२४० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
शास्त्राभ्यासमां तत्पर रहे छे. त्यां शीखवुं शीखववुं, याद करवुं, वांचवुं, भणवुं इंत्यादि क्रियामां
तो उपयोगने रमावे छे परंतु तेना प्रयोजन उपर द्रष्टि नथी. आ उपदेशमां मने कार्यकारी
शुं छे?’ ते अभिप्राय नथी, स्वयं शास्त्राभ्यास करीने अन्यने उपदेश आपवानो अभिप्राय
राखे छे अने घणा जीवो उपदेश माने त्यां पोते संतुष्ट थाय छे. पण ज्ञानाभ्यास तो पोताना
अर्थे करवामां आवे छे तथा अवसर पामीने परनुं पण भलुं थतुं होय तो परनुं पण भलुं
करे; तथा कोई उपदेश न सांभळे तो न सांभळो, पोते शा माटे विषाद करे? शास्त्रार्थनो
भाव जाणी पोतानुं भलुं करवुं.
वळी शास्त्राभ्यासमां पण केटलाक तो व्याकरण, न्याय, काव्यादि शास्त्रोनो
घणो अभ्यास करे छे, पण ए तो लोकमां पंडितता प्रगट करवानां कारण छे. एमां
आत्म – हितनुं निरूपण तो नथी, एनुं प्रयोजन तो एटलुं ज छे के – पोतानी बुद्धि
घणी होय तो तेनो थोडोघणो अभ्यास करी पछी आत्महितसाधक शास्त्रोनो अभ्यास
करवो, पण जो थोडी बुद्धि होय तो आत्महितसाधक सुगमशास्त्रोनो ज अभ्यास
करवो, परंतु ए व्याकरणादिनो ज अभ्यास करतां करतां आयुष्य पूर्ण थई जाय
अने तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति न बने एम तो न करवुं.
प्रश्नः – एवुं छे तो व्याकरणादिनो अभ्यास न करवो जोईए?
उत्तरः – एना अभ्यास विना महान ग्रंथोनो अर्थ खुलतो नथी, तेथी एनो पण
अभ्यास करवो योग्य छे.
प्रश्नः – महान ग्रंथ एवा शा माटे बनाव्या के जेनो अर्थ व्याकरणादि विना न
खुले? भाषावडे सुगमरूप हितोपदेश केम न लख्यो? तेमने कांई प्रयोजन तो हतुं नहि?
उत्तरः – भाषामां पण प्राकृत-संस्कृतादिना ज शब्दो छे, परंतु ते अपभ्रंशसहित छे,
वळी जुदा जुदा देशोमां जुदा जुदा प्रकारनी भाषा छे, हवे महानपुरुष शास्त्रोमां अपभ्रंश
शब्द केम लखे? बाळक तोतडुं बोले पण मोटा तो न बोले; वळी एक देशनां भाषारूप शास्त्र
बीजा देेशमां जाय तो त्यां तेनो अर्थ केवी रीते भासे? एटला माटे प्राकृत-संस्कृतादि शुद्ध
शब्दरूप ग्रंथ रच्या.
तथा व्याकरण विना शब्दनो अर्थ यथावत् भासे नहि तथा न्याय विना लक्षण परीक्षादि
यथायोग्य थई शके नहि, इत्यादि वचन द्वारा वस्तुनो स्वरूपनिर्णय व्याकरणादि विना बराबर
न थतो जाणी तेनी आम्नायानुसार कथन कर्युं छे. भाषामां पण तेनी थोडीघणी आम्नाय
मळवाथी ज उपदेश थई शके छे, पण तेनी घणी आम्नायथी बराबर निर्णय थई शके छे.