त्वार्थसूत्रमां ‘तपसा निर्जरा च’ (अ. ९ सू. ३) एम शामाटे कह्युं छे?
उत्तरः – शास्त्रमां ‘इच्छानिरोधस्तपः’ एम कह्युं छे अर्थात् इच्छाने रोकवी तेनुं नाम तप
छे. शुभ – अशुभ इच्छा मटतां उपयोग शुद्ध थाय छे त्यां निर्जरा थाय छे तेथी तपवडे निर्जरा
कही छे.
प्रश्नः – आहारादिरूप अशुभनी इच्छा तो दूर थतां ज तप थाय परंतु
उपवासादि वा प्रायश्चित्तादि शुभकार्य छे तेनी इच्छा तो रहे?
उत्तरः – ज्ञानीपुरुषोने उपवासादिनी इच्छा नथी, एक शुद्धोपयोगनी इच्छा छे, हवे
उपवासादि करतां शुद्धोपयोग वधे छे तेथी तेओ उपवासादिक करे छे, पण जो उपवासादिथी
शरीरनी वा परिणामोनी शिथिलताने कारणे शुद्धोपयोग शिथिल थतो जाणे तो तेओ
आहारादिक ग्रहण करे छे. जो उपवासादिथी ज सिद्धि थाय तो श्री अजितनाथादि त्रेवीस
तीर्थंकरो दीक्षा लई बे उपवास ज केम धारण करे? तेमनी तो शक्ति पण घणी हती, परंतु
जेवा परिणाम थया तेवां बाह्यसाधनवडे एक वीतराग शुद्धोपयोगनो अभ्यास कर्यो.
प्रश्नः – जो एम छे तो अनशनादिकने तपसंज्ञा केवी रीते कही?
उत्तरः – एने बाह्यतप कह्यां छे. बाह्यनो अर्थ ए छे के--बहार बीजाओने देखाय
के – ‘आ तपस्वी छे,’ पण पोते तो जेवो अंतरंगपरिणाम थशे तेवुं ज फळ पामशे. कारण
के-परिणाम विनानी शरीरनी क्रिया फळदाता नथी.
प्रश्नः – शास्त्रमां तो अकामनिर्जरा कही छे, त्यां इच्छा विना भूख-तृषादि
सहन करतां निर्जरा थाय छे तो उपवासादिवडे कष्ट सहतां निर्जरा केम न थाय?
उत्तरः – अकामनिर्जरामां पण बाह्यनिमित्त तो इच्छारहित भूख-तृषा सहन करवी ए
थयुं छे तथा त्यां जो मंदकषायरूप भाव होय तो पापनी निर्जरा थाय – देवादि पुण्यनो बंध
थाय; परंतु जो तीव्रकषाय थतां पण कष्ट सहन करतां पुण्यबंध थाय तो सर्व तिर्यंचादिक देव
ज थाय, पण एम बने नहि, ए ज प्रमाणे इच्छा करी उपवासादि करतां त्यां भूख-तृषादि
कष्ट सहन करीए छीए ते बाह्यनिमित्त छे पण त्यां जेवा परिणाम होय तेवुं फळ पामे छे.