सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २३९
दुःख ज छे; एटला माटे तेनी अने आनी एक जाति नथी. वळी स्वर्गसुखनुं कारण तो
प्रशस्तराग छे त्यारे मोक्षसुखनुं कारण वीतरागभाव छे तेथी कारणमां पण भेद छे;
परंतु एवो भाव तेने भासतो नथी.
तेथी मोक्षनुं पण तेने साचुं श्रद्धान नथी.
ए प्रमाणे तेने साचुं तत्त्वश्रद्धान नथी, तेथी श्री समयसार गा. २७६-७७नी टीकामां
पण कह्युं छे के – ‘अभव्यने तत्त्वश्रद्धान थवा छतां पण मिथ्यादर्शन ज रहे छे’१ तथा श्री
प्रवचनसारमां कह्युं छे के – आत्मज्ञानशून्य तत्त्वार्थश्रद्धान कार्यकारी नथी.’२
वळी व्यवहारद्रष्टिथी सम्यग्दर्शननां आठ अंग कह्यां छे तेने ते पाळे छे, पचीस दोष
कह्या छे तेने टाळे छे, तथा संवेगादिगुण कह्या छे तेने धारे छे, परंतु जेम बीज वाव्या विना
खेतीनां बधां साधन करवा छतां पण अन्न थतुं नथी तेम सत्यतत्त्वश्रद्धान थया विना
सम्यग्दर्शन थतुं नथी. श्री पंचास्तिकायनी व्याख्यामां अंतमां ज्यां व्यवहाराभासवाळानुं वर्णन
कर्युं छे त्यां पण एवुं ज कथन कर्युं छे.
ए प्रमाणे तेने सम्यग्दर्शन अर्थे साधन करवा छतां पण सम्यग्दर्शन थतुं नथी.
✾ सम्यग्ज्ञाननुं अन्यथारुप ✾
शास्त्रमां सम्यग्ज्ञान माटे शास्त्राभ्यास करवाथी सम्यग्ज्ञान थवुं कह्युं छे तेथी ते
१ अभव्यो हि नित्यकर्मफलचेतनारूपं वस्तु श्रद्धत्ते, नित्यज्ञानचेतनामात्रं न तु श्रद्धत्ते, नित्यमेव
भेदविज्ञानानर्हत्वात् । ततः स कर्ममोक्षनिमित्तं ज्ञानमात्रं भूतार्थं धर्मं न श्रद्धत्ते, भोगनिमित्तं शुभकर्ममात्रभूतार्थमेव
श्रद्धत्ते ।। तत एवासौ अभूतार्थधर्मश्रद्धानप्रत्ययनरोचनस्पर्शनैरुपरितनग्रैवेयकभोगमात्रमारकंदन्न पुनः कदाचनापि विमुच्यते,
ततोऽस्य भूतार्थधर्मश्रद्धानाभावात् श्रद्धानमपि नास्ति । एवं सति तु निश्चयनयस्य व्यवहारनयप्रतिषेधोे युज्यत एव ।।
अर्थः – अभव्य जीव नित्यकर्मफलचेतनारूप वस्तुनुं श्रद्धान करे छे. परंतु नित्यज्ञानचेतनामात्र
वस्तुनुं श्रद्धान करतो ज नथी; कारण अभव्य जीव सदाय स्व-परना भेदज्ञानने योग्य ज नथी तेथी
ते अभव्य जीव ज्ञानमात्र सत्यार्थधर्म के जे कर्मक्षयनो हेतु छे तेने श्रद्धान करतो नथी परंतु शुभकर्ममात्र
असत्यार्थधर्म के जे भोगनो हेतु छे तेनुं ज श्रद्धान करे छे तेथी ते अभव्यजीव अभूतार्थ धर्मना
श्रद्धान-प्रतीति-रुचि अने स्पर्शन ए वडे अंतिमग्रैवेयक सुधीना भोगमात्रने प्राप्त थाय छे. परंतु कर्मथी
कदी पण छूटतो नथी तेथी तेने सत्यार्थधर्मना श्रद्धाननो अभाव होवाथी सत्यार्थ श्रद्धान पण नथी.
एम होवाथी निश्चयनयथी व्यवहारनयनो निषेध योग्य ज छे ( श्री समयसार गा. २७५नी व्याख्या.) – अनुवादक.
२ अत आत्मज्ञानशून्यमागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वयौगपद्यमप्यकिंचिंत्करमेव
अर्थः – आत्मज्ञानथी शून्य पुरुषने आगमज्ञान, तत्त्वार्थ श्रद्धान अने संयमभावोनी एकता पण
कार्यकारी नथी. (श्री प्रवचनसार अ. ३ गा. २३९नी व्याख्यामांथी.) – अनुवादक.