Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 231 of 370
PDF/HTML Page 259 of 398

 

background image
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २४१
प्रश्नःएम छे तो हवे भाषारूप ग्रंथ शामाटे बनावो छो?
उत्तरःकाळदोषथी जीवोनी मंदबुद्धि जाणी कोई कोई जीवोने ‘जेटलुं ज्ञान थशे तेटलुं
तो थशे,’ एवो अभिप्राय विचारी भाषाग्रंथ करीए छीए. माटे त्यां जे जीव व्याकरणादिनो
अभ्यास न करी शके तेणे तो आवा ग्रंथो वडे ज अभ्यास करवो.
परंतु जे जीव नानाप्रकारनी युक्तिपूर्वक शब्दोना अर्थ करवा माटे व्याकरण अवगाहे
छे, वादादिकवडे महंत थवा माटे न्याय अवगाहे छे, तथा चतुरपणुं प्रगट करवा माटे काव्य
अवगाहे छे, इत्यादि लौकिक प्रयोजनपूर्वक तेनो अभ्यास करे छे ते धर्मात्मा नथी, पण तेनो
बने तेटलो थोडोघणो अभ्यास करी
आत्महित अर्थे जे तत्त्वादिकनो निर्णय करे छे ते
ज धर्मात्मा पंडित समजवो.
वळी केटलाक जीव पुण्य-पापादि फळनां निरूपक पुराणादि शास्त्र, पुण्य-पापक्रियानां
निरूपक आचारादि शास्त्र, तथा गुणस्थान, मार्गणा, कर्मप्रकृति अने त्रिलोकादिकनां निरूपक
करणानुयोगनां शास्त्रोनो अभ्यास करे छे, पण जो तेनुं प्रयोजन पोते विचारे नहि तो ए
पोपट जेवो ज अभ्यास थयो. अने जो तेनुं प्रयोजन विचारे छे तो त्यां पापने बूरुं जाणवुं,
पुण्यने भलुं जाणवुं, गुणस्थानादिक स्वरूप जाणी लेवुं. तथा तेनो जेटलो अभ्यास करीशुं तेटलुुंं
अमारुं भलुं थशे
इत्यादि प्रयोजन विचार्युं छे; तेनाथी नरकादिनो छेद अने स्वर्गादिनी
प्राप्ति एटलुं तो थशे, परंतु तेनाथी मोक्षमार्गनी प्राप्ति तो थाय नहि.
पहेलां साचुं तत्त्वज्ञान थाय तो पछी ते पुण्य-पापना फळने संसार जाणे, शुद्धो-
पयोगथी मोक्ष माने, गुणस्थानादिरूप जीवनुं व्यवहारनिरूपण जाणे,इत्यादि जेम छे तेम
श्रद्धान करी तेनो अभ्यास करे तो सम्यग्ज्ञान थाय.
हवे तत्त्वज्ञाननुं कारण तो अध्यात्मरूप द्रव्यानुयोगना शास्त्र छे; अने केटलाक जीव
ए शास्त्रोनो पण अभ्यास करे छे परंतु ज्यां जेम लख्युं छे तेम पोते निर्णय करी
पोताने पोतारूप, परने पररूप तथा आस्रवादिने आस्रवादिरूप श्रद्धान करता नथी.
कदापि मुखथी तो यथावत् निरूपण एवुं पण करे के जेना उपदेशथी अन्य जीव सम्यग्द्रष्टि
थई जाय; जेम कोई छोकरो स्त्रीनो स्वांग करी एवुं गायन करे के जे सांभळीने अन्य पुरुष-
स्त्री कामरूप थई जाय, पण आ तो जेवुं शीख्यो तेवुं कहे छे परंतु तेनो भाव कांई तेने
भासतो नथी तेथी पोते कामासक्त थतो नथी; तेम आ जेवुं लख्युं छे तेवो उपदेश दे छे
परंतु पोते अनुभव करतो नथी, जो पोताने तेनुं श्रद्धान थयुं होत तो अन्यतत्त्वनो अंश
अन्यतत्त्वमां न मेळवत पण तेने तेनुं ठेकाणुं नथी, तेथी सम्यग्ज्ञान थतुं नथी.
ए प्रमाणे तो ते अगीआर अंग सुधी भणे तोपण तेथी सिद्धि थती नथी.