२३६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
जेम अन्नने प्राण कह्यो छे तेम. ए प्रमाणे बाह्यसाधन थतां अंतरंगतपनी वृद्धि थाय छे
तेथी उपचारथी तेने तप कहे छे; पण जे बाह्यतप तो करे अने अंतरंगतप न होय तो
उपचारथी तेने पण तपसंज्ञा नथी. कह्युं छे केः —
कषायविषयाहारोत्यागो यत्र विधीयते ।
उपवासः स विज्ञेयः शेषं लंघनकं विदुः ।। (सुभाषितरत्नसंदोह)
अर्थात् – ज्यां कषाय, विषय अने आहारनो त्याग करवामां आवे छे तेने उपवास
जाणवो; बाकीनाने श्रीगुरु लांघण कहे छे.
अहीं कोई कहे के – जो एम छे तो अमे उपवासादि नहि करीए?
तेने कहीए छीए — उपदेश तो ऊंचे चढवा अर्थे आपवामां आवे छे, पण तुं ऊलटो
नीचो पडेे तो त्यां अमे शुं करीए? जो तुं मानादिकथी उपवासादिक करे छे तो कर वा न कर,
पण तेथी कांई सिद्धि नथी, पण जो धर्मबुद्धिथी आहारादिकनो अनुराग छोडे छे तो जेटलो
राग छूट्योे तेटलो ज छूट्योे, परंतु तेने ज तप जाणी तेनाथी निर्जरा मानी संतुष्ट न था!
पण अंतरंगतपोमां प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, त्याग अने ध्यानरूप
क्रियामां बाह्य प्रवर्तन छे ते तो बाह्यतपवत् ज जाणवुं. जेवी अनशनादि बाह्यक्रिया छे तेवी
ए पण बाह्यक्रिया छे. तेथी प्रायश्चित्तादि बाह्यसाधन पण अंतरंगतप नथी; परंतु एवुं
बाह्यप्रवर्तन थतां जे अंतरंग परिणामोनी शुद्धता थाय छे तेनुं नाम अंतरंगतप
जाणवुं.
त्यां पण एटलुं विशेष छे के घणी शुद्धता थतां शुद्धोपयोगरूप परिणति थाय छे; त्यां
तो निर्जरा ज छे, बंध थतो नथी. अने थोडी शुद्धता थतां शुभोपयोगनो पण अंश रहे छे,
तेथी जेटली शुद्धता थई तेनाथी तो निर्जरा छे तथा जेटलो शुभभाव छे तेनाथी
बंध छे अने एवो मिश्रभाव ज्यां युगपत् होय छे त्यां बंध वा निर्जरा बंने होय छे.
प्रश्नः – शुभभावोथी पापनी निर्जरा अने पुण्यनो बंध थाय छे परंतु
शुद्धभावोथी बंनेनी निर्जरा थाय छे – एम केम न कहो?
उत्तरः – मोक्षमार्गमां स्थितिनुं तो घटवुं बधी ज प्रकृतिओनुं थाय छे, त्यां पुण्य-
पापनी विशेषता छे ज नहि, तथा अनुभागनुं घटवुं पुण्यप्रकृतिओमां शुद्धोपयोगथी पण थतुं
नथी. उपर उपर पुण्यप्रकृतिओना अनुभागनो तीव्र बंध-उदय थाय छे तथा पापप्रकृतिओना
परमाणु पलटी शुभप्रकृतिरूप थाय छे – एवुं संक्रमण शुभ अने शुद्ध बंने भाव थतां थाय छे,
माटे पूर्वोक्त नियम संभवतो नथी पण विशुद्धताना ज अनुसार नियम संभवे छे.