Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
वळी तेने एवो पण अभिप्राय छे केस्वर्गमां सुख छे तेनाथी अनंतगणुं मोक्षमां
सुख छे. हवे ए गुणाकारमां ते स्वर्ग अने मोक्षसुखनी एक जाति जाणे छे; स्वर्गमां तो
विषयादि, सामग्रीजनित सुख होय छे तेनी जाति तो तेने भासे छे, पण मोक्षमां विषयादि
सामग्री नथी एटले त्यांना सुखनी जाति तेने भासती तो नथी, परंतु महापुरुषो मोक्षने
स्वर्गथी पण उत्तम कहे छे तेथी आ पण उत्तम ज माने छे. जेम कोई गायनना स्वरूपने
ओळखतो नथी पण सभाना सर्वलोक वखाणे छे तेथी पोते पण वखाणे छे, ए प्रमाणे आ
मोक्षने उत्तम माने छे.
प्रश्नःशास्त्रमां पण इंद्रादिकथी अनंतगणुं सुख सिद्धोने छे एम प्ररूप्युं छे,
तेनुं शुं कारण?
उत्तरःजेम तीर्थंकरनां शरीरनी प्रभाने सूर्यप्रभाथी क्रोडगुणी कही त्यां तेनी एक
जाति नथी परंतु लोकमां सूर्यप्रभानुं माहात्म्य छे तेनाथी पण घणुं माहात्म्य जणाववा अर्थे
एवो उपमालंकार करीए छीए; तेम सिद्धसुखने इन्द्रादिसुखथी अनंतगणुं कह्युं छे त्यां तेनी
एक जाति नथी; परंतु लोकमां इन्द्रादिसुखनुं माहात्म्य छे तेनाथी पण घणुं माहात्म्य जणाववा
अर्थे एवो उपमालंकार करीए छीए.
प्रश्नःसिद्धसुख अने इंद्रादिसुखनी ते एक जाति जाणे छेएवो निश्चय
तमे केवी रीते कर्यो?
उत्तरःजे धर्मसाधननुं फळ स्वर्ग माने छे ते ज धर्मसाधननुं फळ ते मोक्ष माने
छे कोई जीव इंद्रादिपद पामे तथा कोई मोक्ष पामे त्यां ए बंनेने एकजातिना धर्मनुं फळ
थयुं माने छे. एवुं तो माने छे के
जेने थोडुं साधन होय छे ते इंद्रादिपद प्राप्त क्ररे छे
तथा जेने संपूर्ण साधन होय छे ते मोक्ष प्राप्त करे छे, परंतु त्यां ते धर्मनी जाति एक जाणे
छे, हवे जे कारणनी जाति एक जाणे छे तेने कार्यनी पण एक जातिनुं श्रद्धान अवश्य होय.
कारण के
कारण विशेषता थतां ज कार्य विशेषता थाय छे, तेथी अमे निश्चय कर्यो केतेना
अभिप्रायमां इंद्रादिसुख अने सिद्धसुखनी जातिमां एक जातिनुं श्रद्धान छे.
वळी कर्मनिमित्तथी आत्माने औपाधिकभाव हता तेनो अभाव थतां पोते शुद्ध
स्वभावरूप केवळ आत्मा थयो; जेम परमाणु स्कंधथी छूटतां शुद्ध थाय छे तेम आ कर्मादिकथी
भिन्न थईने शुद्ध थाय छे पण तेमां विशेषता एटली छे के
ते (परमाणु) बंने अवस्थामां
दुःखी-सुखी नथी, परंतु आत्मा अशुद्ध अवस्थामां दुःखी हतो, हवे तेनो अभाव थवाथी
निराकुळलक्षण अनंतसुखनी प्राप्ति थई.
बीजुं इन्द्रादिकोने जे सुख छे ते तो कषायभावोथी आकुळतारूप छे तेथी ते परमार्थथी